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बाल
सखा
भारत माता के लाल
तुम बढ़ो बढ़ो, तुम पढ़ो पढ़ो,
तुम रुको नहीं, तुम झुको नहीं।
तुम नई लगन से काम करो, दुनिया में अपना नाम करो।
आलस त्यागो हर किरण आज, कहती है -- मत विश्राम करो।
तुम उठो उठो, तुम चलो-चलो,
तुम रुको नहीं, तुम झुको नहीं।
तुम सारे जग से न्यारे हो, अपनी जननी के प्यारे हो।
तुम छोटे हो पर बहुत बड़े, भारत के राजदुलारे हो।
तुम खिलो खिलो, तुम हंसो हंसो,
तुम रुको नहीं, तुम झुको नहीं।
तुम आंधी में भी मुस्काये, तुम संकट में कब घबड़ाये?
लाखों बाधाएं पड़ीं किन्तु, तुम निज पथ पर बढ़ते आये।
तुम जगो जगो, तुम उगो उगो।
तुम रुको नहीं, तुम झुको नहीं।
फूलों
की
घाटी
अरूण बहुखंडी
गरमी की छुट्टियां थी। दक्षिण भारत के बच्चों का एक दल पिकनिक
में उत्तराखंड स्थित फूलों की घाटी आया। बच्चों के साथ
दयास्वामी व अन्नास्वामी 2 शिक्षक भी थे। वे रेल से हरिद्वार
पहुंचे वहां से जोशीमठ की बस में बैठे। सभी विद्यार्थी
अध्यापकों से कई प्रश्न पूछ रहे थे।
'सर, हमें उत्तराखंड के बारे में बताइए', एक छात्र ने कहा-
भारतवर्ष में 28 प्रदेश व 7 केंद्र शासित प्रदेश हैं। इन 28
राज्यों में से 11 पर्वतीय राज्यों में से एक नया पर्वतीय
राज्य उत्तराखंड का निर्माण दिवस 09 नवंबर वर्ष 2000 में हुआ।
दयास्वामी ने बताया।
सर, हमें उत्तराखंड के बारे में और भी ज्यादा से ज्यादा
जानकारी दीजिए, बस में बैठे सभी बच्चों ने एक स्वर में कहा। इस
प्रदेश में 13 जिले हैं, जो दो मंडल गढ़वाल व कुमाऊं मंडल में
विभाजित हैं। राज्य की रराजधानी देहरादून व हाईकोर्ट नैनीताल
में है। राज्य का क्षेत्रफल 53483 वर्ग किमी है। यहां विकास
खंड 95, तहसील 69, जनसंख्या 84,79562, साक्षरता 72028 प्रतिशत
घनत्व 159 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी, वनक्षेत्र 6 प्रतिशत, 70
विधानसभा, 5 संसदीय व 3 राज्यसभा क्षेत्र हैं। राज्य में 14
रेलवे स्टेशन व दो हवाई अड्डे हैं। राज्य में 6 राष्ट्रीय
उद्यान व 6 वन्य जीव विहार एक बायोस्फीयर, 10 तीर्थ स्थल व 60
से अधिक पर्यटन स्थल हैं। अन्नास्वामी सर ने उन्हें ढेरों
जानकारी दी।
उनकी बस जोशीमठ पहुंची। वहां वह एक होटल में रूके यहां उनको
बताया गया कि यहां से 45 किमी बद्रीनाथ मंदिर है, जबकि 22 किमी
मार्ग पर पांडुकेश्वर के समीप अलकनंदा नदी के तट पर गोविन्दघाट
से ही 'फूलों की घाटी' की यात्रा प्रारंभ होती है, गोविन्दघाट
से 10 किमी रास्ते की चढ़ाई के बाद भ्यूंधार गांव तथा उससे 4
किमी आगे घांघरिया है- घांघरिया जो कि 10,000 फुट की ऊंचाई पर
स्थित है, से एक मार्ग लक्ष्मण गंगा पार कर बांई और 'फूलों की
घाटी' है जो कि 13000 फुट की ऊंचाई पर लगभग 87 वर्ग किमी लंबे
क्षेत्रफल पर फैला है।
घांघरिया से फूलों की घाटी की दूरी 3.5 किमी है। घांघरिया से
ही दूसरा मार्ग पुल के दाहिनी ओर हेमुकुंड साहिब (लोकपाल) को
जाता है जो कि 5.5 किमी की दूरी पर स्थित है। हेमकुंड साहिब
लगभग 15,000 फुट की संसार की सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित सिखों
का ख्याति प्राप्त तीर्थ स्थल हैं, यहां पर एक सुंदर सरोवर
'लोकपाल' के नाम से प्रसिद्ध है तथा एक विशाल गुरुद्वारा भी
बना हुआ है। यहां हिंदुओं का लक्ष्मण मंदिर भी हैं, वहां
उन्होंने जोशीमठ के बाजार व शंकराचार्य मंदिर देखा। उन्होंने
वह वृक्ष भी देखा जो 5000 वर्ष पुराना है जहां शंकराचार्य ने
तपस्या की थी। तत्पश्चात वे बस में बैठकर शाम 4 बजे गेट सिस्टम
से वाहनों के काफिले के साथ जोशीमठ से चले। एक घंटे बाद उनकी
बस पांडुकेश्वर के गोविन्दघाट पहुंची वहां रात को वे होटल में
रूके।
रात्रि में सभी ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम में अपने
दक्षिण भारतीय गीतों से सबका भरपूर मनोरंजन किया। कार्यक्रम के
अंत में अन्नास्वामी के आग्रह पर होटल के वृद्ध चौकीदार ने
उन्हें 'फूलों की घाटी' की कथा सुनाई।
पौराणिक कथाओं एवं महाकाव्यों के अनुसार महाभारत में भी 'फूलों
की घाटी' का विस्तृत एवं रोमांचकारी वर्णन है। विश्वविख्यात
संस्कृत-महाकवि कालिदास ने अपनी 'मेघदूत' पुस्तक में इसका सजीव
एवं रोमांचकारी वर्णन किया है 'फूलों की घाटी' की खोज
सर्वप्रथम वर्ष 1931 में फ्रैंक स्माइथ ने की। यह विश्वविख्यात
पर्वतारोही अपने दल के साथ 'कामेट पर्वत विजय' प्राप्त कर
लौटते हुए नीति घाटी में धवनी नदी के समीप गमसाली स्थान पर
पहुंचे और भटकते हुए उनहोंने पश्चिमी पर्वतीय मार्ग पकड़ा।
लगभग 16800 फुट की ऊंचाई पर भ्यूंधार दर्रे को पार कर
गंधमार्दन पर्वत श्रृंखला से जब वे नर-नारायण पर्वत व बद्रीनाथ
की ओर आ रहे थे कि उन्हें उनके साथियों ने नीचे हेमकुंड शिखर
से उस नरणीक घाटी को फूलों से भरी हुई देखा वे आश्चर्य चकित
एवं आनंद विभोर हो गए। उन्होंने उस घाटी को 'फूलों की घाटी' का
नाम दिया।
'यहां सैकड़ों प्रजाति के विभिन्न रंगीन फूलों से शोभायमान
संपूर्ण घाटी एक विचित्र एवं रंगीन पुष्पोधान का स्वरूप धारण
कर धरती पर एक अलौकिक एवं दिव्य सौन्दर्य बिखेर देती है, इसलिए
इस रमणीक घाटी को 'फूलों का स्वर्ग'/'वैली ऑफ फ्लावर' एवं
'नंदन-कानन' भी कहते हैं'।
वृद्ध चौकीदार से इस कथा को सुनकर वे रोमांचित हो गए और अंत
में वृद्ध ने बताया कि 'फ्रैंक स्मिथ कुछ पुष्पों के नमूने भी
अपने साथ ले गए थे। इस रमणीक घाटी को देखकर वह इतने
मंत्र-मुग्ध हो गए कि पुन: वर्ष 1937 में एडिनबरा के बॉटनिकल
गार्डन की ओर से वह इस घाटी में लगभग 3 माह विश्राम कर लगभग
350 किस्म के फूलों के बीज स्वदेश ले गए। इस पर उन्होंने एक
सुंदर एवं सचित्र पुस्तक 'फूलों की घाटी' नाम से लिखी। जिसके
फलस्वरूप यह छिपी हुई सुंदर घाटी कालांतर में अंतरराष्ट्रीय
ख्याति वाला स्थान बन गया। स्मिथ से पूर्व कई भारतीय इस घाटी
से परिचित तो थे किंतु इसकी ख्याति तथा रहस्योद्घाटन स्माइथ की
इस महत्वपूर्ण एवं सचित्र-दुर्लभ पुस्तक के माध्यम से ही हुआ।'
सभी बच्चों ने वृद्ध की कथा पर जोरदार ताली बजाकर अपनी खुशी
जाहिर की। तत्पश्चात सभी बच्चे अपने कमरों में सोने चले गए।
अगले दिन सभी 4 बजे उठ गए उन्होंने सुबह 6 बजे से 'फूलों की
