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भोजपुरी
फिल्म जगत बना मुंबई में नरक !
मुंबई। पिछले कुछ वर्षों
से मुंबई में ताबड़तोड़ भोजपुरी फिल्में बन रही हैं और बहुत
बड़ी संख्या में लोग भोजपुरी फिल्म निर्माण से विभिन्न स्तर पर
जुड़े हुये हैं। इसके बावजूद भोजपुरी फिल्म जगत एक सड़न का
शिकार है। इसमें काम करने वाले लोगों को भुखमरी का सामना करना
पड़ रहा है, क्योंकि जीतोड़ काम करने के बावजूद उन्हें न सिर्फ
पैसा न के बराबर दिया जा रहा है, बल्कि उनके साथ प्राचीन रोम
के गुलामों से भी बदतर व्यवहार किया जा रहा है। भोजपुरी फिल्म
जगत का पड़ताल करने पर कई ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जिन्हें
देखकर सहजता से इसमें व्याप्त सड़न का अनुभव किया जा सकता है।
कुछ महत्वपूर्ण कलाकारों ओर तकनीशियनों को छोड़कर किसी
भोजपुरी फिल्म के प्रोजेक्ट में काम करने वाले तमाम लोगों के
साथ लिखित अनुबंध तो होता ही नहीं है। बहुत बड़ी संख्या में
लोगों से फिल्म निर्माण के विभिन्न स्तर पर बिना अनुबंध के ही
काम लिया जाता है। उनके काम के एवज में भुगतान भी नहीं किया
जाता है और किया भी जाता है तो बहुत ही मामूली सा। भुगतान
मांगने पर उन्हें टका सा जवाब दिया जाता है कि उनके लिए इतना
ही काफी है कि उन्हें इस प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका दिया
जा रहा है। उन्हें बार-बार यह समझाया जाता है कि काम करते रहने
से ही उनका नाम होगा और एक बार जब उनका नाम हो जाएगा तो पैसा
भी खुद ब खुद मिलने लगेगा।
इन लोगों के पास अपना मुंह बंद करके काम करने के अलावा
कोई विकल्प नहीं है। अंदर खाते से इन्हें धमकी दी जाती है कि
किसी तरह की शिकायत करने या लड़ने झगड़ने की स्थिति में उन्हे
यूनिट से निकाल दिया जाएगा। एक बार निकाल दिये जाने के बाद
किसी अन्य यूनिट में उन्हें जगह नहीं मिलेगी। अपने नाम का
जिक्र न करने की शर्त पर एक कलाकार ने बताया कि वह पिछले तीन
साल से भोजपुरी फिल्मों में अभिनय करता आ रहा है अभी तक उसे एक
भी पैसा किसी भी भोजपुरी फिल्म के प्रोजेक्ट से नहीं मिला है।
मुंबई में अपना खर्च चलाने के लिए उसे तमाम तरह के अन्य काम
करने पड़ते हैं। यहां तो लोग शूटिंग के दौरान, यूनिट में भी,
अपने पैसे से बाहर से खाना खाकर आने को कहते हैं। शूटिंग स्थल
पर जाने तक का भाड़ा भी नहीं देते हैं।
कलाकारों का तो बुरा हाल है ही इनसे भी बुरा हाल लेखकों
का है। दरअसल अधिकतर भोजपुरी निर्देशक प्रोड्यूसरों को चपेटे
में लेने के लिए खुद ही कहानी का ताना बाना बुनते हैं और
प्रोड्यूसर की स्वीकृति मिल जाने की स्थिति में किसी लेखक को
पकड़ लेते हैं और उससे बेतरतीब तरीके से लिखवाते हैं। अधिकतर
प्रोड्यूसर फिल्म में खुद अभिनय करने की मंशा रखते हैं, इसलिये
वह डायरेक्टर पर इस बात के लिए दबाव बनाते हैं कि उनके लिए खास
तरह की भूमिका लिखी जाये। अक्सर फायनेंसर भी अपने लिए भूमिका
की मांग करते रहते हैं, और प्रोड्यूसरों को मजबूरीवश डायरेक्टर
से उनके लिए भूमिका निकालने को कहना पड़ता है। इन सबका भार
बेचारे लेखक के सिर पर आता है और वह जी कचोट कर फिल्म का
स्क्रीप्ट और डायलाग लिखता है। एक बार शुरु होने के बाद फिल्म
की कहानी किधर जाती है, बेचारे लेखक को भी पता नहीं होता है।
इतना ही नहीं लेखक को फिल्म लिखने के अलावा प्रोड्यर और
डायरेक्टर की अलग से भी कई तरह की सेवा करनी पड़ती है, जैसे
चाय पानी लाना, नाश्ते का इंतजाम करना आदि।
इस तरह के फिल्मी लेखकों को एक फिल्म का पांच सौ या एक
हजार रुपये मिल जाते हैं, जबकि बजट में फिल्म के लेखन के लिए
एक लाख से ढाई लाख रुपये तक दर्शाया जाता है। हद तो तब हो जाती
है जब फिल्म निर्माण के बाद इस तरह के लेखकों को क्रेडिट लाइन
से बाहर रखा जाता है। वे बेचारे मन मसोस कर दूसरी फिल्म की
तलाश में जुट जाते हैं। पिछले दो साल से घोस्ट राइटिंग करने
वाले एक युवा फिल्म लेखक ने कहा, यहां सब कुछ झोलझाल है। वह अब
तक दस से ज्यादा फिल्में लिख चुका है और इनमें से कई फिल्में
