विदेशों में हिंदी साहित्य का अध्ययन और समस्याएं

  • प्रोफेसर वसुधा डालमिया

 

अध्ययन और अनुसंधान के क्षेत्र में सर्जनशील गत्यात्मकता के साथ नई पीढ़ी के अध्येता को दिशा-निर्देश देना एक गम्भीर दायित्व है, और दुर्योग से हिन्दी भाषा और साहित्य के विद्वानों में इस दायित्व-बोध का अभाव है। वस्तुतः इन विद्वानों में हिन्दी के प्रति अकादमिक-अनुशासन की कमी ही इसका प्रमुख कारण है। इसीलिए हिन्दी भाषा को अंग्रेजी के स्तर पर प्रतिष्ठित कर पाना मुश्किल होता जा रहा है। यद्यपि यह असंभव नहीं है। मेरी दृष्टि में अंग्रेजी को अपदस्थ किये बिना हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के समानान्तर प्रतिष्ठित करना ही आज के समय की आवश्यकता है।
गतवर्ष, अंग्रेजी-आभिजात्य में पले-बढ़े भारतीयों के कारण कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का हिन्दी और संस्कृत अध्ययन-अध्यापन बंद कर देना हमारे समक्ष कई प्रश्न छोड़ गया। पश्चिमी विश्वविद्यालयों में हिंदी और संस्कृत विषय के अध्ययन और अनुसंधान का भारत में, हम भारतीयों के लिये क्या अर्थ है? कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का संस्कृत-हिन्दी विषयों का अध्ययन बन्द किये जाने से लोग क्यों अपने को आहत महसूस करने लगे? क्यों-कर भारतीय विश्वविद्यालयों के पोस्ट-ग्रेजुएट छात्र भी अपनी बौद्धिक-जिज्ञासाओं के समाधान हेतु पश्चिमी विश्वविद्यालयों में संस्कृत-हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं के अध्ययन हेतु प्रवेश लेते हैं? अपने राष्ट्रीय-गौरव के आहत-मन से हम देखने को मज़बूर हैं कि हमारी आंखों के सामने पश्चिमी जगत के सर्वमान्य शिक्षा केन्द्र ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय संस्कृत और हिन्दी विषयों का अध्ययन-अध्यापन बन्द कर देते हैं। इस निर्णय से हम आहत हो सकते हैं किन्तु यहीं एक प्रश्न उभरता है कि अपने देश के प्रतिष्ठित शिक्षा केन्द्रों में संस्कृत, हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं (वर्नाकुलर) के अध्ययन को हम स्वयं कितना महत्त्व देते हैं?
लैटिन भाषा में ‘वर्ना’ (Verna) शब्द का अर्थ है ‘घर में ही जन्मा गुलाम’। भारतीय भाषाओं के लिये प्रयुक्त इस ‘वर्नाकुलर’ शब्द को लक्ष्य करते हुए एक प्रतिष्ठित विद्वान ने संकेत किया था कि, ‘‘भारतीयों की आदिम भाषाओं और संस्कृति को हीन मानकर, उससे पृथक् अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के उद्देश्य से अंग्रेज शासित और गुलाम लोगों की भाषा-संस्कृत के लिये ‘वर्नाकुलर’ शब्द का प्रचलन किया गया।’ आज भी भारतीय शिक्षा-पद्धति में ‘वर्नाकुलर’ शब्द का प्रयोग ज्यों का त्यों किया जाता है। हमारे यहां के प्राथमिक विद्यालयों में हिन्दी-शिक्षण के अलग-अलग मानक हैं। एक और ‘आईसीएसई’ कोर्स में हिन्दी दसवीं कक्षा तक अनिवार्य विषय है तो दूसरी ओर ‘सीबीएसई’ के पाठ्यक्रम में इसकी अनिवार्यता केवल आठवें दज़ तक है। उसके बाद यह ऐच्छिक-विषय बन जाती है और संस्कृत तो कतई अनिवार्य नहीं है। देश के केन्द्रीय दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी और संस्कृत विषयों के अध्ययन में 40 से 50 प्रतिशत कमी आई है, प्रायः यही स्थिति देश के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी है।
भारत में ही भाषिक-प्रतिष्ठा की इस स्थिति का परिणाम यह हुआ है कि अंग्रेजी के अलावा सभी भारतीय भाषाओं को ‘ग्राम्य’ या ‘गंवई’ करार दे दिया गया है, भले ही वह राष्ट्रभाषा हिन्दी ही क्यों न हो, जिसे बोलने वाले करोड़ों लोग हैं, जिसका क्षेत्रफल विशाल है। यद्यपि इस दरम्यान हमारी देशी-भाषाओं के विद्वानों, रचनाकारों ने अपनी-अपनी भाषा को प्रतिष्ठा दी है, किन्तु महानगरीय आभिजात्य वर्ग और इस क्षेत्रीय सांस्कृतिक आभिजात्य वर्ग के बीच एक गहरी खाई कायम है। क्या इस दूरी को पाटा जा सकता है? ऐतिहासिक परिदृश्य में ब्रिटिश-साम्राज्य के औपनिवेशिक शोषण और दमन के विरुद्ध बंगाली, मराठी, तमिल, हिन्दी और दूसरी भाषाओं के साहित्य ने भारतीय जीवन में नयी चेतना जागृत की, उसे आधुनिक दृष्टि दी। इसी नूतन दृष्टि ने एक राष्ट्र की कल्पना की और उसका निर्माण भी किया।