घाटी' की यात्रा शुरू की। कठिन चढ़ाई के बावजूद बच्चों के
उत्साह से पिकनिक दल 9 बजे 10 किमी दूर भ्यूंधार गांव पहुंचा।
वहां के ग्राम प्रधान सहित गांववासियों ने उनका स्वागत किया।
वहां लंच के बाद वे 4 किमी की यात्रा कर घांघरिया पहुंचे।
रात्रिविश्राम उन्होंने घाघरिया में किया।
अगले दिन घाघरिया में लक्ष्मण गंगा पुल पार कर वे लोग बाएं
मार्ग पर आ गए क्योंकि दाहिने मार्ग से 5.5 किमी दूरी पर
हेमकुंड साहिब है और उन्हें तो 'फूलों की घाटी' जाना था।
उन्होंने बाएं मार्ग पर 3.5 किमी की यात्रा पूरी की। अब वे
फूलों की घाटी पहुंचे चुके थे।
दोनों अध्यापक सहित सभी विद्यार्थी इस नैसर्गिक सुषमा से भरपूर
'फूलों की घाटी' को देखकर खुशी एवं उत्साह से झूम उठे।
'बच्चों, यह बड़ा पीला फूल देख रहे हो, यह 'ब्रह्मकमल' है जो
उत्तराखंड का राज्य पुष्प है। सामने जो वृक्ष है जिसमें खूब
लाल-लाल फूल लदे पड़े हैं। वह 'बुरांश' है यह उत्तराखंड का
राज्य वृक्ष है, अन्नास्वामी सर ने कहा-
थोड़ा आगे चलने पर उन्हें एक पक्षी दिखाई दिया जिसके सिर पर
कलगी थी। यह पक्षी 'मोनाल' है यह राज्य पक्षी है। एक हिरण का
बच्चा दौड़ते हुए देखा 'कस्तूरी मृग' राज्य पशु है। दयास्वामी
सर ने बच्चों को बताया।
'बच्चों, हम सभी यहीं बैठकर खाना खाते हैं। किंतु सभी ध्यान
रखें, कागज व पौलीथीन फेंकना मत, अपने बैग में ही रखना, जिसे
हम यात्रा समाप्ति पर उचित स्थान पर नष्ट करेंगे। धार्मिक व
पर्यटन स्थलों में गंदगी नहीं फैलानी चाहिए। अन्नास्वामी सर ने
समझाया। सभी बच्चों ने वैसा ही किया खाना खाने के बाद वे 3
किमी आगे तक 'फूलों की घाटी' के अंदर तक पहुंच चुके थे।
'बच्चों! यहां 'फूलों की घाटी' में फूलों की हजारों किस्में
हैं, कुछ नाम हैं। हौलीहुक, आइरिश, डायन्यस, डेकी, लिली, पौपी,
कैन्डुल, जीनिया, कैरोसिस, पैटोनिया, मेंहदी, गेंदा, सूर्यकमल,
तुलसी, कुमुदनी इत्यादि इनके अलावा सैकड़ों जड़ी-बूटियां हैं।
जिनमें कुछ प्रसिद्ध नाम हैं। कीड़ा जड़ी, अतीस, सिलाजीत,
संजीवनी कूटी, बज्रदंती, शिवधतूरा, भूतकेश इत्यादि है।
'बच्चो! ध्यान रहें कोई भी फूल व जड़ी बूटियों को सूंघने की
कोशिश न करें क्योंकि यहां कुछ फूल व जड़ियां ऐसी है जिसके
सूंघने मात्र से मनुष्य बेहोश हो जाता है। यह बात मुझे
गोविन्दघाट होटल के वृद्ध चौकीदार से बताई थी।' अन्नास्वामी सर
बच्चों को जब यह हिदायत दे रहे थे तब तक उनके पिकनिक दूर के दो
विद्यार्थी मणि और रत्नम अपने कैमरो से फूलों के फोटो लेने के
लिए घाटी में दूर तक निकल चुके थे।
वे दोनों अपने-अपने रूमाल में कुछ फूल व उनके बीजों को इकट्ठा
कर रहे थे। सायंकाल सभी घांघरिया पर्यटक आवास पहुंचे सभी ने
वहीं विश्राम किया। अगले दिन सुबह यह पिकनिक दल दोनों
अध्यापकों के साथ वापस हरिद्वार को लौटा। गोविंदघाट को मीठी
यादें सभी को बहुत रोमांचित कर रही थी।
चालाक लोमड़ी
एक गड़रिये के पास बहुत-सी भेड़ें थीं। वह उन्हें सबेरे
ही जंगल में चराने ले जाता था। शाम को घर लौटने पर उन्हें गिने
बगैर वह खाना न खाता था। इसीलिए जब भी कोई भेड़ इधर-उधर भटक
जाती तो वह उसे झट खोज लाता।
इसी तरह दिन बीत रहे थे। एक शाम को उसे पता चला कि उसकी
भेड़ों में से तीन कम हैं। उसके माथे पर पसीना आ गया। उसने
जंगल का कोना-कोना छान मारा, पर कहीं भी उसे भेड़ें नहीं
मिलीं। बेचारा रात को बिना खाये ही सो गया। सबेरे वह फिर अपनी
भेड़ों को लेकर जंगल में गया। शाम को भेड़ें गिनीं, तो फिर दो
गायब। इसी तरह धीरे-धीरे भेड़ें कम होने लगीं।
गड़रिये ने भेड़ों के चोर को पकड़ने के लिए तरकीबें
सोचनी शुरू कीं। कई दिन तक वह सोचता रहा, पर कुछ समझ में नहीं
आया। एक दिन वह धूप में आंड़ू के पेड़ के नीचे बैठा था। अचानक
उसका ध्यान पेड़ की ओर गया। उसने देखा कि पेड़ की शाखाओं पर
बहुत सा गोंद इकट्ठा है और उधर से जो चींटियां आती-जाती हैं,
चिपक जाती हैं। देर तक वह इस खेल को देखता रहा, फिर उसने उठकर
अपनी उंगली पेड़ के गोंद में चिपका दी।
खुशी के मारे गड़रिया ऐसा उछला कि उंगली अलग हो गई। वह
दौड़ा-दौड़ा घर गया। वहां से खुरपी और थाली ले आया। खुरपी से
खुरच-खुरच कर उसने काफी गोंद इकट्ठा कर लिया। घर आकर उसने उस
दिन भर पेट खाना खाया और गहरी नींद में सोया। सबेरे उठकर उसने
गोंद की एक जीती-जागती सी भेड़ बनाई। अगले दिन उसे जंगल में ले
गया और उसे उस जगह जाकर रख दिया जहां पर उसको चोर के आने की
आशा थी। खुद पेड़ के पीछे छिप गया। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि
एक लोमड़ी गोंद की भेड़ से चिपकी चिल्ला रही है।
गड़रिये ने लोमड़ी को मारने की सोची तो लोमड़ी ने कहा
कि यदि तुम मुझे मारना ही चाहते हो तो मुझे जिंदा जला दो। ऐसा
करने से मेरी मिट्टी खराब न होगी और तुम अपना बदला भी ले लोगे।
गड़रिया सीधा था, फिर भी लोमड़ी की बातों में नही आया।
(यह जौनसार बाबर की लोककथा है)
ग्रहों की यात्रा
इला
बनर्जी
बहुत जिद्दी लड़के के विषय में लोग अक्सर कहते हैं
-'देखो न छोकरे की जिद! आकाश का चांद पकड़ना जैसा असंभव है,
वैसा ही इस छोकरे की जिद पूरी करना है' पर मेरा खयाल है कि कुछ
दिन बाद माता-पिता अपने पुत्र की जिद की तुलना 'चांद पकड़ने'
से नहीं करेंगे। क्योंकि अब चांद हमारी पहुंच के भीतर आ चुका
है। मनुष्य ने चांद में राकेट भिजवाये हैं, चांद का जो हिस्सा
पृथ्वी से दिखाई देता है उसका फोटो भी उतारा है। कई साल पूर्व
रूस के उड़ाकों ने राकेट पर बैठकर पृथ्वी के चारों ओर चक्कर
लगाया था।
चांद ही क्यों, अब दूसरे ग्रहों की यात्रा करने लगे
हैं। इन ग्रहों पर जाने के लिए टिकट भी पहले से ही धड़ल्ले से
बिकने लगेंगे।
आज मनुष्य के मन में इतनी उत्सुकता है कि किस ग्रह में
हम पहले पहुंचेंगे। किस ग्रह में हम जैसे मनुष्य हैं? इस तरह
के हजारों प्रश्न आज हमारे मन में उठते हैं।
एक शब्द में इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया जा सकता।
कठिनाई यह है कि हमारी पृथ्वी सौर मंडल की है। सूर्य के परिवार
में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, यूरेनस, नेपच्यून और
प्लूटों हैं। अत्यंत छोटे-छोटे करीब 1500 ग्रह और भी हैं। इनकी
स्थिति मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीचों बीच है। इनके भी
