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फिल्मी व्यंग्य
न देखी गई फिल्म की समीक्षा
श्रीमान क फिल्म समीक्षक हैं। एक फिल्म देखते हैं और
उसके आधार पर बीस फिल्मों की समीक्षा लिख देते हैं। एक दिन मैं
उनसे मिलने उनके घर गया तो देखा श्रीमान क एक नई फिल्म की
समीक्षा लिख रहे थे।
मुझे आश्चर्य हुआ, मैने पूछा-
आपने ये फिल्म कब देखी ?
नही देखी।
नही देखी तो फिर आप इसकी समीक्षा कैसे लिख रहे हैं ?
उन्होने बड़ी सादगी से कहा-दो महीने पहले एक फिल्म देखी थी उसी
के आधार पर इस फिल्म की समीक्षा लिख रहा हूं इसके पूर्व इसी
देखी गई फिल्म के आधार पर तीन अन्य फिल्मो की समीक्षा लिख चुका
हूं।
मुझं आश्चर्य हुआ-जब फिल्म देखी ही नही तो फिर उसकी समीक्षा
कैसे लिख रहे है ?
इस पर श्रीमान क ने रहस्यमयी मुस्कान बिखरते हुए कहा- हिन्दी
फिल्म समीक्षक के लिये यह एक फायदेमंद बात है कि उसे समीक्षा
लिखने के लिये फिल्म देखना जरुरी नही हैफिर यहां तो हर रोज एक
नई फिल्म रिलीज होती है,यदि हम रोज फिल्म ही देखते रहेगे तो
फिर उसकी समीक्षा कब लिखेंगे?
मैने कहा आप समीक्षा लिखने मे व्यस्त हैं, मै फिर कभी आऊंगा।
उन्होने कहा - इसमे कौन सा बहुत समय लगना है, फिल्म समीक्षा ही
तो लिख रहा हूं कोई कहानी या कविता थोडी लिख रहा हूं कि सोच
सोच कर लिखो, लिख लिख कर सोचोतुम पांच मिनट बैठो फिर अपन
इत्मीनान से बाते करेगेउनकी सृजन शक्ति देख मेरी आंखे फटी की
फटी रह गईउनकी योग्यता के सामने मैने स्वयं को संभाला और भक्ति
भाव से पूछने लगा‘-तीन घंटे की फिल्म, जिसमे पचासो लोगों ने
अभिनय किया है, सैकड़ों तकनीशियनो ने हिस्सेदारी निभाई है,
उसकी समीक्षा आप पांच मिनट मे कैसे लिख लेते है?
इस पर उन्होने फिल्म समीक्षा लेखन की जानकारी देते हुए कहा-
पूरी समीक्षा थोडी ही लिखनी हैएक समीक्षा लिखी हुई पडी है, हर
फिल्म की समीक्षा मे कलाकारो और तकनीशियानो के नाम आवश्यकता
अनुसार परिवर्तित कर इसे ही चला देते है, बस शीर्षक बदलना होता
है।
फिल्म समीक्षा के नेपथ्य को समझ मै दंग रह गया।
मैने पूछा-सम्पादक और पाठक कभी शिकायत नही करते?
उन्होने लापरवाही से कहा-कोई पढ़े तो शिकायत करें सम्पादक पत्र
पत्रिका में फिल्म समीक्षा बतौर फैशन ही देते हैं। रहा सवाल
पाठको का, तो यहां इतना समय किसी के पास नही है कि हिन्दी
फिल्म की समीक्षा पढ़ें, क्योंकि अब लोग फिल्म समीक्षा पढ़ कर
नहीं बल्कि पोस्टर देख कर जाने जाते हैं, फिर भी एक छोटा सा
वर्ग है जो हमारी समीक्षाओं को पढ़ता है, किन्तु कभी शिकायत
नहीं करता। जब वह बार बार एक जैसी फिल्म देख सकता है तो एक
जैसी समीक्षा पढ़ने मे क्यो एतराज करे?
मैने कहा - फिल्म देखे बिना उसकी समीक्षा लिखना कैसे संभव है?