हमारी भाषाओं की प्राणवत्ता और उसकी सर्जनात्मकता खत्म नहीं हुई है बल्कि तथाकथित आभिजात्य वर्ग कदम-कदम पर उसके विकास को अवरुद्ध करता जा रहा है। वे लोग, भाषिक-संस्कार के उन मूल स्रोतों को बन्द कर रहे हैं जिनसे उनके पितृ-पितामहों की चेतना स्पंदित हुई, जिसमें उनकी रचनात्मकता ने अभिव्यक्ति पाई।
पाश्चात्य विश्वविद्यालयों के भाषा-विभागों में उन छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है जो अपनी भाषा को ‘ग्राम्य’ स्तर से मुक्त करना चाहते हैं, भले ही वे अंग्रेजी के स्नातक हों। भारतीय शिक्षा-पद्धति इतनी रूढ़ हो चुकी है कि वह नवीन जिज्ञासाओं के समाधान में अक्षम है। पुरानी पद्धति के विद्यालयों में बौद्धिक-स्वतन्त्रता और अंतर-अनुशासित अध्ययन का सर्वथा अभाव है, यद्यपि इस सम्बन्ध में बातें बहुत होती हैं। किसी भी विषय में स्नातकोत्तर-अध्ययन की पूर्व तैयारी एक दूसरी विधा के अनुशासन में ढालती है, जो कठिन तो है किन्तु असंभव नहीं। दूसरी ओर यहां आर्थिक-संसाधनों का अभाव है, यहां केवल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ही एकमात्र ऐसी संस्था है जो दीर्घ-अवधि के अध्ययन के लिये संसाधन प्रदान करती है, किन्तु वृत्ति महानगरीय जीवन के लिये यथेष्ट नहीं है। प्रायः विषय से सम्बन्धित पुस्तकें नहीं मिलतीं और यदि संयोग से मिल भी जाएं तो काफी महंगी होती हैं। पुस्तकालयों में अच्छे संग्रह का अभाव है और उनमें भी भाषा-संस्कृति से सम्बद्ध पत्र-पत्रिकाओं का तो सर्वथा अभाव होता है। इसका कारण है हमारी व्यवस्थागत-राजनीति जिसके विशाल कलेवर में जड़ जमाये हुए है इस तरह के हज़ारों विकार, जिनसे नित-नयी परेशानियाँ उभरती रहती हैं।
एक अमेरिकन विश्वविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापक के तौर पर, मेरे अपने व्यक्तिगत-सन्दर्भ में उपर्युक्त तमाम समस्याएँ और उनसे जुड़ी बहुत-सी बातें हैं, जो बहुत-कुछ अनकही हैं। विदेशों में 12 विश्वविद्यालय ऐसे हैं जो दक्षिण-एशियाई अध्ययन से सम्बद्ध हिन्दी-माध्यम से पीएचडी अनुसंधान स्वीकार करते हैं। लगभग 22 विश्वविद्यालय हिन्दी में आरम्भिक शिक्षण प्रदान करते हैं। भारतीय छात्रों की माँग पर अधिकांश उन्मुक्त कला-विद्यालय ‘हिन्दी’ प्रशिक्षण की योजना बना रहे हैं। विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली तीन भाषाओं में एक है हिन्दी। अपनी इस हिन्दी को अमेरिका में प्रतिष्ठा दिलाना अत्यन्त आवश्यक है तभी हम सफल व्यावसायिक-व्यक्तित्व का निर्माण कर सकेंगे। तभी वैसी स्थितियाँ बनेंगी कि जब भी लोग अपनी ‘सांस्कृतिक धरोहर’ की बात करेंगे तो भाषा के बारे में भी बात करेंगे।
क्या इन बातों से भारतीय परिस्थितियाँ प्रभावित हो सकती हैं? क्या इनसे हिन्दी की प्रतिष्ठा में गुणात्मक अन्तर आ सकेगा? क्या स्थितियाँ बदलेंगी? जब तक हम इस दिशा में प्रयत्न नहीं करते, हमारे प्रयत्नों के परिणाम—अदृश्य चमत्कार नहीं घटित होते तब तक इन प्रश्नों का उत्तर होगा—‘नहीं’। इसी बीच ‘जादवपुर विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय भाषाओं को तथाकथित ‘ग्राम्य’ स्तर से निकालकर ‘इंट्रावर्नाकुलर/इंग्लिश’ के समानान्तर साहित्य और संस्कृति के तुलनात्मक अध्ययन हेतु प्रतिष्ठित किया जाना एक सराहनीय कदम है। इस तरह के निर्णयों से नये रोज़गार सृजित होंगे और विदेश में बसे भारतीय जो अपनी पीएचडी पूर्ण कर चुके हैं और भारत लौटना चाहते हैं। वे भारत लौट कर इन नव-सृजित रोजगारों के माध्यम से भाषा, साहित्य और संस्कृति के अनुसन्धान से भारत के महानगरीय-आभिजात्य वर्ग में भारतीय भाषाओं को पुनर्स्थापित करने हेतु बीज अंकुरित कर सकेंगे।(लेखिका कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले, यूएसए से संबद्घ हैं )
 