अपने-अपने कुछ उपग्रह हैं। जैसे पृथ्वी का एक अर्थात् चांद,
मंगल के दो, बृहस्पति के ग्यारह, शनि के नौ, यूरेनस के चार एवं
नेपच्यून का एक।
यह तो हुई एक सौर मंडल के परिवारों की सूची। इसी प्रकार
ब्रह्मांड में न जाने कितने सौर मंडल हैं और उनका परिवार है।
आधुनिक खगोलशास्त्र ने सौर मंडल के ग्रह-उपग्रहों के संबंध में
जितना पता लगाया है, उसका कुछ हवाला मैं यहां दे रही हूं। इससे
एक ग्रह से अन्य ग्रहों की यात्रा की संभावना के संबंध में जो
सहज प्रश्न उठता है उसका कुछ समाधान होगा।
राकेट के द्वारा चन्द्रलोक में सोवियत रूस ने अपनी
विजय-पताका फहराई है। मैं इसी चन्द्रलोक से अपनी यात्रा शुरू
करती हूं। चन्द्रलोक में पहाड़ और गहरे गढ़ों के अलावा कुछ
नहीं है पर समुद्र की तरह इन बड़े-बड़े गढ़ों में एक बूंद भी
पानी न मिलेगा। इसी प्रकार पर्वतों में घास-फूस, लता-पेड़-पौधे
इत्यादि भी न मिलेंगे। चन्द्रलोक में वायुमंडल भी नहीं है।
वहां के समुद्र, तालाब या नदी में पानी होता तो वह सूर्य के
प्रकाश से जगमगा उठता। इसके अलावा यह जल सूर्य की गरमी पाकर
भाप बनता और मेघों को उत्पन्न करता। पर आज तक चन्द्रलोक की
ऊपरी सतह पर मेघ जमते नहीं दिखे।
यहां का तापमान 120 डिग्री सेंटीग्रेड है और इस तापमान
में कार्बन द्विओषिद (डाय आक्साइड) एवं अन्य भारी गैस तो रह
सकती है; परंतु ओषजन या प्राणवायु एवं अन्य हल्की, गैसों का
सर्वथा अभाव है। अतएव सहज ही समझ में आ जाता है कि यदि मनुष्य
चन्द्रलोक में अपना डेरा डाले तो वह नैसर्गिक रूप से वहां खड़ा
न रह सकेगा।
अब शुक्रग्रह की यात्रा की जाए। यह ग्रह सूर्य से काफी
निकट है। परंतु इस ग्रह में सूर्य का प्रकाश नहीं पड़ता। इसी
से वहां रात दिन नाम की कोई चीज ही नहीं है। शुक्र के आठवें
हिस्से के तीन हिस्सों में आधे में हमेशा दिन एवं उसी परिमाण
में आधे में हमेशा रात्रि रहती है। हां, बाकी पांच हिस्सों में
क्रम से रात-दिन का फेरा लगता है। हमारी पृथ्वी का तापमान 42
या 43 डिग्री सेंटीग्रेड होते ही हम गर्मी से बेचैन हो जाते
हैं; परंतु शुक्र का जो हिस्सा चिर-दिवस का है उसका तापमान 400
डिग्री सेंटीग्रेड है। उसका जो हिस्सा चिर-रात्रि का है वहां
वैसी ही कड़ाके की ठंड है। इस ठंड में कोई प्राणी जीवित नहीं
रह सकता। जिस हिस्से में क्रम से रात और दिन होते हैं वहां भी
भयंकर गर्मी पड़ती है। चन्द्रलोक की तरह यहां भी कार्बन
द्विओषिद की तरह कोई भारी गैस है, अर्थात् ओषजन वायु जैसी हलकी
हवा यहां भी नहीं है। यहां वायुमंडल नहीं है। जल से भरी भाप या
बादल भी इसकी ऊपरी सतह पर नहीं हैं।
अब बृहस्पति, शनि, यूरेनस एवं नेपच्यून इन बड़े ग्रहों
की यात्रा की जाए। उक्त सारे ग्रह पृथ्वी से आकार में बड़े
हैं। इन ग्रहों में वायुमंडल है। परंतु किस प्रकार का वायुमंडल
है यही जानना है। पहले वैज्ञानिकों ने एवं खगोलशास्त्रियों ने
बृहस्पति ग्रह के विषय में जो सिद्धांत खोजा था वह गलत निकला।
बृहस्पति ग्रह के विषय में उनकी धारणा यह थी कि वहां हमेशा
पिघला हुआ लावा बहता है और यह ग्रह सूर्य की तरह तपा हुआ
अग्निपिंड है। पर यह धारणा गलत है। देखा गया है कि जब बृहस्पति
का कोई उपग्रह सूर्य एवं बृहस्पति के बीचोंबीच आ जाता है तब
उसकी छाया बृहस्पति पर पड़ती है। यदि बृहस्पति ग्रह स्वयं
प्रकाशित होता तो ऐसा न होता।
उक्त तीनों ग्रहों की समानता से खगोलशास्त्रियों ने ये
निष्कर्ष निकाले हैं-- इन तीनों ग्रहों के वायुमंडल में
हाइड्रोजन, हिलियम एवं एक जहरीली गैस है। इन ग्रहों में ओषजन
एवं कार्बन द्विओषिद नाम को भी नहीं है। नाइट्रोजन भी नहीं है।
इन तीनों ग्रहों में अमोनिया जमकर बरफ हो गई है। किसी भी स्थान
में खूब कड़ाके की ठंड पड़ने पर जीवों का अस्तित्व होना संभव
है- पर ओषजन-विहीन एवं जहरीली गैसों से भरे वायुमंडल में जीव
नहीं रह सकते अतएव पृथ्वी के प्राणी यदि इन तीनों ग्रहों में
से किसी में उतरें तो गैस की नलियां नाक में लगाकर उतरना होगा।
इन ग्रहों के भूमंडल पर पृथ्वी के प्राणी का ज्यादा समय तक
ठहरना असंभव ही है। लाखों मील तक फैली जहरीली गैस के वायुमंडल
को ओषजन से युक्त वायुमंडल में परिवर्तित करना भी कठिन है।
सौर मंडल का एक अन्य ग्रह है बुध। इसे पृथ्वी की जुड़वा
बहिन कहा जा सकता है। आकार, वजन एवं बनावट की दृष्टि से यह
ग्रह पृथ्वी के अनुरूप ही है। अपने कक्ष में घूमता हुआ यह ग्रह
पृथ्वी के काफी निकट आ जाता है। अन्य कोई ग्रह अपने कक्ष में
परिक्रमा करता हुआ इतने निकट नहीं आता। फिर भी पृथ्वी के सबसे
नजदीक की स्थिति में भी इस ग्रह की दूरी 2 करोड़ 60 लाख मील
रहती है। यह ग्रह सूर्योदय से पहले वह सूर्यास्त के बाद दिखाई
देता है। अतएव पहले कई लोग इस एक ही ग्रह को दो भिन्न्-भिन्न
ग्रह मान लिया करते थे।
हमारी पृथ्वी से इस ग्रह का काफी मेल है, इसीलिए यह
धारणा जागना सहज है कि बुध ग्रह में महासागर होंगे। परंतु यह
धारणा सही नहीं है। यदि महासागर होते तो जल से भरी भाप भी
बनती। यद्यपि बुधग्रह के वायुमंडल में मेघ दिखाई पड़ते हैं, पर
वे खाली मेघ हैं। खुर्दबीन से देखने से यह भली भांति समझ में आ
जाता है। तो ये मेघ किन तत्वों के बने हैं, यह समस्या ही है।
नए समाचारों के अनुसार बुध ग्रह में ओषजनवायु नाम मात्र को भी
नहीं है-- है सिर्फ कार्बन द्विओषिद। सारा ग्रह सूखा एवं
मरुस्थल- सा है पानी का कहीं नाम नहीं; ऊपर से भयानक तापक्रम
है। अतएव तुम सोच ही सकते हो कि यहां पेड़ पौधों का अस्तित्व
असंभव है। पेड़-पौधे ही क्यों, किसी भी प्राणी का अस्तित्व
संभव नहीं है।
अणुवीक्षण यंत्र द्वारा देखने पर पता चला है कि इस ग्रह
में प्रचंड आंधी रात दिन चलती रहती है। हमारी पृथ्वी पर भी
मरुस्थलों में तेज आंधी चलती है, परंतु बुध ग्रह की आंधी की
तुलना में हमारी पृथ्वी की यह आंधी कुछ भी नहीं। यहां का
तापमान भी बहुत अधिक है। यदि हांड़ी में ठंडा पानी रखा जाय तो
वह शीघ्र ही खौलने लगे। इसीलिए बुध ग्रह में प्राणियों एवं
पेड़-पौधों का कोई अस्तित्व नहीं है। भूतकाल में था, इसका भी
कोई प्रमाण नहीं है।
सबसे अंत में मंगल ग्रह की यात्रा की जाय। इस ग्रह के संबंध
में पृथ्वी-निवासियों के मन में बहुत कुतूहल है। पृथ्वी के
