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अंबेडकर जयंती पर वेदों के खिलाफ किताबों की बिक्री
लखनऊ। भड़काऊ भाषण देने या भड़काऊ साहित्य बेचने और
बांटने में कितना फर्क है? क्या इन दोनों में समानता है या ये
दोनों ही एक ही श्रेणी के माने जाएंगे। यह विषय इसलिए बहस में
उतर गया है क्योंकि अंबेडकर जयंती पर लखनऊ में हजरतगंज चौराहे
पर जब एक तरफ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती गगनभेदी
नारों के बीच अंबेडकर प्रतिमा पर मार्ल्यापण कर रही थीं तब
कतार से नीचे लगे बुक स्टालों पर वेदों और धर्म शास्त्रों के
खिलाफ अपमानजनक भाषाओं वाला साहित्य बेचा और बांटा जा रहा था।
वेदों के खिलाफ वहां इतनी किताबें थीं कि जिनमें यह साफ-साफ
लिखा था कि वेद पढ़ने, लिखने और सुनने वाले धूर्त और पाखंडी
हैं।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मनाई गई अंबेडकर
जयंती पर यह दृश्य किसी एक ने नहीं बल्कि बहुत लोगों ने देखा
और वहां पर उस पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं भी हो रही थीं जिनमें
एक प्रतिक्रिया यह थी कि जब भाजपा के नेता वरुण गांधी पर
भड़काऊ भाषण देने के कारण उन्हें राष्ट्र सुरक्षा कानून में
निरुद्ध कर दिया जाता है तब ऐसे में उनके विरुद्ध क्या
कार्रवाई हो जिनकी मौजदूगी में ऐसा साहित्य बंटे या बिके जिससे
जनभावनाएं आहत होती हों और जो देश की प्राचीन सभ्यताओं का
मार्गदर्शन करते हुए बहुसंख्यक समाज के लिए ज्ञान और प्रेरणा
का स्रोत हो। ऐसे में उस व्यक्ति के खिलाफ क्या कार्रवाई होनी
चाहिए जो कि राज्य के सर्वोच्च पद पर बैठा हो जिसकी जिम्मेदारी
यह है कि उसके राज्य में सभी धर्मो और साहित्यों का सामान आदर
हो और कानून का पालन हो। खासतौर से उस कानून का जो कि ऐसे
मार्गदर्शक साहित्यों को संरक्षण देता आ रहा हो।
अंबेडकर जयंती के रोज लखनऊ में हजरतगंज चौराहे पर बुक
स्टालों से जाम लगा हुआ था और उन स्टालों पर ब्राहृमणों और
वेदों के खिलाफ जहर उगलते साहित्य की बिक्री हो रही थी। स्टाल
पर बैठे सेल्समैन बाकायदा किताबें हाथ में लेकर कह रहे थे कि
देखिए कितनी अच्छी किताब है इसे पढ़िए। बहुत से लोग इन किताबों
को उलट पलट रहे थे। एक दो स्टाल तो ऐसे थे जिन पर धर्म वेदों
और ब्राहृमणों के खिलाफ लिखी गई किताबों को प्रमुखता से
प्रदर्शित कर रहे थे। इन्हें उस दिन किसी ने नहीं रोका और किसी
ने भी यह विचार नहीं उठने दिया कि जब उत्तर प्रदेश की सरकार
ब्राहृमणों के साथ सर्वसमाज आधारित नीति पर खड़ी है तो फिर
साहित्य के नाम पर ऐसी किताबों की बिक्री की अनुमति कैसे दी गई
जो कि केवल समाज को तोड़ने, विघटन पैदा करने और धर्म शास्त्रों
का अपमान करते हुए समाज में जहर घोलने का काम कर रही हैं।
राज्य की मुख्यमंत्री मायावती जिस समय अंबेडकर प्रतिमा
पर मार्ल्यापण कर रही थीं उस समय इस किताबों की बिक्री को लेकर
भी प्रतिक्रियाएं होती रहीं। बुक स्टाल मालिकों का कहना था कि
उन्होंने यह पुस्तकें इसलिए रखीं हैं ताकि समाज के लोग ऐसे
पाखंडी साहित्यों से सावधान हो जाएं। उनका यह भी कहना था कि
बहुत से लोग यह किताबें मांगते हैं और पढ़ते हैं तो इसलिए भी
इन्हें बुक स्टालों पर बेचने के लिए लाया जाता है। लेकिन उनके
पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि ऐसी किताबों की बिक्री को
आप प्रोत्साहित क्यों नहीं कर रहे हैं जो समाज को जोड़ने और
उसके चरित्र निर्माण का कार्य करती हों और जिनसे समाज में सही
वैचारिक सोच विकसित हो।
राज्य में और जगहों पर भी अंबेडकर जयंती समारोह का
आयोजन हुआ जहां पर बहुत सी जगहों पर अंबेडकर साहित्यों से
संबंधित किताबों के अलावा ऐसी प्रतिक्रियावादी पुस्तकों की भी
बिक्री के समाचार मिले। अब प्रतिक्रियावादी पुस्तकों से कौन से
समाज का निर्माण होगा या सर्वसमाज में समानता स्थापित होगी यह
कहना बहुत मुश्किल है किंतु यह सत्य प्रतीत होता है कि मायावती
सरकार भले ही सर्वसमाज
की बात करें लेकिन आंतरिक तौर पर उसकी कार्यप्रणाली जाति विभेद
को संरक्षण देती नजर आती है।
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