रिलीज भी हो चुकी हैं। फिल्म निर्माण के हर स्तर पर वह काम कर
चुका है। यहां तक कि शूटिंग के दौरान उसने स्टंट सीन भी दिया
है। यूनिट में बने रहने के लिए उसे अपने पैर बांधकर एक पेड़ पर
उलटा लटकने का सीन देना पड़ा था। यदि गलती से वह नीचे गिरता तो
उसके सिर के टुकड़े हो जाते। भोजपुरी के एक नामी गिनामी
निर्देशक कहते हैं कि लेखक को हमेशा भूखा रखो, नहीं तो उसकी
सृजनात्मक क्षमता खत्म हो जाएगी। जब इस तरह के सोच वाले
निर्देशक भोजपुरी फिल्मों में हैं तो फिर यहां काम करने वाले
लेखकों का तो भगवान ही मालिक है। यदि गलती से आपने पैसे की
मांग निर्देशक या प्रोड्यूसर से कर दी तो वह सीधे कहते हैं कि
आर्दशनगर इलाके में दो-दो सौ रुपये में स्क्रीप्ट लिखने वाले
घूमते रहते हैं, तुम भाग्यशाली हो कि तुम्हें यहां काम मिला
हुआ है।
अधिकतर भोजपुरी फिल्मों की स्क्रीप्ट शूटिंग शुरु हो
जाने के बाद तक लिखाई जाती रहती है। भोजपुरी में काम करने वाले
कुछ स्टार हीरो सेट पर आने के बाद अंतिम समय अपना सीन देखते
हैं और यदि उन्हें सीन पसंद नहीं आता है तो उसमें अपने तरीके
से तोड़-जोड़ करने को कहते हैं। इस मामले में मनोज तिवारी तो
काफी बदनाम रह चुके हैं। प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के साथ-साथ
वह लेखक तक को पानी पीला दिया करते थे।
असिस्टेंट डायरेक्टरों के साथ तो डायरेक्टर पूरी तरह से
रोम के गुलामों जैसा व्यवहार करता है। स्पाट ब्याय का खर्च
बचाने के लिए वह असिस्टेंट डायरेक्टरों से वे सारे काम लेता
है, जो सेट पर आमतौर पर स्पाट ब्याय करते हैं। उनसे कहा जाता
है कि सारा काम सीख लेने के बाद वे खुद फिल्म बनाने की स्थिति
में आ जाएंगे। इस संबंध में एक असिटेंट डायरेक्टर ने कहा,
एक्शन और कट बोलने के अलावा सेट पर मैं सारे काम करता हूं, फिर
भी मुझसे यही कहा जाता है कि मुझे काम नहीं आता है। यूनिट में
बने रहने के लिए डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को मख्खन लगाते रहना
पड़ता है।
भोजपुरी फिल्मों के प्रोडक्शन विभाग में काम करने वाले
लोगों की स्थिति तो और भी दयनीय है। उच्चकई की हद को पार करते
हुये ये लोग प्रोडक्शन के हर काम में अंदर खाते कमीशन खाने की
कोशिश तो करते ही हैं, कभी-कभी डायरेक्टर के साथ मिल कर स्टाक
चुराने की भी साजिश करने से भी बाज नहीं आते हैं। इस संबंध में
प्रोडक्शन लाइन से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि पैसा ऊपर से
नहीं मिलता है तो हम लोग नीचे से काट लेते हैं। हालांकि पकड़े
जाने पर प्रोडक्शन इन्चार्ज इनकी धुनाई करने से परहेज नहीं
करता है। एक भोजपुरी फिल्म के दफ्तर में रात के नौ बजे
प्रोडक्शन इन्चार्ज को प्रोडक्शन के एक आदमी की धुनाई करते
हुये इस संवाददाता ने खुद अपनी आंखों से देखा है। जबरदस्त
पिटाई के बावजूद वह व्यक्ति बार-बार यही कह रहा था कि उसे इस
प्रोजेक्ट से बाहर नहीं किया जाये।
प्रारंभिक दौर में भोजपुरी फिल्मों को उनके गानों के
लिये याद किया जाता रहा है। अब भोजपुरी फिल्मों में अश्लील
गानों की गंगा बह रही है। भोजपुरी फिल्मों के गानों पर मठवादी
संस्कृति हावी है। गानों का एक मुश्त टेंडर किसी गीतकार को दे
दिया जाता है, और उससे खासतौर से कहा जाता है कि गानों में
अधिक से अधिक अश्लील बोल का इस्तेमाल किया जाये। भोजपुरी के
गीतकार विनय बिहारी अश्लील गानों की रचना करने में अब तक के
अव्वल गीतकार हैं। वैसे तो मठवादी संस्कृति के कारण नये गीतकार
के लिए भोजपुरी फिल्म जगत में पैठ बना पाना मुश्किल है, लेकिन
गलती से कोई इसमें घुस जाता है तो प्रोड्यूसर और डायरेक्टर
उससे भी विनय बिहारी के तर्ज पर अश्लील गानो की रचना करने की
मांग करते हैं। मुंबई में रह रहे भोजपुरी के प्रति संवेदनशील
लोगों का मानना है कि अश्लील गीतों के माध्यम से भोजपुरी की
गंगा जमुना वाली संस्कृति को विकृत तरीके से प्रस्तुत किया जा
रहा है।

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