बाहर इसी एक ग्रह में प्राणियों के अस्तित्व की संभावना सबसे
अधिक है। किसी-किसी वैज्ञानिक ने तो यहां तक कहा है कि यहां
मनुष्य की तरह बुद्धिमान प्राणी रहते हैं।
मंगल ग्रह हमारी पृथ्वी के आयतन से कुछ बड़ा है। इस
ग्रह का वजन भी पृथ्वी से एक दशांश ज्यादा है। पृथ्वी की जो
माध्याकर्षण शक्ति हमें अपनी ओर खींचें रहती है वही
माध्याकर्षण शक्ति मंगल ग्रह में भी है, परंतु यह माध्याकर्षण
शक्ति पृथ्वी की आकर्षण शक्ति की तरह ज्यादा नहीं है।
इस ग्रह के ऊपरी पृष्ठ पर बहुत से निशान दीख पड़ते हैं
और दिखाई देते हैं उत्तर एवं दक्षिणी छोर पर सफेद टोप। इन दो
चिन्हों को देखकर ही मंगल के प्राणियों के अस्तित्व के विषय
में प्रश्न जागा था पृथ्वी के वैज्ञानिकों के मन में। इन गहरे
निशानों को सर्वप्रथम देखा था वीघेन्स ने सन् 1657 ई में। बाद
में 1877 ई में इटली के खगोलशास्त्री 'स्कीयापेरेली' ने इन
निशानों की जांच बारीकी से की। इन निशानों को देख
'स्कीयापेरेली' ने कहा कि ये निशान मंगल ग्रह की नहरें हैं
जिन्हें मंगल ग्रहवासियों ने सिंचाई के लिए खोदा है।
अब प्रश्न होता है दोनों ध्रुवों के सफेद टोप के विषय
में। वैज्ञानिकों का कहना है कि, चांद के दोनों ध्रुव (उत्तरी
एवं दक्षिणी) प्रदेशों का बर्फ जमने से ये बने हैं। इस खोज के
बाद इन टोपों की घटती-बढ़ती की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान गया
एवं नहरें कभी तो संकरी और कभी चौड़ी दिखाई दीं तब बहुतों ने
निश्चित रूप से यही निष्कर्ष निकाला कि मंगल ग्रह के मध्यभाग
में जल की कमी दूर करने के लिए मंगलवासियों ने नहरें खोदीं और
ध्रुव प्रदेशों को जलापूर्ति का साधन बनाया।
जांच-पड़ताल करने से पता चला कि मंगल ग्रह में पर्वत
नहीं हैं। मध्य भाग मरुस्थल सदृश है। वैज्ञानिकों का कहना है
कि यदि मंगल में जीवन संभव है तो भी सिर्फ ग्रीष्म ऋतु में
पिघली बर्फ की नहरों द्वारा वे इस मरुस्थल जैसे बंजर प्रदेश
में कब तक जीवित रहेंगे? मंगल ग्रह में ओषजन वायु है और शायद
कहीं-कहीं पेड़-पौधे भी होंगे, पर किसी भी प्रकार के प्राणियों
का अस्तित्व आज तक सिद्ध नहीं हुआ।
वर्तमान युग के वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह को मरणोन्मुख
ग्रह कहा है, अर्थात् इस ग्रह की आयु समाप्त हो चली है। इस
ग्रह के वायुमंडल में भी परिवर्तन हो रहा है। जल से भरी भाप कम
होती जा रही है और जो ओषजन वायु आज बची है उसमें किसी प्राणी
का जीवित रहना संभव नहीं।
सौर जगत् परिवार का सबसे अंतिम आविष्कृत ग्रह है
प्लूटो। 1930 ई में यह ग्रह ढूंढ़ा गया था। पर इस आविष्कार के
25 वर्ष पहले से इस ग्रह के अस्तित्व का अनुभव वैज्ञानिक कर
रहे थे। प्लूटों ग्रह के देर से पाये जाने का कारण था
इसकी दूरी। इसकी दूरी सूर्य से 380 करोड़ मील है। इतनी दूर
स्थित होने के कारण इसके संबंध में कुछ ज्यादा जानकारी प्राप्त
नहीं हुई।
इस वर्णन से तुम सहज ही अंदाजा लगा सकते हो कि इस
ग्रहों की यात्रा के विषय में तुम्हारे मन में जो उत्साह है वह
ग्रह पर पहुंचने पर ठंडा पड़ जाएगा। कई ग्रहों में तो शायद
मनुष्य उतर ही न सके। उसे राकेट के विशेष कमरे में ही बैठा
रहना पड़े।
तो सबसे पहले हम कहां जाएंगे? संभवत: चांद में। कारण,
चांद से पृथ्वी की दूरी है प्राय: 3,84,000 किलोमीटर। इतनी
दूरी कई इंजिन-ड्राइवरों एवं नाविकों ने अपने जीवन में ही तय
की है। कोई भी राकेट यदि एक सेकिंड में 112 किलोमीटर की रफ्तार
से चले तो वह 51 घंटे में चांद पर पहुंच जायेगा। पर चांद के
संबंध में हमारे जो स्वप्न हैं वे छिन्न-भिन्न हो जायेंगे,
क्योंकि दूर से दिखाई देने वाला सुंदर स्निग्ध प्रकाशवाला चांद
जल और वायु से विहीन, सूखे गढ़ों से भरा हुआ है। वहां एक
साधारण-सा हरा तिनका भी नहीं है जो खड़ा-खड़ा हमारा अर्थात्
पृथ्वीवासियों का स्वागत करे।
जैसे को तैसा
अनिल
कुमार मिश्र
गंगाजी के तट पर एक मोर रहता था। उसकी सुंदरता और
नृत्यकला अनुपम थी। उस समूचे जंगल में कोई भी मोर उस जैसा नाच
नहीं कर सकता था। नीले गगन में जब काले बादलों के तम्बू तन
जाते थे, चारों ओर वर्षा के साज सज जाते थे, घन घमण्ड से मृदंग
बजाने लगते थे तब वह नाचना शुरू करता था। गंगा के तट पर बहुत
से पक्षियों और मोरनियों के मेले लग जाते, यहां तक कि गंगा से
निकलकर कछुए और मगर भी उस मोर के नाच का आनंद लेते थे।
मोर को कछुओं से विशेष प्रेम था। उनके राजा से उसकी
मित्रता हो गई थी। हर वर्षा ऋतु में सभी उस मोर का नृत्य
देखते, अपना-अपना शिकार खोजते और पेट पालते। उनके दिन बड़े
आनंद से कट रहे थे।
एक दिन प्रात:काल मोर गंगा मइया के तट पर उदास बैठा था।
उसे इस स्थिति में देखकर उसके मित्र कछुओं के राजा ने पूछा -
मित्र! आज उदास क्यों बैठे हो? नृत्य प्रारंभ करो।
मोर फिर भी चुप रहा।
'चुप क्यों हो? बोलते क्यों नहीं?'
'क्या बताऊं? अब नृत्य किसी प्रकार नहीं होगा।'
'क्यों?'
'मेरे प्यारे दोस्त! आज मेरा अंतिम दिन है। एक यमदूत मुझे
पकड़कर ले जायेगा। तुम लोग सदा के लिए छूट जाओगे।'
कछुओं के राजा ने भारी दिल और भले गले से कहा-- मित्र!
ऐसा न होगा। तुम्हें हम अवश्य बचा लेंगे। देखता हूं, कौन
तुम्हें ले जा सकता है। तुम चिंता छोड़ दो। मेरे जीते-जी
तुम्हें कोई ले न जा सकेगा।
मोर ने मित्र की बात मान ली। वह बड़ी लगन से नाचने लगा। नाच
बहुत अच्छा हुआ। क्यों न होता? मोर ने बड़ी लगन से नाच किया
था।
इधर नृत्य हो रहा था, उधर एक बहेलिया अपना जाल बिछाने
के लिए चला आ रहा था। उसने फुर्ती से जाल बिछा दिया। जाल से
बचना बहुत कठिन होता है, साथ ही मोर नाचते-नाचते थक गया था।
बेचारा जाल में फंस गया।
बहेलिए ने जाल से मोर को निकालकर बगल में दबा लिया और खुशी के
साथ घर की ओर चलने लगा।
एक मित्र का दु:ख दूसरा मित्र कभी नहीं देख सकता। इससे
कछुओं का राजा बहेलिए से बोला - अहेरी, इस मोर को छोड़ दो। यह
मेरा मित्र है। मैं तुम्हारा बड़ा एहसान मानूंगा।
वह धूर्तता करता हुआ बोला- अजी कच्छपराज! मैं आपके
मित्र को छोड़ दूं तो अपने बाल-बच्चों का पेट कैसे भरूं? भूख
का प्रश्न बड़ा टेढ़ा होता है। पेट की ज्वाला शांत करना हर एक
का धर्म है।
कछुए ने कहा- बस, इतनी-सी बात है?
