बाबा दुबे ने बसपा को हैसियत बताई

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जौनपुर (उप्र)। विख्यात उद्यमी और पहले से ही सामाजिक और राजनीतिक रूप से ताकतवर, बाबा मित्र परिषद के मुख्य संचालक और बाबा दुबे के नाम से विख्यात ओमप्रकाश दुबे बहुजन समाज पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं। इससे जौनपुर सहित बनारस मंडल में बसपा को तगड़ा झटका लगा है। बाबा दुबे ने जौनपुर में बसपा को खड़ा करने और बनारस मंडल में ब्राह्मणों को बसपा से जोड़ने का बड़ा काम किया था। इससे बसपा को यहां काफी मजबूती मिली थी। लेकिन अब बाबा दुबे के बसपा छोड़ते ही ब्राह्मण समाज भी बसपा से टूट गया है और मायावती का जौनपुर से माफिया सरगना धनंजय सिंह को लोकसभा चुनाव जिताना खतरे में पड़ गया है।
ओमप्रकाश दुबे 'बाबा दुबे' इस क्षेत्र में एक ऐसे राजनेता माने जाते हैं जिनका कि समाज सेवा कार्यों में बचपन से ही बढ़ चढ़कर ही योगदान रहा है। उनकी सामाजिक उपलब्धियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। मायावती ने बाबा दुबे को सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव का बहुत लाभ उठाया है। माफिया सरगना धनंजय सिंह के अत्याचारों से क्षुब्ध दलितों को बाबा दुबे के बसपा में आने के बाद बहुत संरक्षण मिला। वैसे भी बाबा दुबे दबे कुचलों की हर तरह से मदद के लिए जाने जाते रहे हैं। वे जब बसपा में शामिल हुए थे तो उनके शुभचिंतकों ने उन्हें सलाह भी दी थी कि वे स्वयं ही इतने लोकप्रिय हैं इसलिए उन्हें बसपा की क्या जरूरत है लेकिन उन्होंने मायावती के लिए जबर्दस्त काम किया और बसपा की ब्राह्मण भाईचारा कमेटी के कोआर्डिनेटर के रूप में ब्राह्मणों को बसपा से जोड़ने का काम किया।
बाबा दुबे बाबा मित्र परिषद के रूप में सामाजिक कार्यों का संचालन करते हैं और यह उल्लेखनीय बात है कि इस समय इस परिषद के करीब तीस हजार सक्रिय सदस्य हैं। इसी परिषद के बैनर तले अनेक नि:शुल्क स्वास्थ्य शिविर लगवाए गए हैं, विकलांगों को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराए गए हैं, पोलियो आपरेशन और आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों की बेटियों का शादी विवाह कराने में भी यह परिषद बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है। जौनुपर में लोग इन्हें भारी सम्मान देते हैं और इनके सामाजिक कार्य दूसरों के लिए काफी प्रेरणादायक होते हैं। राजनीतिक रूप से भी बाबा दुबे काफी मजबूत नेता के रूप में जाने जाते हैं इसीलिए मायावती ने इनका बसपा के लिए काफी उपयोग किया है।
बाबा दुबे ने अपने शुभचिंतकों के आग्रह पर वर्ष 2002 में खुटहन विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़कर करीब पच्चीस हजार मत प्राप्त किए थे और वर्ष 2007 में भी इसी क्षेत्र से चुनाव लड़कर 35 हजार वोट हासिल किए थे जिससे उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। मायावती ने उनको 2004 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाजपार्टी का उम्मीदवार बनाया था जिसमें वह करीब सवा दो लाख मत पाकर दूसरे नंबर पर रहे थे। उनकी इस राजनीतिक मेहनत की मायावती ने घोर उपेक्षा की और माफिया सरगना धनंजय सिंह को बसपा का टिकट दे दिया। अपराधीकरण के खिलाफ बाबा दुबे ने तुरंत बसपा छोड़ दी और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। बाबा दुबे के बसपा से जाने के कारण बसपा के लोकसभा प्रत्याशी धनंजय सिंह के सामने मुश्किलें बढ़ गई हैं।
जिस समय बाबा दुबे समाजवादी पार्टी में शामिल हुए उस समय उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे किसी लालच में सपा में नहीं आए हैं बल्कि वे उन शक्तियों का मुकाबला करना चाहते हैं जो समाज में विघटन पैदा कर रही है। उन्होंने आरोप भी लगाया कि बसपा में कहने भर को मान सम्मान की बात होती है बाकी वहां किसी को सम्मान नहीं मिलता। यह भी गलत है कि बसपा सर्वसमाज के लिए काम करती है। उनका कहना है कि वे जातिवादी एवं प्रतिक्रियावादी शक्तियों को परास्त करने के लिए मुलायम सिंह यादव के साथ आए हैं। राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि यह बसपा की एक तरह से पराजय है कि वह ऐसे उद्यमी और सामाजिक कार्यकर्ता को भी नहीं समझ सकीं। मुलायम सिंह यादव का कहना है कि बाबा दुबे एक शानदार और प्रभावशाली नेता हैं जिनके लिए उनके दिल में भारी सम्मान है।

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