जार्ज बुश का कथन - 'हिंदी इक्कीसवीं सदी की भाषा'

  • बद्रीनारायण तिवारी

‘हिंदी ज्ञान मेरे लिये अमृतपान है, जितनी बार उसे पीता हूँ, उतनी बार लगता है, पुनः जीता हूँ।’
मन को झंकृत करने वाली इन पंक्तियों को पढ़ने की बार-बार इच्छा होती है और यह जानकर प्रसन्नता भी कि हिन्दी की इन पंक्तियों को किसी भारतवासी ने नहीं वरन् दूर देश के निवासी (चेकोस्लोवाकिया) एक चेक नागरिक तथा प्रमुख शिक्षाविद् एवं भारत के राजदूत रहे डॉ ओदेलोन स्मेकल ने लिखा है। उन्होंने हिन्दी में 12 से अधिक पुस्तकें लिखीं जो प्रकाशित भी हुईं। उसी हिन्दीनिष्ठ ने हमारे आमन्त्रण को स्वीकार कर ‘मानस संगम’ समारोह में भाग लेकर हिन्दी में दो रचनायें भी सुना कर अपार जनसमूह को चमत्कृत किया।
वार्सा विश्वविद्यालय, पोलैण्ड में भारत विद्या विभाग के अध्यक्ष तथा भारत में पोलैण्ड के राजदूत रह चुके प्रो मारिया स्टोक बृस्की ने राष्ट्रपति को राजभवन में अपना परिचय-पत्र हिन्दी में ही प्रस्तुत किया था। हिन्दीनिष्ठ बृस्की
की दृष्टि में अंग्रेजी माध्यम होने से मानसिक विभाजन होगा। उनका स्पष्ट मत था कि भारत की आत्मा को पहचानने के लिये हिन्दी भाषा का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। हम विदेशी लोग भारतीय समाज और संस्कृति को अंग्रेजी में नहीं जान सकते हैं। ‘मानस संगम’ में भाग लेने हेतु उनका स्वीकृति पत्र भी हिन्दी में ही आया था—दुर्भाग्यवश विदेशी हिन्दी विद्वान् बृस्की उस समय किसी कारणवश उपस्थित नहीं हो सके। वर्तमान समय में विदेशी हिंदी विद्वानों की शृंखला काफी बड़ी हो चुकी है।
हिन्दी फिल्मों तथा कथा-प्रवचनकारों से विदेशों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार चल रहा है। जिसकी तीव्रगति को देखकर अनेक विदेशी अंग्रेजी चैनलों ने उनका हिन्दी में प्रसारण प्रारम्भ कर दिया। त्रिनिदाद एण्ड टोबैगो के भारत स्थित उच्चायुक्त पं मणिदेव प्रसाद ने ‘इंडियन एराइवल डे’ के 162 वर्ष पूरे होने पर कानपुर प्रवास में तुलसीदास की पंक्तियाँ—‘धन्य देश सो जहँ सुरसरी...’ सुनाते हुए कहा कि उस देश को प्रणाम जहाँ पवित्र गंगा प्रवाहित होती है। त्रिनिदाद की भूमि में प्रवेश करते ही वहाँ के रेडियो में फिल्मी हिन्दी गीत के स्वरों से भारत देश का भ्रम हो जायेगा।
हिन्दी में सर्वप्रथम बीबीसी लंदन ने नियमित समाचारों का प्रसारण शुरू किया था। इस समय तो हिन्दी प्रसारण हेतु ‘वॉयस आफ अमेरिका’ जर्मन रेडियो, जापान रेडियो, पीकिंग रेडियो (चीन) ‘विविध भारती’ सीलोन तो बहुचर्चित हैं ही। फ्रान्स, कोरिया, मारीशस, त्रिनिडाड, गयाना, सूरीनाम, म्यांमार, बंगलादेश, पाकिस्तान, सऊदी अरब, इंडोनेशिया आदि देशों में भी हिन्दी में काफी कार्य हुए हैं। ब्रिटेन में उज्बेकिस्तान के राजदूत फतेह तेशबीब हिन्दी के प्रति समर्पित हैं। उनके अनुसार वहाँ के ताशकंद, समरकंद, अंदीजान में बच्चों को तीसरी से दसवीं कक्षा तक हिन्दी पढ़ाई जाती है।
संसार में हमारे पूर्वज जो गिरमिटिया मजदूर होकर मारीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनीडाड, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में गये, वह अपने साथ तुलसीदास की रामायण और हनुमान चालीसा लेकर गये—उसी ने हिन्दी भाषा और संस्कृति को सुरक्षित रखा। अब इन देशों में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दी संस्थाओं द्वारा हिन्दी शिक्षण कार्य हो रहे हैं जिन्हें मैंने प्रत्यक्ष अनुभव भी किया।
इंग्लैण्ड के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने विगत दीपावली में हिन्दी में मुबारकबाद देकर अंग्रेजी भाषा की मानसिकता वाले लोगों मे हिंदी का विश्वास जगाया। अभी कुछ मास पूर्व अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश के इस कथन पर कि हिन्दी 21वीं सदी की भाषा होने जा रही है, अपने देश में भी हिन्दी की संरक्षा अति आवश्यक है। उन्होंने अमेरिकी संसद से 11 करोड़ डालर हिन्दी विकास के लिये स्वीकृत कराने की घोषणा भी की। कम्प्यूटर तथा तकनीकी क्षेत्र पर भी हिन्दी में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता को विश्व ने स्वीकारा है। इसका प्रयोग अक्षरात्मक हिन्दी के अतिरिक्त संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, मराठी, गुजराती तथा नेपाली आदि भाषाओं को लिखने में भी होता है।
