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उद्यमियों ने खोली यूपी की हिस्ट्री शीट
बोले- यहां तो
निवेश का माहौल ही नहीं
लखनऊ।
राजनीतिक दलों के बेमेल समझौतो और विवादास्पद एजेंडों एवं
भ्रष्ट कार्यप्रणालियों का उत्तर प्रदेश की औद्योगिक प्रगति पर
घातक असर सामने आने लगा है। उत्तर प्रदेश देश के विकास में
हमेशा आगे रहा है लेकिन जब से यहां राजनीतिक और प्रशासनिक
अस्थिरता का दौर शुरू हुआ है यहां की औद्योगिक प्रगति थम गई
है। राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। खरबों
रूपए लागत की परियोजनाओं का कोई स्पष्ट उद्देश्य सामने नहीं
है। निजी क्षेत्र का पूंजी निवेश अब यहां नहीं हो रहा है।
उद्योगपति गुजरात और अपने अनुकूल नज़र आ रहे राज्यों में भाग
रहे हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में उद्योगबंधु
की बैठक में किसी तरह से बुलाए गए उद्यमी प्रतिनिधियों
ने बड़े चेतावनी भरे लहजे में उत्तर प्रदेश सरकार से कह दिया
है कि वह अपनी रणनीतियों और गतिविधियों पर आत्मचिंतन और
आत्ममंथन करे, नहीं तो उत्तर प्रदेश में जो बचा है वो भी चला
जाएगा। यह बैठक उत्तर प्रदेश की नई औद्योगिक नीति बनाने के लिए
उद्यमियों से राय मशवरा करने के लिए बुलाई गई थी जिसमें सरकार
को बहुत ही निराशाजनक स्थिति का सामना करना पड़ा। ऐसी बैठकें
अभी और भी होंगी तो लेकिन उद्यमियों का मन यहां लगने को तैयार
नहीं है।
उत्तर प्रदेश सरकार की वर्तमान औद्योगिक नीति का समय
पूरा हो चुका है और अनुभव बताते हैं कि इस नीति से उत्तर
प्रदेश के हाथ कुछ नहीं लग पाया है, चारों ओर से निराशा ही हाथ
लगी है क्योंकि वर्तमान राजनीतिक माहौल में और प्रमुख
सत्ताधीशों के भ्रष्ट आचरण एवं दुर्व्यस्था के कारण यहां कोई
मरनेऔर लुटने के लिए नही आएगा। यहां मिनटों में नीतियां बदलती
हैं और किसी भी उद्योग की सकुशल स्थापना में सबसे ज्यादा नीति
बनाने वाले ही रोढ़े अटकाते हैं। सन् 1974-75 में उत्तर प्रदेश
में बिजली उत्पादन की 60 प्रतिशत बिजली उद्योगों को जाया करती
थी, जो अब घटकर करीब 26 प्रतिशत रह गई है। निवेशकर्ताओं को
नीतियां बनाते समय सब्जबाग दिखाए जाते हैं, इसलिए इस मीटिंग
में उद्यमियों के प्रतिनिधियों ने अपनी बारी आने पर सरकार की
धज्जियां उड़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी और स्थापित किया कि
उत्तर प्रदेश में उनकी फाइल चलने में 280 दिन लगते हैं और
गुजरात में उनका काम होने में एक हफता लगता है। उत्तर प्रदेश
में मुनाफे का ग्रोथ यहां के नौकरशाह और राजनीतिज्ञ पहले ही
डकारने को तैयार रहते हैं। कम से कम और राज्यों में ऐसा नहीं
है। उत्तर प्रदेश सरकार ने जो निर्णय लिया होता है वह कम से कम
90 प्रतिशत मामलों में एक झटके में किसी भी समय बदल दिया जाता
है। कभी वैट लगाया जाता है और कभी वैट हटाया जाता है। ये वो
प्रमुख विषय हैं जो किसी भी उद्यमी के लिए चिंता का विषय हैं।
उत्तर प्रदेश के औद्योगिक एवं अवस्थापना विकास आयुक्त
वीके शर्मा ने इस बैठक में कहा कि ‘प्रदेश को औद्योगिक क्षेत्र
में अग्रणी बनाने के लिए ऐसी औद्योगिक रणनीति बनायी जाएगी
जिससे उद्योग के सभी क्षेत्रों का बेहतर ढंग से विकास हो और
रोजगार के अवसरों के सृजन के साथ ही सभी क्षेत्रों का भी विकास
हो। उन्होंने कहा कि उद्यमियों को बेहतर सुविधाएं सुलभ कराने
के लिए उनकी समस्याओं का निदान समयबद्ध रूप से सुनिश्चित किया
जाएगा और उद्योग बन्धु को अधिकाधिक प्रभावी बनाया जाएगा।
