अभिनव ‌बिंद्रा दु‌निया का अचूक ‌निशानेबाज़

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बीजिंग। ओलंपिक खेलों में पदकों की आस लगाए बैठे भारत को दस मीटर राइफल निशानेबाजी में अभिनव बिंद्रा ने गोल्ड दिलाकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ निशानेबाज का खिताब हासिल कर लिया है। करीब एक सौ बारह साल में किसी अकेले खिलाड़ी को स्वर्ण पदक में एकल सफलता मिली है। ओलंपिक में 28 साल बाद भारत को फिर सोना मिला। इस सफलता से भारत में जश्न मनाया जा रहा है और ओलंपिक में दूसरे खेलों में भारतीय खिलाड़ी सोने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
भारत के पंजाब प्रांत के रहने वाले अभिनव बिंद्रा यूं तो काफी समय से निशानेबाजी में अपने हाथ आजमा रहे हैं और भारत और दूसरे देशों में निशानेबाजी प्रतिस्पर्धाएं जीतकर बहुत सारे पुरस्कार हासिल कर चुके हैं लेकिन बीजिंग में ओलंपिक के स्वर्ण पदक का मान-सम्मान और भी गगनचुंबी बना देता है। यहां के बाद अब कोई पुरस्कार नहीं बचा। अभिनव ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी चीन और फिनलैंड को हराकर यह प्रतियोगिता जीती।
अभिनव बिंद्रा को इसमें 700.5 अंक मिले। जिस समय मुकाबला अंतिम दौर पर था तो अभिनव नंबरों के मामलों में आगे पीछे चल रहे थे। हिंदुस्तान की धड़कनें मुकाबले का परिणाम सुनने के लिए तेज हो रहीं थीं और तभी मुकाबले की आखिरी गोली बिल्कुल निशाने पर पहुंची और भारत गोल्डमैन हो गया। ओलंपिक के इस विजयी क्षण को पूरी दुनिया ने सांस रोककर देखा। सुना जाता है कि भारत में या तो महाभारत के अर्जुन अचूक निशानेबाज थे या एकलव्य और या फिर अयोध्या के महाराज दशरथ और भारत के एक राजा पृथ्वीराज चौहान जिनके निशाने अचूक कहे गए हैं। इस दौर में भारत में अब अभिनव बिंद्रा शामिल हो गए हैं।
भारत में
जश्‍न मनाया जा रहा है और पंजाब प्रांत में तो खूब दिवाली हो रही है। पंजाब सरकार ने एक करोड़ रुपए इनाम की घोषणा की है और देश के अन्य सरकारें भी अपने निशानेबाज के लिए धन और पुरस्कारों की घोषणा कर रही हैं। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी सहित देश के जाने माने राजनेता, उद्योगपति, खिलाड़ी, कलाकार अभिनव बिंद्रा को बधाई दिए हैं।

 

पत्रकारों के सामने फूटी तिब्बतियों की पीड़ा


बीजिंग। तिब्बत में सब कुछ ठीक-ठाक दिखाने का चीन का दांव उलटा पड़ रहा है। पिछले दिनों ल्हासा लाये गये विदेशी पत्रकारों के सामने जोकहांग मंदिर के करीब 30 तिब्बती भिक्षुओं ने नाटकीय तरीके से पेश होकर विरोध प्रदर्शन किया और उनके सामने चीन की असलियत रखी ।
इन भिक्षुओं ने दलाई लामा के समर्थन में नारे लगाये और चीन के इस दावे को गलत बताया कि उनके आध्यात्मिक गुरू उन्हें भड़काकर हिंसा फैला रहे हैं। उधर चीन के आंेलंपिक खेलों पर भी तिब्बत का पूरा असर दिखाई दे रहा है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कड़ी सुरक्षा के बावजूद यह विरोध प्रदर्शन किया गया। चीनी प्रशासन अपनी सुरक्षा में बीजिंग में रह रहे विदेशी पत्रकारों को ल्हासा लेकर आया था। उसका मकसद यहां की स्थिति से विदेशी संवाददाताओं को अवगत कराना था। लेकिन उसका यह दांव उलटा पड़ गया। प्रदर्शन कर रहे एक भिक्षु ने नारा लगाया कि तिब्बत आजाद नहीं है और यह कहते-कहते वह रोने लगा। भिक्षुओं ने कहा कि तिब्बत में स्वतंत्रता का हनन हो रहा है। उन्होंने चीन के इस आरोप का खंडन किया कि दलाई लामा ने दंगों के लिए उकसाया था। गौरतलब है कि चीन ने 1989 के बाद पहली बार तिब्बत में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शन को कवर करने से मीडिया को रोका हुआ है।
चीन में ओलंपिक खेलों के मद्देनज़र वहां के प्रमुख शहरों में सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए हैं तथापि वहां कुछ जगहों पर विद्रोह की आवाजें कम नहीं हुई हैं। तिब्बती आंदोलन के बहुत से नेता तो जेलों में बंद हैं। चीन ओलंपिक खेलों की आड़ में दुनिया का ध्यान तिब्बत से हटाने की कोशिश कर रहा है लेकिन ये खेल भी तिब्बत के अंतर्राष्ट्रीय तनाव को कम नहीं कर पा रहे हैं। खेलों पर तिब्बत का साया मौजूद है और इस मिशन में तिब्बत के आंदोलनकारी अपना काम कर रहे हैं।