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स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम का विश्लेषण सच हुआ
नई दिल्ली। स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम ने 15 अगस्तर 2008
को साफ-साफ लिख दिया था कि राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी
अपनी महारानी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की
कार्यप्रणाली को लेकर भारी नुकसान उठायेगी, राजस्थान के चुनाव
परिणामों से यह सिद्घ हो गया है। भाजपा को यहां सत्ता से बाहर
होना पड़ा। भाजपा को और भारी नुकसान होता यदि मुंबई में
आतंकवादियों का कोई हमला न हुआ होता। राजस्थान में भाजपा की 50
से ऊपर सीटों का ग्राफ मुंबई हमले के कारण ही गया है। मध्य
प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को इस हमले का जबरदस्त लाभ
मिला। पंद्रह अगस्त 2008 को स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम पर होस्ट
किया गया 'महारानी की विफलताएं' राजनीतिक विश्लेषण हम
यहां पुनः दे रहे हैं। हम इसी के साथ स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
की यह स्टोरी भी पुनः लगा रहे हैं, जिसमें हमने कहा है कि देश
की जनता भारतीय जनता पार्टी के कमल से तो प्यार करती है, लेकिन
उसे भाजपा के नेताओं से नफरत है। हमने जो लिखा वह सही साबित
हुआ है।
राजस्थान में कांग्रेस और दिल्ली में भी तीसरी बार
कांग्रेस अपनी सरकार बना रही है। राजस्थान में कांग्रेस
वसुंधरा राजे सिंधिया की अकर्मण्यता और एक महारानी के अहंकार
के कारण आई है, जबकि दिल्ली में शीला दीक्षित के काम पर और
उनके व्यक्तित्व पर दिल्ली की जनता ने उन्हें फिर से जनादेश
दिया है। इसका मतलब बिल्कुल साफ है कि अगर कांग्रेस ने और
राज्यों में भी मेहनत की होती तो वहां भी कांग्रेस को अवसर
मिलता, लेकिन यह खुलासा भी हुआ है कि कांग्रेस को लोकसभा में
दिल्ली पर फतह करने के लिए बड़े पापड़ बेलने होंगे। उसे दिल्ली
और राजस्थान के मुगालते में नही रहना होगा। क्योंकि लोकसभा
चुनाव कोई आज ही नही हो रहे हैं, जिनमें कि कांग्रेस की लॉटरी
खुल जाएगी। कांग्रेस को एक संजीवनी मिली है और जनसमान्य में यह
संदेश प्रसारित हो गया है कि अब सत्तासंघर्ष में कांग्रेस की
एनडीए से कड़ी टक्कर होगी। इसलिए जो और लोग प्रधानमंत्री पद का
ख्वाब और भ्रम लिए घूम रहे हैं उनकी पहले ही छुट्टी हो गई है।
पढ़िए तो हमने क्या लिखा था-
महारानी की विफलताएं

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया गुर्जर
आंदोलन और इस तरह की जन समस्याओं से निपटने में पूरी तरह से
विफल साबित हुई हैं। अपने साढ़े चार साल के मुख्यमंत्रित्व
कार्यकाल में वसुंधरा राजे ने राजस्थान को क्या दिया है इस
प्रश्न का उनके पास कोई माकूल जवाब नहीं है। अगर साफ-साफ कहा
जाए तो राजस्थान में ‘कमल’ को इसकी कीमत चुकानी पड़ी है। अगर
महारानी अपने महल से बाहर निकलतीं और आम लोगों के बीच रहतीं तो
राजस्थान में ऐसे जातीय आंदोलन खड़े नहीं होते और भारतीय जनता
पार्टी का कमल संकट में न होता। ‘महारानी’ तो अपनी जुल्फों के
गजरें खिलाती रहीं लेकिन उस कमल को रौंद दिया जिसके कारण
उन्हें राजस्थान का ताज मिला। ऐसे ही कई कारणों से आज राजस्थान
में भारतीय जनता पार्टी में भी ‘महारानी’ के खिलाफ विरोध के
स्वर उठ रहे हैं।
भाजपा में पूछा जा रहा है कि आखिर वसुंधरा राजे सिंधिया
ने ‘कमल’ के लिए क्या किया? कितने वोट जोड़े? राजस्थान के
गुर्जर तो भाजपा से उड़ा दिए? गुर्जर आंदोलन खड़ा कैसे हुआ? जब
इसकी शुरूआत हुई थी तब ‘महारानी’ क्या कर रही थीं? इतने सारे
लोग मरने के बाद अब क्या मतलब रहा है? कहने वाले कहते हैं कि
‘महारानी’ को इस बात से और राजस्थान की जनता से न तो कभी मतलब
था और न आज मतलब है। उन्हें यह ताज भी राजघरानों के दरबारी रहे
अटल बिहारी वाजपेयी के कारण हासिल हुआ था। वसुंधरा राजे
सिंधिया देवी-देवताओं की तरह से अपनी पूजा करवाने और मॉडलिंग
के अलावा करती भी क्या रहीं? उनका भाजपा के आम कार्यकर्ताओं से
ज्यादा वास्ता ही नहीं रहा। वह तो उनसे मिलती भी नहीं है।
भाजपा कार्यकर्ता कहा करते हैं कि इनके यहां कांग्रेस के
नेताओं का कोई काम नहीं रुकता है जबकि भारतीय जनता पार्टी के
नेता और कार्यकर्ता राजस्थान में भटकते फिर रहे हैं, फर्जी
मुकदमों में जेल जा रहे हैं, और भारतीय जनता पार्टी के अभिशाप
के कारण दूसरों की नजर में सांप्रदायिक तत्व कहलाए जा रहे हैं।
राजस्थान में ऐसे बीजेपी कैसे बचेगी यह ज्वलंत सवाल ‘महारानी’ से पूछने की किसी भाजपाई नेता की हिम्मत नहीं है। हां, कार्यकर्ता जरूर यह सवाल पूछ रहा है और कह रहा है कि भाजपाई वसुंधरा राजे से काम लेने के लिए किसी कांग्रेसी नेता की सिफारिश ज्यादा कारगर है। इनकी सरकार के मंत्री भी किसी भाजपाई की मदद नहीं कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें वसुंधरा की तरफ से कोई छूट नहीं है। राजस्थान का हर आदमी जानता है कि ‘महारानी’ से मिलना कोई आसान काम नहीं है। फोन पर बात करना तो बहुत दूर की बात है। वसुंधरा राजे आज तक राजघरानों की परंपराओं से बाहर नहीं निकल सकीं हैं, इसीलिए आज भारतीय जनता पार्टी को राजस्थान में नुकसान हो रहा है। भाजपा के राजस्थान ही नहीं बल्कि दिल्ली के नेता भी कहते आए हैं कि यदि वसुंधरा की जगह पर कोई और मुख्यमंत्री होता तो राजस्थान में भाजपा का इतना बुरा हाल नहीं होता। इसीलिए राजस्थान में भाजपा की फिर से वापसी पर प्रश्न खड़े हुए हैं। राजस्थान में एहसास ही नहीं होता कि यहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। ‘महारानी’ के महल में भी प्रमुख कांग्रेसी नेताओं का बेरोक टोक आना जाना है। भाजपा के कलराज मिश्र जैसे कागजी नेताओं को इसीलिए राजस्थान का प्रभारी बनाया गया ताकि वह वसुंधरा के सामने कोई बकवास न कर सकें। इसीलिए पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा नेता जसवंत सिंह और उनकी पत्नी ने महारानी के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है जो इस बात का संकेत है कि वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्थान में भाजपा का बंटाधार कर रही हैं।
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