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अफसरों को किस बात का
पुरस्कार?
मुख्यमंत्री
रमन सिंह ने कहा
रायपुर। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री
डॉ रमन सिंह नौकरशाहों के कार्य और दायित्वों को सफलता पूर्वक
निभाना उनकी प्रमुख जिम्मेदारी बताते हुए कहा है कि यदि
पुरस्कारों में कलेक्टर जैसे अधिकारी शामिल हो जाएं, तो दूसरों
के लिए क्या बचेगा? मुख्यमंत्री ने 'राज्योत्सव' पर अफसरों को
मिलने वाले कई पुरस्कारों को निरस्त कर दिया है। मुख्यमंत्री
ने पत्रकारों से कहा कि लोगों के हित में योजनाएं संचालित करना
और विकास कार्य करवाना हर अधिकारी का कर्तव्य होता है, ऐसे में
उन्हें किस बात का पुरस्कार? दरअसल बिलासपुर के कलेक्टर सोनमणि
बोरा को राज्य के विकास में उल्लेखनीय योगदान के लिए इस
पुरस्कार के लिए चयनित किया गया था। मुख्यमंत्री के कथन के बाद
किसी गंभीर विवाद से बचते हुए कलेक्टर ने कहा है कि 'अधिकारी
होने के नाते मैंने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया, कुछ
उत्साहित लोगों ने पुरस्कार के लिए नामांकन किया था, मगर अब
सरकार का निर्णय मान्य है।'
छत्तीसगढ़ का राज्योत्सव अनगिनत सांस्कृतिक खुशियों और
राज्य में भरपूर विकास के दृश्यों का साक्षी बना है। छत्तीसगढ़
की जनता ने अपने जन्म की नौवीं वर्षगांठ के 'राज्योत्सव' में
खुशियों के कई रंग देखे-सुने। सात दिवसीय राज्योत्सव में जहां
बॉलीवुड से जुड़े बड़े सितारे छाए रहे, वहीं दूसरी ओर
सम्मान-प्रसंग में उठे गंभीर सवाल और सरकार के मेहमान बनकर आए
बॉलीवुड गायक कैलाश खेर के कई आरोप उत्सव में दाग भी लगा गए।
विवाद की शुरूआत सम्मान-पुरस्कार से हुई। राज्योत्सव के मौके
पर हर वर्ष छत्तीसगढ़ सरकार, विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय
योगदान देने वाली हस्तियों को राज्य अलंकरण से सम्मानित करती आ
रही है, मगर पिछले दो-तीन सालों से पुरस्कार-प्रक्रिया
आरोप-प्रत्यारोप के घेरे में है। इस वर्ष पुरस्कार देने में
खासी सावधानी बरती गई। मगर जब मुख्यमंत्री डॉ रमनसिंह ने
पुरस्कार के चयनितों की सूची देखी, तो उन्हें बेहद आश्चर्य हुआ
कि आदिवासियों के उत्थान के नाम पर दिया जाने वाला शहीद
वीरनारायण सिंह सम्मान, आईएएस अधिकारी और बिलासपुर के कलेक्टर
सोनमणि बोरा को दिया जा रहा है। बोरा को आदिवासियों का जीवन
संवारने के लिए यह पुरस्कार दिया जा रहा था, मगर मुख्यमंत्री
ने पत्रकारों से कहा कि लोगों के हित में योजनाएं संचालित करना
और विकास कार्य करवाना हर अधिकारी का कर्तव्य होता है, ऐसे में
उन्हें किस बात का पुरस्कार?
उन्होंने कहा कि यदि पुरस्कारों में मुख्य सचिव और
कलेक्टर जैसे अधिकारी शामिल हो जाएं, तो दूसरों के लिए क्या
बचेगा? हालांकि मुख्यमंत्री ने आठ अन्य पुरस्कारों को भी
निरस्त कर दिया, जिनमें उन्हें लग रहा था कि यह सही हकदार को
नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर पुरस्कार से वंचित होने पर बिलासपुर
के कलेक्टर सोनमणि बोरा ने महज इतना ही कहा कि अधिकारी होने के
नाते उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया है, कुछ
उत्साहित लोगों ने पुरस्कार के लिए उनका नामांकन किया था, मगर
पुरस्कार मामले में सरकार का हर निर्णय उन्हें मान्य है।
संस्कृति और पुरातत्व के आयुक्त राजीवचंद्र श्रीवास्तव ने इस
विवाद से यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि पुरस्कार देने या न
देने के लिए चयन-समिति और सरकार का निर्णय सर्वमान्य होना
चाहिए।
कलेक्टर को अवार्ड्स न देने के पीछे उस आईएएस लॉबी का
षडयंत्र बताया जा रहा है, जो बोरा के पीछे पड़ी है। बोरा एक
ईमानदार अधिकारी कहे जाते हैं। इनसे पूर्व भी कई अधिकारी अच्छे
कार्यों के लिए राज्य पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।
बोरा, वृक्षारोपण, बालिका शिक्षा और सहकारिता में उल्लेखनीय
योगदान को लेकर अब तक एक दर्जन से अधिक अवार्ड्स अपने नाम करा
चुके हैं। इनमें उनका प्रमुख रूप से पर्यावरण को लेकर लिम्का
बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल होना और शिक्षा के क्षेत्र
में केंद्र सरकार से पुरस्कार प्राप्त करना शामिल है। कहते हैं
कि बोरा की यह उपलब्धि उन अधिकारियों को रास नहीं आ रही है,
जिनके लिए कोई काम न करना ही काम बन चुका है। इन्हीं
अधिकारियों के चलते कुछ माह पूर्व कलेक्टर सोनमणि बोरा को
मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह कहते हुए स्थानांतरित कर दिया था कि
वे निष्पक्ष चुनाव कराने में असमर्थ हैं। कहा जा रहा है कि कुछ
अधिकारी मुख्यमंत्री से अपनी नजदीकी और अपने रुतबे का अहसास
कराने के लिए कुछ उन युवा आईएएस अधिकारियों को निशाना बना रहे
हैं, जो ईमानदारी के साथ अपना दायित्व निभा रहे हैं। हालांकि
इसका दूसरा पक्ष यह कह रहा है कि ऐसा नहीं है। अब यह सवाल है
कि आखिर कोई अधिकारी काम करे तो कैसे करे? उसे भी किसी न किसी
रूप में प्रोत्साहन की आवश्यकता है।
राज्योत्सव के दौरान सरकार के मेहमान बनकर आए बॉलीवुड
गायक कैलाश खेर भी सरकार की खातिरदारी से खुश नहीं दिखे। पहले
हजारों की भीड़ के समक्ष और बाद में राज्यपाल और मुख्यमंत्री
से मिलकर उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि यदि सरकार किसी
कलाकार को मेहमान के तौर पर बुलाती है, तो उसका पूरा सम्मान
होना चाहिए। खेर इस बात से नाराज थे कि होटल से लेकर कार्यक्रम
स्थल तक पहुंचने के दौरान पुलिस ने उन्हें खासा परेशान किया,
जबकि वे सरकारी अतिथि थे। हालांकि इस विवाद के पीछे कहानी कुछ
और ही पता चली है। एक ताकतवर मंत्री के रिश्तेदार ने खेर के
साथ जमकर दुर्व्यवहार किया। यह कि पूरे राज्योत्सव में बॉलीवुड
कलाकारों को आमंत्रित करने में संस्कृति विभाग ईवेंट कंपनियों
की मदद लेता रहा है। ये कंपनियां कलाकारों को ऊंचे दामों में
लेकर आती हैं और खासा कमीशन बटोरती रही हैं। मगर इस वर्ष ऐसे
लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, जिसका गुस्सा कैलाश
खेर पर उतारा गया। हालात इतने बिगड़े कि खेर को मेहनताने के
तौर पर मिलने वाली राशि का चेक तक बाउंस हो गया।
राज्योत्सव पूरी तरह जरूर सफल रहा।
प्रतिदिन एक लाख से ज्यादा लोगों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों का
लुत्फ उठाया। घरेलू और बाहरी कलाकारों को मिलाकर 80 से अधिक
दलों ने अपने कार्यक्रम से लोगों को मोहित कर दिया। संस्कृति
और पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के शब्दों में- 'यह
सांस्कृतिक उत्सव उन क्षेत्रीय कलाकारों के लिए संजीवनी बनता
है, जो अपनी कला और संस्कृति की विरासत संभाले हुए हैं।'
प्रदेश की तरक्की का चेहरा दिखाते विभागीय स्टॉल सुखद संकेत दे
रहे हैं। नौ सालों में राज्य में भरपूर विकास हुआ। एक बानगी
देखिए कि राज्य बनने के पहले छत्तीसगढ़ को जहां सड़कें बनाने
के लिए साल भर में महज 80 करोड़ रूपए ही मिलते थे, इस साल
सिर्फ पीडब्ल्यूडी का बजट 2,400 करोड़ पार कर गया है।
छत्तीसगढ़ के
शिल्पी पुस्तक का विमोचन
भोपाल ।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा रमन सिंह के व्यक्तित्व और
कृतित्व पर केंद्रित पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ के शिल्पी डा रमन सिंह’
का विमोचन भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री और सांसद प्रभात झा ने
किया। इस मौके पर पुस्तक के लेखक फिल्मकार और पत्रकार तपेश
जैन, सुधाकर सिंह और पुस्तक के प्रकाशक ओमप्रकाश अग्रवाल एवं
शांतिस्वरूप शर्मा मौजूद थे। पुस्तक में डा रमन सिंह के
मुख्यमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ में हुए विकास कार्यों तथा
वहां के राजनीतिक परिदृश्य को रेखांकित किया गया है। पुस्तक की
भूमिका माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार
विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय
द्विवेदी ने लिखी है। पुस्तक में पूर्व राष्ट्रपति डा
एपीजे
अब्दुल कलाम की छत्तीसगढ़ पर लिखी उनकी कविता को
विशेष रूप से प्रकाशित किया गया है। पुस्तक का प्रकाशन जयपुर
के श्याम प्रकाशन ने किया है।

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