संसार में हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जिसे विदेशियों ने सर्वप्रथम विश्व पटल पर रखा सर्वप्रथम हिन्दी के शोधार्थी डॉ लुइजि पियो तेस्सी तोरी ने फ्लोरेंस विश्वविद्यालय, इटली में ‘रामचरित मानस और वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन’ पर शोध किया। भारत से इतना प्रभावित हुए कि वह स्वदेश इटली छोड़कर जीवनपर्यन्त भारत (बीकानेर) में रहे। साम्यवादी देशों में सर्वप्रथम तुलसी कृत रामचरितमानस की लोकप्रियता देख स्टालिन ने द्वितीय विश्व युद्ध के समय अकादमीशियन अलकसेई वरान्निकोव द्वारा रूसी भाषा में पद्यानुवाद साढ़े दस वर्षों में कराया। तुलसी भक्त हिन्दी योद्धा बेल्जियम (योरोप) में जन्मे फादर डॉ० कामिल बुल्के जिन्होंने हिन्दी प्रेम के कारण भारत की नागरिकता ली और यहीं चिर निद्रा में विलीन हुए।
भारत एक बहुभाषी देश है। सम्पूर्ण देश में भाषा वैज्ञानिकों ने 1652 भाषायें तथा बोलियाँ बोली जाने की मान्यता दी है। शीर्षस्थ नेताओं ने अन्य प्रान्तीय भाषाओं और बोलियों का सहारा क्यों नहीं लिया उनका सरल उत्तर था—‘हिन्दी एक ओर जनपदीय स्तर पर बोलियों के बीच आंतरिक एकता बनाती रही है तो दूसरी ओर भारतीय सन्दर्भ में अन्य भाषाओं के बीच सम्पर्क व एकता लाने का प्रयास करती रही है।’
सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में अंग्रेजों की मातृभाषा अंग्रेजी होने के बाद भी फ्रेंच और लैटिन भाषाओं का बोलबाला था। कानून फ्रेंच भाषा में बनते थे। शिक्षा लैटिन भाषा में दी जाती थी। सन् 1650 में इंग्लैण्ड की संसद में दायर एक याचिका में फ्रेंच और लैटिन भाषाओं को ‘दासता का प्रतीक’ कहा गया। इंग्लैण्ड की संसद ने
22 नवम्बर 1650 ई में  निर्णय लिया कि 1 जनवरी 1651 के बाद से फ्रेंच या लैटिन का प्रयोग सरकारी या गैर सरकारी कार्यों में नहीं किया जायेगा। मात्र 36 दिनों में इंग्लैण्ड की राजभाषा अंग्रेजी बन गयी जो अब तक अनवरत चल रही है। इसी प्रकार भारत से आठ मास पश्चात् स्वाधीन हुए लघु देश ‘इजरायल’ ने अपनी प्राचीन ‘हिब्रू’ भाषा की जीवंतता बनाये रखकर शत्रुओं से युद्ध करते हुए बहुमुखी विकास भी किया। स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी जन-जन की भाषा—हिंदी राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित नहीं हो सकी।
फिजी देश के हिन्दीनिष्ठ पूर्व मंत्री विवेकानन्द शर्मा के दर्द भरे स्वर हिन्दी प्रेमियों को स्पष्ट संकेत दे रहे हैं—‘हम फिजी में बसे प्रवासी लोग अपनी संस्कृति और अपनी आत्मा के लिये भारत की ओर देखते हैं। मगर हिन्दी-रूपी द्रौपदी आज भारत में नग्न हो रही है और द्रोण चुप बैठें हैं। आज कृष्ण नहीं है, मगर फिजी जैसे छोटे से द्वीप से भी हम चीर देने को तैयार हैं। इसके लिये हम शहीद होने को भी तैयार हैं।’ इस सन्दर्भ में मॉरीशस के भारत स्थित राजदूत रोहित नारायण सिंह गत्ति के मेरे पास आये पत्र की कुछ पंक्तियों से ही हिन्दी के प्रति मॉरीशस के अटूट सम्बन्धों का अनुभव होगा—‘यों तो इस छोटे से देश में फ्रेंच, इंग्लिश, उर्दू, तेलुगू, चीनी, तमिल, मराठी, गुजराती एवं क्रियोल भाषायें बोली जाती हैं लेकिन हिन्दी सबसे अधिक लोग समझते और बोलते हैं।
युग पुरुष महात्मा गाँधीजी के सद्प्रयास से मॉरीशस में हिन्दी संस्थाओं का जन्म हुआ। सन् 1968 में स्वतन्त्रता के पश्चात् मॉरीशस में हिन्दी के पठन-पाठन की सुविधाओं का बहुत विकास हुआ।’
जनवादी जर्मन गणतन्त्र में रेडियो बर्लिन के अधिकारी डॉ० फैडमैन श्लैडर की हिन्दी के प्रति भावना उन्हीं की कलम से, ‘‘हमें न केवल प्रसन्नता होती है बल्कि गर्व भी है कि हम बर्लिन रेडियो द्वारा छोटी सी सेवा कर रहे हैं और कार्यक्रमों द्वारा उसे अन्तर्राष्ट्रीय संवाद की भाषा बनाने में योगदान दे रहे हैं। हिन्दी एक अन्तर्राष्ट्रीय चरित्र अपना रही है और हम उसके अन्तर्राष्ट्रीय चरित्र में अपना निरन्तर मर्यादित योगदान दे रहे हैं।’’
अब ‘हिन्दी’ अन्तर्राष्ट्रीय भूमण्डलीयकरण युग की विश्व-भाषा बन चुकी है।