'हां।'
'अच्छा, मैं तुम्हें एक कीमती चीज भेंट करूंगा।'
'यदि ऐसा कर सको तो मैं तुम्हारे मित्र को तुम्हें सौंप
दूंगा।'
कछुओं का राजा तुरंत पानी के भीतर चला गया। उसने गहरी डुबकी
लगाई और एक सुंदर लाल लेकर लौट आया। आते ही वह लाल अहेरी के
सामने फेंककर बोला - मोर को छोड़ दो।
बहेलिए ने लाल लेकर उलटा-पलटा। कुछ देर चुप रहा फिर बोला-
मित्र, इस सुंदर मोर के लिए एक लाल और देना पड़ेगा। सिर्फ एक
से काम न चल सकेगा।
'किंतु भाई! आपने एक ही चीज मांगी थी और मैंने उसी के अनुसार
यह कीमती लाल तुम्हें भेंट कर दिया।'
बहेलिए ने कछुए के सामने लाल फेंकते हुए कहा- भाई! बहस की क्या
आवश्यकता? मैं इसे लिए जा रहा हूं। तुम अपना लाल संभाल लो। यदि
इसे लेना है तो दो लाल देने होंगे।
कछुआ बात दे चुका था। उसने बहेलिए से कहा- अच्छा ठहरो भाई! मैं
इसी का जोड़ा गंगा मइया से और लिए आता हूं। मेरे मित्र को
तुम्हें छोड़ना ही होगा, क्योंकि उसके बिना मेरा जीवन व्यर्थ
और नीरस हो जाएगा।
कछुआ फिर गंगा के गर्भ में प्रवेश कर गया। थोड़ी देर में वह
लौट आया। अब उसके हाथों में दो दमकते हुए लाल थे।
उसने बहेलिए से कहा - लो भाई! आ गए तुम्हारे लाल। पर एक
बात मैं तुम्हें बताए देता हूं कि यदि दोनों लाल एक ही हाथ में
लोगे तो तुम्हारा भला न होगा। लो दोनों हाथ बढ़ाओ और इन्हें
संभालो।
बहेलिए ने कछुए की बात सुनते ही दोनों हाथ आगे बढ़ा
दिए। हाथ बढ़ाते ही ढील पाकर मोर उड़ गया।
मोर के उड़ते ही कच्छपराज जल के भीतर चले गए और
जाते-जाते कह गए- तुम अपनी बात पर नहीं जम सके तो मैं क्या कुछ
कम हूं! तुमने एक लिया नहीं, मैं दो दूंगा नहीं। मेरा मित्र तो
अब छूट ही गया है। जाओ, मौज करो। 'जैसे को तैसा' मिल गया।
बच्चों का साहित्य-भवन
राष्ट्रबंधु
आओ बच्चो! बालकाव्य का सुंदर भवन दिखाए;
कैसे बना विशाल-कहानी इसकी तुम्हें सुनाए।
जब से ममता भरी लोरियां हम मां की सुनते हैं-
परी-लोक की मधुर कथाएं मन ही मन गुनते हैं;
सूर तथा तुलसी ने मिलकर जब से लीला गाई;
पड़ी भवन की नींव तभी से सबने खुशी मनाई।
श्रीधर, श्री हरिऔध आदि ने साथी कई जुटाए
ईंटा गारा चूना लाकर खम्भे गये उठाए
पण्डित बदरीनाथ भट्टजी 'बालसखा' बन आए।
'शिशु' लाए आचार्य सुदर्शन कवि लेखक उपजाए।
पण्डित रामनरेश त्रिपाठी ने पहनाई माला।
शरण रामलोचन ने 'बालक' से कर दिया उजाला।
बनने लगा भवन फिर ऊंचा बढ़िया शोभाशाली।
कर श्रमदान बढ़ाई सबने इसकी छटा निराली।
कविवर सोहनलाल द्विवेदी बना राष्ट्र-कविताएं-
लिखने लगे बालकों के हित नई-नई रचनाएं।
बच्चो! पढ़ना 'बाल-भारती', 'बिगुल', 'बांसुरी', 'झरना;'
'दूध बताशा', 'नेहरू चाचा' याद ध्यान से करना।
निरंकार सेवक जी ने तो बना दिए दरवाजे-
जिनसे होकर बच्चे आते, बजा-बजा कर बाजे।
ये 'मुन्ना के गीत' सुनाते, 'माखन मिसरी' देते।
'दूध जलेबी', 'रिमझिम' से भी सबका मन हर लेते।
चन्द्रपाल यादव 'मयंक' जी बच्चों की महफिल में-
बच्चे बन जाते हैं बिलकुल, बस जाते हैं दिल में।
'राजा बेटा', 'हिम्मतवाले' 'बिगुल बजा' रचनाएं;
'सैर सपाटा', 'वीर सेठानी,' सभकक्ष सजवाएं।
कवि 'अशोक' जी की रचनाएं ऊंची मीनारें हैं-
जिन पर 'तितली' मंडराती है, सुरभित दीवारें हैं।
देवसरे हरिकृष्ण रंगीले, गुब्बारे लटकाते।
सब 'सफेद रसगुल्ला' खाकर, चट चट्टी चटकाते।
'स्वर्ण सहोदर' स्वर्ण-कलश हैं 'विभु' का यश अनुपम है।
बच्चों के साहित्य-भवन में इनकी कृति उत्तम है।
श्री योगेन्द्रकुमार बनाते, चित्र विचित्र अनोखे।
शब्द-चित्र की चहल पहल में कार्टून हैं चोखे।
'मधुर' मधुर हैं बड़े, 'प्रेम' जी से उद्यान हरा है।
विष्णुकांत पांडेजी ने भी वैभव-ज्ञान भरा है।
रामवचन 'आनंद', 'विकल', 'राकेश', 'विनोद', 'कलाधर'।
श्री 'अनंत' चौरसिया, 'दीपक' का सब करते आदर।
बहिन 'सुभद्रा' और 'सुमित्रा', 'शकुंतला', औ 'सुषमा'-
सजा आरती थाल पूजतीं, इनकी कहीं न उपमा।
बच्चों के साहित्य-भवन में, अनुपम उजियारी है।
नाथ सिंह ' श्री, बच्चन, दिनकर की संख्या भारी है।
बालसखा बन बालसखा बच्चों के मन को भाता।
'बाल भारती', 'अमर कहानी' 'मनमोहन' 'मनमोहन' इठलाता।
'चन्दा मामा', 'चुन्नू मुन्नू', 'बालक' मन बहलाता।
यहां 'पराग' महकता रहता, 'राजा भैया' गाता।
ताजमहल से बढ़कर सुंदर, उच्च हिमालय जैसा।
बच्चों का साहित्य-भवन है, अनुमप लाल किले-सा।
इसके भीतर राजा रानी, रहते राज-पुरोहित।
जनता रहती, पंडित रहते, होता है सबका हित।
इसके पहरेदार निरंतर इसकी करते रक्षा।
एक बार तो देखा आकर सबसे सुंदर कक्षा।
संसार का पहला तार समाचार
नंदलाल चत्ता
सभ्यता का उदय होने के साथ ही मनुष्य की लगातार कोशिश
यही रही कि वह हर एक कठिनाई का हल ढूंढ़ निकाले। इन प्रयत्नों
में वह सफलता भी पाता रहा। उसने लिपि का आविष्कार करके एक
कठिनाई हल की तो वह पत्थरों पर लिखकर या अन्य वस्तु पर लिखकर
अपने समाचार दूसरे तक पहुंचाने लगा। फिर इन समाचारों को जल्दी
भेजने के लिए उसने बूतरों से काम लेना शुरू किया। उसके साथ ही
पश्चिमी देशों, खासकर योरप में एक नई पद्धति निकाली गई। इससे
निगनलों या संकेतों द्वारा समाचार भेजे जाने लगे। ये संकेत तभी
ठीक तरह काम करते थे जब आकाश साफ होता था। बादल, वर्षा या बर्फ
गिरते समय इनके द्वारा समाचार भेजना असंभव था।
इसके बाद जब बिजली का आविष्कार हुआ और इसके भेद मालूम
हुए तो, खोज करने वाले इसके द्वारा समाचार भेजने की कोशिशें
करने लगे। अंत में तार द्वारा खबर भेजने के लिए बिजली का उपयोग
करने का आविष्कारक कहलाए जाने का सेहरा अमरीका के एक आदमी के
सिर बंधा। मजे की बात यह है कि वह व्यक्ति वैज्ञानिक नहीं, एक
चित्रकार था। उसका नाम सेम्यूल एफबी मोर्स था।
मोर्स के दिमाग में बिजली द्वारा समाचार भेजने का ख्याल
एक मित्र के यहां, भोज में चली बातचीत से उत्पन्न हुआ। फिर
क्या था? वह इस सूझ को प्रत्यक्ष रूप देने के प्रयत्नों में
जुट गया। वह दिन भर अपने तीन, बिन माँ के, बच्चों की और अपनी
जीविका चलाने के लिए रंग की कूचियों से काम करता रहता और रात
को बिजली द्वारा तार भेजने के यंत्रों, बैटरियों और तारों से
युद्ध-सा करता रहता। इस युद्ध में उसे पूरे चार वर्ष लगे।
सन् 1836 ई में उसने ऐसा यंत्र बना लिया, जिससे उसकी यह
आशा और भी दृढ़ हो उठी कि एक दिन तार-खबर का एक पूरा यंत्र बना
लेगा। परंतु उन दिनों लोगों को नए-नए आविष्कारों में इतनी रुचि
न थी जितनी आजकल दिखाई देती है। इससे इस गरीब और मूक आविष्कारक
को अपने इस नए आविष्कार के यंत्र में लोगों की रुचि उत्पन्न
करने में और भी पांच वर्ष लगे। अंत में 1842 ई में वह इस नए
आविष्कार को आजमाने के लिए अमरीका की कांग्रेस के सम्मुख यह
प्रस्ताव पेश करवाने में सफल हुआ कि इस आविष्कार की परख के लिए
30 हजार डालर की रकम लगाकर आजमाइशी तार लगाए जाएं।
कांग्रेस की बैठक की अंतिम रात को भी जब इस प्रस्ताव पर
कुछ भी कार्य न हुआ तो थका-हारा मोर्स निराश होकर घर पहुंचा और
सो गया। पर दूसरे दिन प्रात:-काल ही उसके एक पुराने मित्र की
पुत्री, जिसका नाम एन इल्सवर्थ था, उसके पास यह आनंददायक
समाचार लेकर पहुंची कि आपके चले आने के पश्चात, जब हितैषी भी
आशा खा बैठे थे तो कांग्रेस ने एक विधेयक पास करके आपके
प्रस्ताव को मान लिया है।
यह समाचार सुनकर मोर्स के मन में नई चेतना आई। वह अपने
आविष्कार को प्रत्यक्ष रूप देने में जुट गया। इस तरह संसार की
पहली तार लाइन अमरीका के दो नगरों-वाशिंगटन और बाल्टीमूर- के
बीच में स्थापित की गई। अत: इन्हीं दो शहरों में संसार के पहले
दो तारघर भी खुले।
मई 24, 1844 को मोर्स ने धड़कते हुए दिल से
वाशिंगटन के तारघर में लगी टेलीग्राफ की डेमी (तार भेजने के