इस पर उन्होने बाल विहीन मूछो को मोडते हुए कहा - अनुभव इंसान
को सब कुछ सिखा देता है, लोग लिफाफा देख कर मजमून भांप लेते
हैं, हम पोस्टर देख कर फिल्म का एक एक दृश्य जान लेते हैं।
अब मैने समय गवांये बिना श्रीमान क के पैर पकड़ लिया और
कहा-गुरु मुझे अपना शागिर्द बना लो अगर यह काम इतना आसान है तो
मै भी इसी लाईन मे आना चाहता हूं। उन्होने मुझे अपना शागिर्द
स्वीकार कर लिया अब मै दिन रात उनकी सेवा करता हूं, सिर की
मालिश करता हूं, पीठ खुजाता हूं, उंगलिया फोड़ता हूं, उनके
बच्चों को स्कूल छोड़ता हूं, वापस घर लाता हूं, सब्जी लाता
हूं, सड़क के नल से पानी भरता हूं, इसके एवज मे फुर्सत के
क्षणों मे वे अपने अनुभव को निचोड़कर उसके ज्ञान का पानी मेरे
मस्तिष्क मे उडे़लते हैं। उनके ज्ञान का पानी मेरे मस्तिष्क के
भूसे से क्रिया करता है, जिसकी प्रतिक्रिया स्वरुप फिल्म
समीक्षा का सृजन होता है। इससे यह भी पता चलता है, कि फिल्म
समीक्षक बनने के लिये मस्तिष्क में भूसा भरा होना आवश्यक होता
है। श्रीमान क ने एक दिन मुझसे कहा- यह सूची रख लो, फिल्म
समीक्षा लिखते समय यह अत्यंत उपयोगी साबित होगी। मैने सूची का
गंभीरता पूर्वक अध्ययन किया। उसमे जानकारी थी, कि कौन अभिनेता
केवल कमर मटकाता है, कौन चीखता है, कौन उछल कूद करता है, कौन
भौंडापन करता है, कौन प्रभावित करता है। उसी प्रकार नायिकाओं
की जानकारी थी, कि कौन कैसी दिखती है, कौन अंग प्रदर्शन करती
है, कौन अच्छा नृत्य करती है, कौन अपना पार्ट बखूबी निभा लेती
है, किसे सिर्फ शो पीस रखा जाता है। सूची देते हुए गुरूजी ने
कहा - इसमे हिन्दी फिल्मों के अभिनेता एवं अभिनेत्रियों की
औकात अंकित है। ये इसके बाहर निकल पाये इनमे इतना सामर्थ नही
है, फिर उन्होने फिल्म समीक्षा के मूल तत्वों की जानकारी देते
हुए कहा-फिल्म समीक्षा मे ठोस कुछ भी नही लिखा जाता, सब कुछ
डांवाडोल होता है, जिसका अर्थ हां और न दोनो होता है,
जैसे-फिल्म के कुल पांच गीत हैं, जिसमे दो एक चल सकते हैं,
कहीं कहीं संवाद अच्छे बन पड़ें हैं। कुछ एक दृश्यों मे
कैमरामैन ने प्राण फूंक दिये हैं। नायिका प्रभावित करती है,
यदि उसे अच्छे अवसर मिले तो भविष्य मे एक कुशल अभिनेत्री साबित
हो सकती है। तुम्हारी इस समीक्षा को कोई गलत साबित नही कर सकता
क्योकि यदि फिल्म मे पांच गीतों को रखा गया है, तो पांचो तो
बकवास नहीं हो सकते। फिल्म मे हर कलाकार संवाद बोलता है। इन
सैकड़ों संवाद मे कुछ एक स्तरीय होंगे, यह स्वाभाविक है, किंतु
कौन सा गीत प्रसिद्ध होगा और कौन सा संवाद असर छोड़ता है, इसका
स्पष्ट उल्लेख करने के लिये गुरूदेव क ने कडे़ शब्दों मे मनाही
की है।
आज गुरूदेव श्रीमान क के अनेक शिष्य ऐसे ही देश की विभन्न पत्र
पत्रिका ओं
मे फिल्म समीक्षा लिखकर अपनी रोजी रोटी चला रहे हैं।
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