 

टोरंटो में हिंदी

कहते हैं प्यास गहरी हो तो आदमी कुआँ खोद कर पानी निकाल लेता है। कुछ ऐसा ही कनाडा के टोरंटो शहर में रह रहे भारतवंशियों ने कर दिखाया। उन्होंने टोरंटो विश्वविद्यालय में हिन्दी की पढ़ाई को 32,000 डालर की आर्थिक मदद की है।
हालांकि टोरंटो विश्वविद्यालय में 1974 से साउथ एशियन भाषा शिक्षण योजना के अन्तर्गत हिन्दी शिक्षक न होने से कभी दो तो कभी तीन छात्र रहे। ज्यादातर पढ़ाने का जिम्मा विदेशी शिक्षकों के ही पास था। हिंदी चेतना पत्रिका के संपादक डा श्याम त्रिपाठी के अनुसार, विश्वविद्यालय ने धन खर्च करना रोक दिया तो भारतवंशियों ने बीड़ा उठाया और 32 हजार डालर एकत्र करके विश्वविद्यालय को सौंपे। उन्होंने स्वयं पाँच साल तक शिक्षण कार्य किया। इस समय यहाँ दो कक्षाओं में 75 विद्यार्थी हैं। कनाडा में हिन्दी का बोलबाला दिन पर दिन बढ़ रहा है। मंदिरों में बच्चों को हिंदी सिखाई जा रही है। यहां 15 विश्वविद्यालयों में हिन्दी कक्षाएँ चल रही हैं।

 