यंत्र) पर अंगुलियां रख दीं। उधर दूसरी ओर बाल्टीमूर में उसका
सहायक, अलफ्रेड बेल, उत्सुकता से समाचार पाने की बाट जोह रहा
था। एन इल्सवर्थ को ही, जिसने शुभ समाचार सुनाया था और जो वहीं
खड़ी थी, यह सौभाग्या प्राप्त हुआ कि तार द्वारा भेजने के लिए
पहला समाचार बतावे। ज्यों ही उसके मुख से ये समयानुकुल शब्द
'यह ईश्वर की लीला है' (What God hath wrought) निकले त्यों ही
मोर्स ने अपनी अंगुलियों द्वारा टिकटिक करके इन्हें तार द्वारा
भेजा। बेल ने भी इन शब्दों को ज्यों का त्यों प्राप्त किया और
कुछ ही सेकंडों में उन्हें फिर से वाशिंगटन तार द्वारा वापस
किया। मोर्स को उस समय कितनी खुशी हुई होगी, इसका अनुमान लगाया
नहीं जा सकता।
इस तरह तार द्वारा खबरें भेजने का आरंभ हुआ और मोर्स को
अपने कठिन परिश्रम का फल मिल गया।
राक्षस के चाचा
अशोक कुमार सूरी
गांव में दो मित्र रहते थे। एक का नाम रामू और दूसरे का
श्यामू। कहीं भी जाना होता, दोनों एक साथ जाते। कोई भी काम
करना होगा, एक साथ करते। पर उनके स्वभाव में अंतर था। रामू
बहुत चतुर तथा साहसी था। लेकिन श्यामू इसके विपरीत, डरपोक और
भोला-भाला था। लोग उसे बेवकूफ बनाकर अपना काम निकालते थे।
एक दिन रामू ने श्यामू से कहा - गांव में रहते-रहते जी
ऊब गया है। अब शहर में जाकर रहना चाहिए। वहां जो कमाएंगे वही
खाएंगे।
'हां हां। चलो, मैं भी तैयार हूं।'
शुभ घड़ी देखकर उन्होंने बोरी-बिस्तर संभाला, जेब में
रख लीं कुछ अशर्फियां और शहर की ओर चले पड़े। चलते-चलते वे एक
जंगल में पहुंचे। उस समय दोनों थककर चूर हो रहे थे। पीठ पर
बिस्तर लादे-लादे उनकी कमर दुखने लगी थी। एक छायादार पेड़ के
नीचे उन्होंने सामान रखा और वहीं लेटकर विश्राम करने लगे। तभी
एक तरफ से साधु के वेश में एक ठग आया। रामू और श्यामू को देखकर
उसने सोचा कि इन्हीं पर हाथ साफ करना चाहिए। वह भी वहीं लेट
गया। रामू और श्यामू ने देखा कि एक महात्माजी आ लेटे हैं तो
उनहोंने बड़े प्रेम से साधु वेशधारी ठग से बातें करनी आरंभ कर
दीं। बातों ही बातों में ठग ने पता लगा लिया कि दोनों के पास
काफी अशर्फियां हैं। उसने उनको हथियाने का एक उपाय सोचकर कहा-
मैं ऐसी तरकीब बता सकता हूं जिससे फकीर भी लखपती बन जाय, परंतु
इसके लिए चार अशर्फियां देनी होंगी।
'लखपति! तो बताइए न, मैं अशर्फियां देने को तैयार हूं'-
श्यामू ने उतावलेपन से कहा। रामू ने उसे बहुत समझाया पर वह न
माना। उसने अपनी जेब से चार अशर्फियां निकालकर साधु बने ठग के
हाथ में रख दीं। साधु ने अशर्फियां कमंडल में रखते हुए कहा-
'तरकीब यह है कि रास्ते भर में तुम्हें जो तीन चीजें मिलें
उन्हें तुम अपने साथ लेकर बढ़ो।' अब साधु चलते बने। जरा-सी बात
पर चार अशर्फियां देने के लिए रामू, श्यामू पर बहुत नाराज हुआ।
परंतु उसने कहा कुछ नहीं। थकान दूर हो जाने के पश्चात वे आगे
बढ़े।
दो कोस चलने पर उनको एक गधा हरी-हरी घास चरता हुआ दिखाई
पड़ा। श्यामू को उस साधु की बात याद हो आई। उसने रामू से कहा-
'रामू भइया, इस गधे को क्यों न अपने साथ ले लें। इस पर बोझ ला
देंगे।' रामू राजी हो गया। श्याम ने गदहे को पकड़ा और उस पर
बोझ लाद दिया। दोनों आगे बढ़े।
कुछ ही दूर चले होंगे कि श्यामू की दृष्टि एक जंगली बेल
पर बैठी हुई 'ततैया' पर पड़ी। ततैया जोर से डंक मारती थी।
श्यामू ने फिर रामू से कहा- भइया, इस मक्खी को पकड़ लूं? शायद
साधु की बात सच्ची हो जाय।
'हां हां, पकड़ लो न।'
श्यामू ने उस मक्खी को पकड़कर एक डिबिया में बंद कर
दिया और आगे बढ़ा।
थोड़ी दूर जाने पर उन्हें रास्ते में एक तवा पड़ा मिला।
श्यामू ने फौरन कहा- 'रामू यार तवे को भी क्यों न गदहे पर रख
लिया जाय? कुछ नहीं तो इस पर रोटी ही सेकेंगे।' रामू ने आज्ञा
दे दी। श्याम ने तवे को उठाकर गदहे पर रखा और उसे हांकता हुआ
चलने लगा।
चलते-चलते रात हो गई। सरदी के दिन थे। कुहरा पड़ने लगा।
ठंड के मारे दांत बजने लगे। इसी समय जंगली जानवरों ने चीखना
आरंभ कर दिया। बेचारा श्यामू बहुत डर गया। उसने कांपते हुए
कहा- रामू भइया, जरा इधर-उधर देखो। अगर कोई ठहरने का स्थान हो
तो वहीं चलें। यहां ठहरने से तो प्राणों का भय है।
रामू ने चारों ओर दृष्टि घुमाई। अचानक उसे किसी महल की
धुंधली-सी छाया दीख पड़ी। उसने कहा- श्यामू, कुछ दूर एक महल सा
दिखाई देता है। चलो, वहां किसी कोठरी में सो रहेंगे।
बात की बात में दोनों महल के पास पहुंचे। उन्हें दरवाजे
पर कोई पहरेदार निदखाई पड़ा। दोनों मित्र दरवाजे को खोलकर
अंदर गए। अंदर जाने पर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने
सारा महल सूना पाया। महल में कीमती वस्तुएं थीं। रेशम की
चादरों से ढके हुए पलंग हर एक कमरे में बिछे थे। रामू-श्याम ने
एक अच्छा-सा कमरा छांटकर वहां अपना डेरा जमाया। फिर बाहर का
दरवाजा बंद करके आराम से सो गए।
यह महल एक राक्षस का था। वह बड़ा शक्तिशाली था।
बड़े-बड़े पत्थरों को एक दूसरे से लड़ाकर चूरा कर देता था।
देखने में वह बड़ा डरावना था। उसकी सूरत भी डरावनी थी। उस समय
वह घूमने गया हुआ था। जब वह लौटा तो महल के बाहर आदमियों के
पैरों के निशान देखकर बड़ा चकित हुआ। उसने दरवाजा बंद देखा तो
चीखकर बोला- महल के भीतर कौन है?
बिजली-सी गड़गड़ाहट सुनकर रामू-श्यामू की आंख खुल गई।
श्यामू तो डर से थरथराने लगा। रामू दौड़कर दरवाजे के पास
पहुंचा। उसने एक छेद से देखा कि भयंकर राक्षस खड़ा-खड़ा गुस्से
से पैर पटक रहा है। वह डर गया। लेकिन उसने साहस न छोड़ा। वह भी
ताकत लगाकर चीखा-तू कौन है? इस तरह चीख क्यों रहा है?
राक्षस ने बाहर से कहा-मैं इस महल का मालिक हूं। तू कौन
है? जानता नहीं, जो भी इस महल में आता है उसे मैं कच्चा ही खा
जाता हूं।
रामू बोला- तो तू मेरा भतीजा राक्षस है। जानता नहीं,
मैं तेरा चाचा हूं चाचा। भतीजे से लड़ना ठीक नहीं इसलिए यहां
से भाग जा। फिर कभी न आना, वरना तुझे खा जाऊंगा।
अब तो राक्षस बड़ा चकराया। उसने मन ही मन कहा- 'चाचा'
पर आज तक तो मैंने अपना कोई देखा ही नहीं। कुछ देर तक सोचने के
बाद बोला- तो तुम मेरे चाचा हो। जरा अपनी सूरत तो दिखाओ।
रामू घबरा गया। उसने चारों ओर देखा। एकाएक उसे गदहा दुम
हिलाता दीख पड़ा। उसे एक तरकीब सूझी। उसने जरा सा फाटक खोलकर
गदहे की सूरत बाहर कर दी। गदहे की सूरत देख कर राक्षस डरकर
पीछे हटा। उसने आज तक गदहा देखा भी न था। अनदेखी सूरत देखकर
उसने सोचा, हो न हो यही मेरा चाचा है।
उसने कहा - 'चाचाजी, सूरत तो देखे ली, अब जरा खाना
दिखाओ। खाते क्या हो?' रामू ने झट दरवाजे की दरार में से काला
तवा फेंककर कहा लो देखो। यह रही मेरी रोटी। इसे रोज शाम सबेरे
सात नदियों के पानी के साथ पकाकर खाता हूं।
राक्षस ने ताज्जुब से तवा उठाकर देखा। परीक्षा करने के
लिए उसने तवे को मुंह में रखा। पर वह टूटा नहीं। राक्षस ने जब
सारी ताकत लगा दी तब जाकर कहीं तवे का थोड़ा सा भाग टूटा।
परंतु राक्षस के दो दांत टूट गए। उसने सोचा कि मेरे चाचा तो
मुझसे भी ताकतवर हैं जो रोज इतनी कड़ी रोटी खाते हैं। पर उसने
सोचना कि एक परीक्षा और ले लूं तब जाऊं।
वह बोला - 'चाचाजी, अगर आप मेरी उंगली में दांत चुभो
दें तो मैं चला जाऊंगा।' अब राक्षस ने अपनी उंगली फाटक के अंदर
कर दी। रामू ने हर तरफ दृष्टि दौड़ाई, किंतु कोई वस्तु न दिखाई
दी। तभी डरते हुए श्यामू को एक तरकीब सूझी। उसने जेब से डिबिया
निकालकर उसका ढक्कर खोला डिबिया में से क्रोधित ततैया मक्खी
निकली। सामने राक्षस की उंगली पाकर उसने बड़े जोर से डंक मारा।
बेचारा राक्षस चीख उठा। तभी अंदर से रामू बोला - अबे ओ राक्षस!
