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अंतरिक्ष अनुसंधान पर सरकार
की
मेहरबानियां
नई दिल्ली। भारत
का अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम
मानवयुक्त मिशन और मानव अंतरिक्ष उड़ानों पर अपना ध्यान
केंद्रित कर रहा है। इस अति विशिष्ट अनुसंधान का महत्व समझते
हुए वित्त मंत्रालय ने अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के लिए
4,074 करोड़ रुपये आवंटित किए। यह रकम 2007-08 के मुकाबले 23.8
प्रतिशत अधिक है।
जियो-सिंक्रोनस सेटैलाइट लांच व्हीकल (जीएसएलवी) और
मानवयुक्त मिशन जैसी तकनीक को दिशा देने के लिए 1588.48 करोड़
रुपये आवंटित किए गए हैं। अंतरिक्ष में 400 किलोमीटर दूरी तय
करने वाले दो सदस्यीय मानवयुक्त यान के विकास के लिए पिछले साल
मात्र 2.5 करोड़ रुपये दिए गए थे, जबकि इसके लिए इस साल 100
करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। स्वदेश निर्मित और उन्नत
अंतरिक्ष अनुसंधान संबंधी उत्पादों के लिए इस बजट में आवंटन की
बारिश की गई है। 2007-2008 के 13.95 करोड़ रुपये के मुकाबले इस
साल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो)को 350 करोड़ रुपये
आवंटित किए गए हैं। यह राशि इसरो को अंतरिक्ष से संबंधित घरेलू
उद्योग विकसित करने और विविध इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों सामग्रियों
और रसायनों के विकास के लिए दी जा रही है। इसके अंतर्गत इसरो
अपने भविष्य की योजनाओं को भी मूर्त रूप दे पाएगा।
रिमोट सेंसिंग डाटा के तहत पारंपरिक तकनीक को सुनिश्चित
करने के लिए राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तंत्र के
विकास के लिए सरकार ने बजट सहायता देने की बात कही है। किरोसिन
और तरल ऑक्सीजन से चलने वाले अर्द्ध-क्रायोजेनिक इंजन को
विकसित करने के लिए भी इस साल कई तरह की विकास नीति बनाई
जाएगी।
चंद्रयान 1 को भी बजट सहायता देने की बात कही गई है।
चंद्रयान-1 के तहत चांद के त्रि-आयामी तस्वीरों को लिया जाएगा
और चांद के तल पर पाए जाने वाले विविध तत्वों का अध्ययन किया
जाएगा। चंद्रयान 1 को इसी साल छोड़ने की योजना है। भारत चांद
पर पहुंचने की कोशिशों में बहुत पहले से लगा हुआ है। विकसित
देशों की श्रेणी में बढ़ते कदम के बीच भारत कोशिश है कि वह कम
से कम अपने चिर प्रतिस्पर्धी चीन की बराबरी का दर्जा हासिल कर
ले। इसके लिए भारत रूस संयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम पर भी कई
दौर की उच्चस्तरीय वार्ता हो चुकी है। इस साल के पेश बजट में
इस बात के स्पष्ट संकेत मिल चुके हैं कि भारत इस दिशा में
त्वरित सफलता चाहता है।

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