साइबर काल में किताबें

यह इंटरनेट का दौर है। कम से कम समय और न्यूनतम श्रम में अधिक से अधिक सूचनाएँ हासिल कर लेने के लिहाज से इंटरनेट लोगों की बेहतर पसन्द साबित हो रहा है। खासतौर पर व्यवसाय और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए इंटरनेट लगभग एक आवश्यकता के रूप में सामने आया है।
एक आम धारणा यह है कि जब से साइबर का उपयोग हुआ है, पुस्तकें पढ़ने में अब लोगों की दिलचस्पी कम होती जा रही है, क्योंकि एक तो इंटरनेट पर न केवल सूचनाओं का खजाना भरा पड़ा है, बल्कि बहुत-सी पुस्तकें भी स्क्रीन पर पढ़ी जा सकती हैं।
लेकिन लेखन और कला से जुड़े लोगों के लिए किताबें बहुत जरूरी होती हैं। पुस्तकें, हमारी रचनाशीलता, अनुभव और बोध से प्रतीकात्मक रूप से जुड़ी हुई हैं। वे हमारी कार्यक्षमता को बढ़ाती हैं और हमारे अवधान के केन्द्रीयकरण में सहायक होती हैं। इंटरनेट हमें जानकारी और सूचनाओं के जंगल में छोड़ देता है और हम कभी भी निश्चित नहीं कर पाते कि हम क्या ग्रहण करें? नेट पर लोग तेजी से एक सूचना से दूसरी सूचना पर भटकते रहते हैं, जबकि पुस्तकें हमें विषय के साथ बाँधती हैं। वर्तमान गतिशील समाज में मानसिक ठहराव के लिए किताबें शायद ज्यादा जरूरी हैं। वे हमें रास्ता दिखाती हैं। साइबर के पास अनेक स्रोत हैं, लेकिन मूल स्रोत तो पुस्तकें ही होती हैं।
किताबों के अभाव में इंटरनेट पर प्राप्त जानकारियाँ कितनी दरिद्र हो जाएँगी, इसका हम अनुमान सहज ही लगा सकते हैं। सूचनात्मक किताबें, जैसे विभिन्न विषयों के विश्वकोश आदि की निर्भरता शायद पहले से थोड़ी कम भले ही हो गई हो, लेकिन अध्येताओं और शोधवृत्ति वालों के लिए पुस्तकें ही नितांत जरूरी होती हैं। नेट पर उपलब्ध तमाम जानकारियों के बावजूद गहन अध्ययन के लिए हमें किताबों की शरण में ही जाना पड़ता है। किताबों का कोई स्थानापन्न नहीं है। इंटरनेट भी नहीं। पुस्तकों से हमारा एक आत्मीय रिश्ता बन जाता है। वे हमारी संवेदनशीलता को विकसित करती हैं। हमारा पारिवारिक और सामाजिक जुड़ाव भी किताबों से ही होता है।

 

आडवाणी की किताब हिंदी में

नई दिल्ली। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा ‘माई कंट्री माई लाइफ’ से उपजे विवादों को विराम देने के लिए ‘माई कंट्री माई लाइफ’ पुस्तक का हिन्दी संस्करण जल्दी ही बाजार में आ रहा है। पुस्तक के अंग्रेजी संस्करण में जिन विवादों को लेकर आडवाणी पर उंगुली उठी थी, उसका समाधान ‘मेरा देश मेरा जीवन’ में कर लिया गया है। आडवाणी के खास और भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद पुस्तक के हिन्दी संस्करण का विमोचन करेंगे।

सिक्किम में हिंदी का वर्चस्व

गंगटोक। इससे बेहतर चीज क्या हो सकती है कि एक अहिन्दी भाषी राज्य में कवि सम्मेलन का आयोजन हो और वहाँ की जनता इसके प्रति सम्मान दिखाए। प्रकृति की मनोरम वादियों में बसे खूबसूरत राज्य सिक्किम की राजधानी गंगटोक में आयोजित कवि सम्मेलन में देश के श्रेष्ठ कवियों ने अपनी रचनाओं से वहाँ के लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। गीतऋषि पद्मश्री गोपालदास नीरज की अध्यक्षता में चले रहे इस अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में सिक्किम के वरिष्ठ मंत्री डीडी भूटिया, जीएम गुरुंग व मंत्रिमण्डल के अन्य सदस्य कार्यक्रम के समापन तक कविताओं का रसपान करते रहे।
राज्य के मानव संसाधन मंत्री जीएम गुरुंग पर तो सम्मेलन का इतना जबरदस्त प्रभाव पड़ा कि उन्होंने हिंन्दी में लगभग 18 मिनट तक भाषण दिया और वह भी इस क्षमायाचना के साथ कि उन्हें बहुत अच्छी हिंदी बोलनी नहीं आती। उन्होंने मंच से घोषणा कर डाली कि इस तरह के आयोजन साल में कम से कम तीन बार होने चाहिए। सभागार में कवियों की प्रस्तुतियों पर श्रोता झूम रहे थे और बाहर पड़ रही रिमझिम फुहारों से यह महसूस हो रहा था कि कविताओं का रसपान करने से प्रकृति भी स्वयं को नहीं रोक पा रही है।
गंगटोक शहर से लगभग पाँच किलोमीटर दूर स्थित आयोजन स्थल पर श्रोताओं का मजमा लगा हुआ था। उसे देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि सिक्किम अहिन्दी भाषी राज्य है। यह कार्यक्रम इस बात का गवाह है कि सिक्किम में हिन्दी न केवल लोकप्रिय है बल्कि उसे सम्मान की दृष्टि से भी देखा जाता है।