अभी और कुछ अपने चाचा से पूछना हो तो पूछ लो।
राक्षस अब बेहद घबरा गया था। वह उंगली सहलाता हुआ बोला- नहीं
चाचा! अब कुछ नहीं पूछना। मैं जा रहा हूं।
अचानक अंदर से गदहा रेंका- ढेंचू ढें...ढें....ढें
ढेंचूं ढे ढेंचू। राक्षस ने समझा, चचा मुझे खाने आ रहे हैं। वह
सिर पर पैर रखकर भागा। फिर कभी उस ओर न आया।
महल में बहुत दौलत थी। रामू-श्यामू उसे बांटकर वहीं
रहने लगे।
जागा देश हमारा
अधीर
सुख-समृद्धि-सी जहां बह रही निर्मल सुरसरि-धारा,
जागा देश हमारा।
जहां बुद्ध की गूंजी वाणी, दुख-विनाशिनी, शुभकल्याणी।
सत्य, अहिंसा, त्याग प्रेम की जग में जिसने कीर्ति बखानी-
किया सार्थक अब तक जिसने विश्व शांति का नारा।
जागा देश हमारा।
क्षमाशील है, अति उदार है, यह बापू की यादगार है।
'जियो और सबको जीने दो' कोटि-कोटि जन की पुकार है।
जिसने दुनिया को सिखलाया सच्चा भाई-चारा।
जागा देश हमारा।
क्षमाशील है, अति उदार है, यह बापू की यादगार है।
'जियो और सबको जीने दो' कोटि-कोटि जन की पुकार है।
जिसने दुनिया को सिखलाया सच्चा भाई-चारा।
जागा देश हमारा।
वीर शिवा-राणा का घर है, अर्जुन का गाण्डीव अमर हैं;
इस न छेड़ो महाशक्ति का सोया ज्वालामुखी प्रखर है।
स्वाभिमान का चक्र सुदर्शन है जिसका रखवारा,
जागा देश हमारा।
कदम बढ़ाओ
रमेशचन्द्र गुप्त 'चन्द्रेश'
आओ साथी! कदम बढ़ाओ। दुश्मन को तुम पाठ पढ़ाओ।
छोटे-छोटे हम बच्चे हैं, इसकी कुछ परवाह नहीं है।
हमको भ्रम में डाले, रोके, ऐसी कोई राह नहीं है।
गाओ, गान देश का गाओ। आओ साथी! कदम बढ़ाओ।
नहीं मौत में ताकत इतनी जो आकर हमसे टकराए;
है यह जन्मभूमि वीरों की-दुश्मन मिट्टी में मिल जाए;
आजादी का गीत सुनाओ। आओ साथी! कदम बढ़ाओ।
अर्जुन भीम यहां जन्मे हैं, जन्मे हैं राणा प्रताप-से;
अब तक कण-कण सुलग रहा है वीर शिवा के अमिट ताप से;
जलती हुई आग ज्यों छाओ। आओ साथी! कदम बढ़ाओ।
राम-कृष्ण की यह धरती है, औ' अनुपम महिमावाली है;
गांधी-तिलक, बुद्ध नानक के पावन आदर्शोंवाली है।
सब मिल इसका मान बढ़ाओ। आओ साथी! कदम बढ़ाओ।
इसकी इंच इंच धरती पर, हम हंस-हंस सिल बलि कर देंगे।
जिसकी टेढ़ी नजर उठेगी उसका हम जीवन हर लेंगे।
बढ़ो शत्रु का दिल दहलाओ। आओ साथी! कदम बढ़ाओ।
मुस्लिम हो या सिख ईसाई, राजपूत या तुर्किस्तानी।
अब तो धर्म हो गया सबका, एकमात्र बस हिंदुस्तानी।
राष्ट्र-ध्वजा नभ में लहराओ। आओ साथी! कदम बढ़ाओ।।
शेषनाग की अंगूठी
डा गोपालप्रसाद 'वंशी'
सुदर्शन नाम का महाजन मैसूर में व्यापार करता था। उसके
दो लड़के थे। बड़े का नाम माधो और छोटे का साधो था। सुदर्शन का
ध्येय केवल धन बढ़ाना था। वह अपने पुत्रों को रुपये देकर बाहर
भेजता और थोड़े ही दिनों में रुपये को दूना कर लाने के लिए
कहता।
माधो जुआड़ी निकल गया। हां, साधो सीधा था। सुदर्शन ने
दोनों बेटों को एक-एक हजार रुपये देकर व्यापार के लिए बाहर
भेजा। माधो जुए में एक-दो दिनों में ही दो हजार रुपये जीतकर
पिता को दे गया।
साधो जुआ खेलना पाप समझता था। वह जानता था कि जुए से
कमाया हुआ धन अंत में दु:ख देता है। राजा युधिष्ठिर और राजा नल
का सर्वस्व-नाश उसकी आंखों के सामने नाच रहा था। उसको रास्ते
में एक वृद्धा स्त्री मिली। वह कोई देवी थी। उसके पास एक बड़ा
ही सुंदर सांप था। साधो ने एक हजार में वही सांप खरीद लिया।
साधो जब घर लौटा तब उसका पिता सुदर्शन सांप को देखते ही
क्रोध से आग-बबूला हो गया। उसने सांप के साथ साधो का घर से
निकाल दिया।
साधो की दीन दशा देखकर सांप ने कहा - 'यदि तुम मुझे
मेरी मां के पास पहुंचा दो तो मैं तुम्हें 'शेषनाग की अंगूठी'
दिलवा दूंगा, जिससे तुम्हें सदा सुख मिलेगा।' साधो राजी हो
गया। उसने सांप को उसकी माता के पास पहुंचा दिया। सर्पराज की
मां ने बहुत प्रसन्न होकर साधो को 'शेषनाग की अंगूठी' दी और
कहा - इस अंगूठी में यह गुण है कि इससे जो कुछ मांगा जाएगा वही
मिलेगा। गाय के दूध से सवा बित्ता भूमि लीप कर, एक चौकी पर
अंगूठी रख दे और जो मांगना हो, मांगे।
संयोग की बात, उसी समय एक राजा ने प्रतिज्ञा की थी कि
जो कोई उसके दिए हुए मानचित्र के अनुसार पंद्रह दिनों में किला
बना देगा उससे वह अपनी इकलौती बेटी का ब्याह करके उसे सारा
राज्य दे देगा। राजा के कोई पुत्र न था।
यह सुनकर साधो बहुत प्रसन्न हुआ। उसने राजा के पास पहुंच कर
किला बनवाने का जिम्मा लिया। बस, उसने 'शेषनाग की अंगूठी' की
परीक्षा ली। ईश्वर की लीला ऐसी विचित्र कि परीक्षा सफल हुई और
सचमुच किला शीघ्र तैयार हो गया। राजा ने प्रतिज्ञानुसार साधो
से अपनी राजकुमारी का ब्याह कर दिया और राज्य भी दे दिया।
उधर सुदर्शन के मर जाने पर माधो ने सारी सम्पत्ति जुए
में उड़ा डाली। जिस रास्ते से लक्ष्मी आई थी उसी रास्ते से चली
गई। माधो भूखों मर रहा था। जब साधो को यह समाचार मिल गया तब
उसने बड़े भाई को परिवार सहित बुलवा लिया और अपने राजमहल के
पास ही एक सुंदर मकान में आराम से रखा।
जो पाप से बचता है उसके लिए सांप भी हीरे का अनमोल हार बन जाता
है।
जागो, जागो, भोर हुआ है!
जगदीशचन्द्र शर्मा
प्यारे बच्चो! जाओ, जाओ, बड़ा सुहाना भोर हुआ है।
दिग्मंडल में बाल-विहंगों के गीतों का शोर हुआ है।
लो, पूरब से रवि ने अपनी कंचन-सी किरणें बिखराई।
मधु-पराग से भरी हुई नन्हीं-नन्हीं कलियां मुस्काई।
मुस्काया धरती का कण-कण, मुस्काई नूतन आशाएं।
जन-जन के मन में जागी हैं स्नेहमयी नव-अभिलाषाएं।
तुम भी जगती के आंगन में जी भर कर उल्लास बहाओ।
सबकी जीवन-फुलवाड़ी में प्यार भरा विश्वास जगाओ।
प्यारे बच्चों! जाओ, जाओ, बड़ा सुहाना भोर हुआ है।
दिग्मंडल में बाल-विहंगों के गीतों का शोर हुआ है!
गप्पी बादशाह
हरिकृष्ण देवसरे एमए
पात्र 1- बादशाह, 2- मियां जुम्मन, 3- नवाब सिंह 4- मुंशी
चन्दूलाल, 5- जोरावर सिंह 6- नकीब।
(मंच पर सुंदर ढंग से सजा हुआ तख्त रखा है। सामने कालीन
बिछा है। दीवालों से पर्दा टंगा है। ऊपर रंग-बिरंगे गुब्बारे
और झंडियां लटक रही हैं। एक बड़ा-सा हुक्का चौकी पर रखा है।
पर्दा उठते ही नकीब का प्रवेश)
नकीब- बाअदब! बामुलाहिजा होशियार। बादशाहे आलम, सितारे
गप्प, नवाबे-गप्प, सरदार बहादुर, राय बहादुर बादशाह हुजूर
गप्पी खान तशरीफ ला रहे हैं।
(नकीब तख्त के पीछे खड़ा हो जाता है। उसके हाथ में छतरी
और ताड़ का पंखा है। बादशाह चूड़ीदार पाजामा और अच्छी पोशाक
पहने हैं। सिर पर कलगीदार साफा है। पीछे-पीछे सभी दरबारी आते
हैं)
बादशाह- ओफ, भइ आज तो बड़ी धूप है। (मंच पर लटकने वाले
लट्टू की तरफ इशारा करते हुए) देखो न, कितनी तेजी से सूरज चमक
रहा है। नकीब, जरा छाता तो खोलो। उफ कितनी धूप है।
नकीब- (बादशाह के कान में) हुजूर, गप्प ऐसी हांकिए कि
झूठी न मालूम हो।
बादशाह- चुप रहो जी! जल्दी से छाता खोलो। देखते नहीं,
कितना पसीना निकल रहा है।
नकीब- हुजूर, यकीन मानिए, आज तो बेहद सर्दी है। आज पंखे
की ठंडी हवा और दो-चार कुल्फियो की जरूरत है। इजाजत हो तो....
मियां जुम्मन- जी हां हुजूर। मैंने तो सुना है कि आज
कहीं बर्फ गिरी है। यों तो इस बात को मैं गप्प ही समझता, पर
यकीन ऐसे आया कि कल रात मैं अपनी टोपी आंगन में रखकर सो गया
था। सुबह उठा तो मैंने देखा उस पर बर्फ के डले पड़े हुए हैं।
बादशाह- झूठ कहते हो। ये सब गप्पे हैं। आज तो इतनी तेज
धूप है कि...
नकीब- हुजूर, माफ कीजिएगा। इस वक्त दिन नहीं, रात है।
बादशाह- (गुस्से से) चुप रहो। तुम लोग मेरी गप्पों को
झूठ साबित करना चाहते हो। मैं सबकी चालें समझता हूं। अच्छा तो
सुनो, आज मुझे एक हजार रुपये की एक थैली मिली है। जो कोई सबसे
अच्छी गप्प सुनाएगा उसे वह थैली दूंगा। इसी बहाने यह भी पता लग
जाएगा कि कौन सबसे बड़ा गप्पी है।
नकीब- (झुककर सलाम करता है) वाह हुजूर! एक बार ऐसे ही
एक गप्पी बादशाह ने कहा था। वह तो आपसे भी बड़ा गप्पी था।
बादशाह- हमसे बड़ा गप्पी था! बिलकुल झूठ। तुम्हारी यह
मजाल...
नकीब- बन्दा तो हुजूर का नमक खाता है। पर हां, वह
बादशाह भी था बड़ा गप्पी। यकीन कीजिए, वह ऐसी गप्पें हांकता था
जैसे पुराने जमाने में रथ के घोड़े हांके जाते थे-
जोरावरसिंह- हुजूर! नकीब सही कह रहा है। एक तांगे में
गप्प को हांकते हुए तो मैंने भी उन्हें देखा था। मैं तो थोड़ी
देर के लिए चक्कर में आ गया था। पर तभी वह गप्प रस्सी तुड़ाकर
भागी। उसे चट से मैंने पकड़ लिया था।
नकीब- हुजूर, जोरावरसिंह बिलकुल सफेद झूठ बोल रहे हैं।
नवाबसिंह- जी हां, जोरावरसिंह सचमुच झूठ बोल रहे हैं।
उस गप्पी बादशाह की गप्प को तो मैंने भी देखा है। वह उन्हें
इतनी मजबूती से बांधते थे कि उसकी क्या मजाल जो छुड़ाकर चली
जाय।
बादशाह- हूं, यह बात है।
नवाबसिंह- जी हां। बात दरअसल यह थी कि उस बादशाह को
गप्पों का बड़ा शौक था। सो उसने बड़ी ऊंची-ऊंची गप्पें पाल रखी
थीं। इतनी ऊंची, जैसे ऊंट।
बादशाह- कुल कितनी गप्पें रही होंगी?
नवाबसिंह- यही कोई लाख दो लाख।
मुंशी चंदूलाल- हुजूर! ये भी सरासर गप्पें हैं। झूठ
हैं। भला गप्प कोई चलती-फिरती चीज है!
बादशाह- क्यों नहीं। वह तो सात समंदर पार भी जाकर अपना
तमाशा दिखा सकती है। (रूककर) हां, भइ नवाबसिंह, वह बादशाह अपनी
गप्पों को रखता कहां था?
नवाबसिंह- हुजूर! उसने मीलों लम्बी एक ओसार बनवा ली थी।
उसी में खूंटे से बांधकर वह उन्हें रखता था।
बादशाह- अरे वाह! कमाल है। सचमुच वह बादशाह गप्पों का
बहुत शौकीन था।
नकीब - नहीं हुजूर, भला आपसे बढ़कर गप्पी...
बादशाह- चुप रहो! यह गप्प नहीं है। यह सच है। हम सचमुच
गप्पों के शौकीन हैं।
मुंशी चंदूलाल- हुजूर! अगर मुझे कुछ मौका दें तो निवेदन
करूं।
बादशाह- जरूर कहो मुंशीजी। क्या कहना चाहते हो?
मुंशी चन्दूलाल- बात दरअसल यह है कि इन गप्पों से भी एक
बड़ी चीज उसके पास थी। उसके बारे में आप सुनें तो सोचेंगे कि
वह भी शायद गप्प है।
बादशाह- पर तुम्हें कैसे मालूम?
मुंशी चंदूलाल- जी, मैं तो उस बादशाह के साथ था।
नकीब- हुजूर, मुंशीजी झूठ बोल रहे हैं।
बादशाह- तो तुम्हें इससे क्या मतलब।
मुंशी चंदूलाल- हां तो हुजूर, उस गप्पी बादशाह के पास
एक बांस था।
बादशाह- (जोर से हंसता है) भइ चंदूलाल लगता है तुम
सचमुच गप्प हांक रहे हो।
मुंशी चंदूलाल- हुजूर, वह बांस बहुत बड़ा था। जब वह
गप्पी बादशाह ज्योतिषियों की गप्पों से हैरान हो उठता और पानी
नहीं बरसता तो उस बांस से आसमान में छेद कर देता। बस, पानी
बरसने लगता।
बादशाह- भाई यह तो ताज्जुब करने की बात है।
जोरावरसिंह- हुजूर, यह झूठ कहते हैं। इतना बड़ा बांस
होना असंभव है। और अगर था तो उसे रखते कहां थे?
मुंशी चंदूलाल- उसी ओसार में जहां गप्पें बांधी जाती
थीं।
(सब लोग ठहाका मारकर हंसते हैं)
नकीब- हुजूर! लगता है मुंशी चंदूलाल बाजी जीत गए।
बादशाह- नहीं। अभी बाजी का फैसला होगा।
मुंशी चंदूलाल- हुजूर, इंसाफ कीजिए। मेरी गप्प का अब
कोई जवाब नहीं दे सकता। मुझे रुपयों की थैली दी जाए।
बादशाह- रुपयों की थैली? अरे भइ, वह भी तो एक गप्प ही
थी न।
नकीब- गोया बाजी बादशाह हुजूर ने ही मार दी। पर यह झूठ
है। आप बादशाह नहीं हैं (साफा उतार लेता है और उसकी नकली मूछें
हटा देता है) तुम तो सुनील हो सुनील।
(सब हंसते हैं)
बादशाह- और तू भी तो नकीब नहीं, मोहन है।
मुंशी चंदूलाल- (बाकी लोगों से) अरे खड़े-खड़े ही-ही
क्यों कर रहे हो! जल्दी से भागो वरना अपनी गप्पों की भी पोल
खुल जाएगी।
(सभी हंसते हुए भागते हैं)
(पर्दा गिरता है)
मेरा नौकर
गुरुप्रसाद गुप्त 'गुरु'
चौधरिया मेरा नौकर है, बुड्ढा-सा तन का जर्जर है।
कुछ सफेद कुछ काले बाल, चलता बिलकुल रद्दी चाल।
उसकी है पोशाक निराली, गंदा गमछा कुर्ता खाली।
प्रति दिन दस आने है पाता, डेढ़ पाव आटा ले आता।
साग आदि घर से ले आता, टिक्कड़ चार बनाकर खाता।
पीता है अफीम की बौंड़ी, नहीं टेंट में रखता कौड़ी।
ड्योढ़ी पर बैठा रहता है, बच्चों से ऐंठा करता है।
चूर नशे में रहता हरदम, अपनी ही कहता है हरदम।
कोई काम अगर पड़ता है, टाल टूल करने लगता है।
सुनकर करता आना-कानी, काम पड़े मर जाती नानी।
पढ़कर आता जब शिवबालक, अपने साथ लिवा कुछ बालक-
उसको सभी चिढ़ाने लगते, चोर चोर कह गाने लगते।
डांट बताकर लट्ठ उठाता, सब बच्चों का दल भग जाता।
नशेबाज बत्तड़ भड़भड़िया।
मेरा यह नौकर चौधरिया।
इंसान बनूंगा
कमलाकर दीक्षित
अम्मां! मैं इंसान बनूंगा, सारे जग में नाम करूंगा।
जो आएगा तुझसे लड़ने, उसका मर्दन मान करूंगा।
अम्मा! मैं इंसान बनूंगा।
आंधी आए या हो पानी, बढ़ता कदम नहीं रोकूंगा।
अम्मां! मैं इंसान बनूंगा।
पढ़-लिखकर विद्वान बनूंगा, सदा न्याय से काम करूंगा।
मातृ-भूमि के लिए सदा मैं, तन-मन-धन बलिदान करूंगा।
अम्मां! मैं इंसान बनूंगा।

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