विज्ञान व गणित की पढ़ाई

नई दिल्ली। ज्ञान के मामले में सुपर पॉवर बनने के लिए वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की बड़ी फौज का सपना देख रही सरकार को विज्ञान और गणित की पढ़ाई का मतलब समझ में आ गया है। ग्यारहवीं योजना में सिर्फ सर्व शिक्षा अभियान के तहत ही आठ लाख शिक्षकों की नियुक्ति होनी है। यह कदम उठाना सबसे ज्यादा जरूरी हो गया था। खासकर, प्राइमरी के बच्चों में एबिलिटी लर्निंग टेस्ट पर एनसीईआरटी की रिपोर्ट के उस खुलासे के बाद कि पाँचवीं में पढ़ने वाले औसतन 45 प्रतिशत बच्चों को गणित का मामूली जोड़-घटाव तक नहीं आता। जबकि विज्ञान के बच्चों की स्थिति भी बदतर ही है। बुनियाद कमजोर होने का ही नतीजा है कि हाईस्कूल और इण्टर की परीक्षाओं में सबसे ज्यादा बच्चे इन्हीं दोनों विषयों में फेल होते हैं। लिहाजा वे इन विषयों को पढ़ने से कतराते हैं।
गणित और विज्ञान की इस स्थिति और भविष्य की जरूरतों के मद्देनजर ही सर्वशिक्षा अभियान के मानक में बदलाव किया गया है। नये प्रावधान के तहत चालू वित्तीय वर्ष (2008-09) से सर्वशिक्षा अभियान के अन्तर्गत, तीन शिक्षकों की नियुक्ति की स्थिति में एक गणित व एक विज्ञान का जरूर हो।

शोध की चोरी पर सज़ा

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर में बौद्धिक सम्पदा की चोरी पर लगाम लगाने के लिए मानक तय कर दिए हैं। अब यदि कोई शिक्षक या शोध छात्र अपने किसी सहयोगी के शोध कार्यों की चेारी करते पाया गया तो उसे सजा मिलेगी। शोध छात्रों पर जहाँ शोधपत्र निरस्तीकरण और छात्रवृत्ति रोकने तक का दण्ड लगाया जा सकता है वहीं शिक्षकों पर वेतनवृद्धि रोकने व उन्हें प्रोजेक्ट के पदों से हटाने तक की कार्रवाई की जाएगी।
छह माह पूर्व वनस्पतिशास्त्र विभाग के एक प्रोफेसर ने अपने एक सहयोगी शिक्षक के खिलाफ शोध के आँकड़े चुराने का आरोप लगाया था। इस मामले में जाँच हुई तो आरोप सिद्ध भी हो गए लेकिन सजा को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन अक्षम साबित हो गया। सूत्र बताते हैं कि उक्त घटना के बाद ‘साहित्यिक चोरी’ के मानक व उसकी सजा तय करने के लिए विज्ञान संकाय प्रमुख प्रो बीडी सिंह की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया। इसमें राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रो आरपी पाठक व आईटी के संकाय प्रमुख प्रो जेएन सिन्हा को सदस्य व उप कुलसचिव डॉ सीएल यादव को सचिव के तौर पर शामिल किया गया। कमेटी ने कई बैठकों के बाद विश्वविद्यालय में ऐसे ‘साहित्यिक चोरी’ के मानक तैयार किए।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी संस्थानों, संकायों को पत्र प्रेषित कर शोध व आँकड़े की चोरी सिद्ध होने पर दी जाने वाली सजा के बाबत जानकारी दी। तय मानक के हिसाब से शोध या आँकड़े चोरी का आरोप सिद्ध होने पर शिक्षकों की तीन वेतनवृद्धि पर रोक, प्रशासनिक दायित्व से वंचित, दस वर्षों के लिए शोधकार्य पर पाबंदी लगा दी जाएगी। कौन सी सजा दी जाएगी यह आरोप की गम्भीरता पर निर्भर होगा। इसी तरह से शोध छात्र को साहित्यिक चोरी में लिप्त पाए जाने पर उसकी पीएचडी निरस्त करने, भविष्य में दाखिले व नियुक्ति पर रोक लगा दी जाएगी।

आस्ट्रेलिया में मलयालम पत्रिका

आस्ट्रेलिया में मलयालियों (करीब 30 हजार) की बड़ी संख्या को देखते हुए एक मलयालम पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है। इस पत्रिका का नाम ‘इण्डियन मलयाली’ रखा गया है। इसमें पाठक अपनी भाषा में भारत से जुड़ी खबरें भी पढ़ सकेंगे। पत्रिका की संपादक अजीठा चिरायिल के अनुसार यह आस्ट्रेलिया में अपनी तरह की पहली पत्रिका होगी।

यूएसए में हिंदी

संस्कृति, संस्कार और अपनी मूल पहचान को बनाये रखने के लिये अपनी भाषा से जुड़ा रहना जरूरी है। इस सत्य को अमेरिका-कनाडा में बसे भारतवंशी अच्छी तरह से जानते हैं। वहाँ कई शहरों में तीसरी पीढ़ी को हिन्दी सिखाने की मुहिम चल रही है। इसके लिये प्रवासियों ने अपने बूते पर कई स्कूल शुरू करके हिन्दी सिखाने का अभियान छेड़ दिया है।
आज अमेरिका के लगभग हर शहर में इस मुहिम के रंग भरने शुरू हो गये हैं। अमेरिका के न्यूजर्सी में हिन्दी यूएसए ने इस मुहिम को अत्यन्त योजनाबद्ध तरीके से तेज किया है। हिन्दी यूएसए के संचालक देवेन्द्र सिंह व उनके साथियों ने ‘हिन्दी की अगर हम सब इक ज्योति जला पायें, तब साथ जुड़ेंगे सब, बच्चे भी सँवर जायें’ के उद्घोष के साथ मुहिम शुरू करते हुए न्यूजर्सी व कनाडा में 25 स्कूल स्थापित किये हैं, जिनमें लगभग डेढ़ हजार बच्चे हिन्दी सीख रहे हैं। पांच से पंद्रह साल आयु वर्ग के इन बच्चों को अक्षर ज्ञान, शब्द ज्ञान, हिन्दी बोलना, पढ़ना व लिखना सिखाने के साथ शुद्ध उच्चारण सिखाया जाता है।
हिन्दी यूएसए ने पाठ्यक्रम के अनुसार 8 पुस्तकें तैयार की हैं। इस मुहिम में 115 से अधिक प्रवासी स्वयंसेवक जुड़े हुए हैं और इसे लगातार विस्तार देने की कोशिशें जारी हैं। यहाँ बच्चों को भारतीय त्योहारों, उत्सवों, मौसम, संस्कारों, गौरवशाली इतिहास व प्रेरक महापुरुषों के बारे में जानकारियाँ देकर उत्सव मनाये जाते हैं। गीत, संगीत, नाटक आदि की प्रतियोगिताएँ होती हैं। देवेन्द्र सिंह कहते हैं, ‘मुहिम में भारतवंशी तेजी से जुड़ रहे हैं। सबकी साझा कोशिश है कि तीसरी पीढ़ी हिन्दी के साथ हिन्दुस्तान को भी आत्मीयता से जान व समझ सके।’

डा विधानचंद्र राय के व्यंग्य-विनोद

पश्चिमी बंगाल के प्रथम मुख्यमंत्री डा विधानचन्द्र राय जहाँ मजे हुए राजनीतिज्ञ थे, साथ ही ये उच्चकोटि के चिकित्सक भी थे। प्रशासन का भार सँभालते हुए भी वे नित्य पाँच मरीजों को सुबह-सुबह अवश्य देखते थे। प्रख्यात हास्य कवि तथा हिन्दी सेवी पं गोपालप्रसाद व्यास जब विधानसभा के सदस्य सेठ रामकुमार भुवालका की सिफारिश से अपने नेत्र रोग को दिखाने विधान बाबू के रुग्णालय में पहुँचे और डॉक्टर साहब से मुखातिब हुए तो उन्हें देखते ही डा राय बोले—मेरे पास क्यों आये हो?
व्यासजी ने भी उसी लहज़े में जवाब दिया—आपको आँख दिखाने। पुर मज़ाक विधान बाबू बोल पड़े—बंगाल में कोई मुझे आँख नहीं दिखा सकता और दूसरे ही क्षण स्वर में नम्रता लाकर बोले—मैं तो आँखों का डॉक्टर नहीं हूँ। व्यासजी कब चूकने वाले थे, बोले—लेकिन आँख के मरीज तो रहे हैं। तभी तो नेत्र कष्ट से मुक्ति पाने के लिए वियेना जाकर आपने इलाज कराया था। बात आई गई हो गई। विधान बाबू ने टार्च से आँखें देखी, नुस्खा लिखने के पहले फिर मज़ाक पर उतर आये। कहा—तुम्हारे लिए दो नुस्खे तजवीज्ज़ करता हूँ। पहले यह बताओ कि तुम आस्तिक हो या नास्तिक? उत्तर मिला—अभी तक निश्चय नहीं कर पाया हूँ। विधान बाबू बोले—निश्चय कर लो। यदि आस्तिक हो तो आँखों से ध्यान हटाओ और भगवान् में लगाओ। यदि नास्तिक हो तो किसी लड़की से प्रेम करो।
कवि हृदय व्यासजी का मन प्रफुल्लित हो गया। मन में गुदगुदी उठी तो बंगाल के उस तेजस्वी राजनीतिज्ञ को कहा—विधान बाबू, मुझे दूसरा नुस्खा (किसी सुन्दरी से प्रेम करने का) पसन्द है। आपने उपचार बताया तो दवा का भी प्रबन्ध कीजिए। स्वप्रान्त के गर्व से गर्वित विधान बाबू बोले—पछाँह के किसी आदमी से हमारी कोई बंगाली लड़की प्रेम नहीं कर सकती। फिर मुस्करा कर बोले—यदि ऐसी दवा मुझे ही मिली होती तो मैं क्या अब तक कुँवारा ही रहता? विधान बाबू आजीवन अविवाहित रहे थे।
डॉ० भवानीलाल भारतीय