उन्होने यह भी कहा कि प्रदेश में औद्योगिक वातावरण को सुदृढ़
बनाने के लिए नयी सोच एवं प्रभावी कदमों से युक्त नयी नीति में
विशेष प्रबन्ध किए जाएंगे।’ यहां पर तुरंत यह प्रश्न उठता है
कि तो क्या अब तक उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं हो रहा था? मतलब,
उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास की रणनीतियां अभी तक दोषपूर्ण
हैं? ऐसे वातावरण में जब यहां राजनीतिक चंदा वसूली के लिए
इंजीनियर की हत्या हो रही हो और गुंडा टैक्स की तरह धन वसूली
अभियान सा चल रहा हो तो इन रणनीतियों और आश्वासनों का कोई मतलब
है? कहने वाले कहते हैं कि जहां किसी उद्यमी या उसके
प्रतिनिधि की मुख्यमंत्री मायावती से मुलाकात भी बगैर उपहार
दिये नहीं होती हो तो वहां ऐसी रणनीतियों और दावों पर
कैसे कोई
भरोसा किया जा सकता है? इस समय जो वातावरण बना हुआ है उसका
जनसामान्य तक में ऐसा ही और बेहद निराशाजनक संदेश गया हुआ है।
इसलिए वीके शर्मा ‘इमडप’ के सभा कक्ष में प्रदेश में औद्योगिक
क्षेत्र में निवेश के वातारण को सुधारने के लिए आयोजित
सार्वजनिक-निजी संवाद संगोष्ठी में जो बोले उसे उद्यम
प्रतिनिधियों ने सुना तो, मगर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।
उन्होंने इस संगोष्ठी में कहा कि बदलते वैश्विक परिवेश को
दृष्टिगत रखते हुए उद्यमियों को बेहतर अवस्थापना सुविधाएं
उपलब्ध कराए बिना उद्योगों का विकास संभव नही है, इसीलिये
राज्य सरकार ने सभी क्षेत्रों में निजी भागीदारी पर विशेष बल
दिया है। अवस्थापना क्षेत्र में बिजली को विशेष प्राथमिकता
देने के प्रयास किये जा रहे हैं और इसके लिए वृहद स्तर पर
विद्युत परियोजनाएं स्थापित करने के लिए निजी निवेशकों को
प्रोत्साहित किया जा रहा है।
सार्वजनिक एवं निजी संवाद के महत्व की चर्चा करते हुए
वीके शर्मा ने दावा किया कि राज्य सरकार औद्योगिक विकास में
उद्यम विशेषज्ञों की राय को विशेष प्राथमिकता दे रही है।
उन्होंने कहा कि उद्योग विभाग का प्रयास है कि छोटे स्तर के
उद्यमियों को भी उद्यम संबधी बेहतर सुविधाएं सुलभ हों, इसके
लिए व्यापक रणनीति तैयार की जा रही है। उन्होंने प्रदेश में
उद्यमियों को उद्योग लगाने हेतु सकारात्मक सोच विकसित करने पर
बल दिया। उन्होंने आश्वस्त करने की कोशिश की कि प्रदेश में
निवेश का वातावरण बेहतर बनाने के लिए प्रत्येक स्तर पर प्रभावी
एवं ठोस कदम उठाये जाएंगे। सीआईआई के प्रतिनिधि किरन चोपड़ा ने
कहा कि प्रदेश के उत्पादों में वैल्यू एडीशन राज्य में ही किया
जाये, ताकि उसका लाभ प्रदेश की अर्थ्व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण
में हो सके। उन्होंने प्रदेश में पर्यटन विकास की अपार
सम्भावनाओं के विकास के लिए ठोस कदम उठाने पर चर्चा की। आईआईए
के अधिशासी निदेशक डीएस वर्मा ने कहा कि प्रदेश में सरकारी एवं
निजी संवाद के माध्यम से एक ऐसा मेकेनिज्म तैयार किया जाए, जो
औद्योगीकरण में सहायक बने। विश्व बैंक के आर्थिक निवेश मामलों
के विशेषज्ञ जॉन स्पीकमैन ने कहा कि जनहित और औद्योगिक विकास
के लिए बनायी जाने वाली नीतियों को प्रभावी ढंग से
क्रियान्वित करना ही सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होने कहा कि
सरकार प्राइवेट सेक्टर के साथ इस प्रकार समन्वय स्थापित करे
ताकि नीतियों व्यवहारिक रूप दिया जा सके और इसका लाभ आम लोगों
को सरलता से उपलब्ध हो सके। उन्होने इस मौके पर एक
प्रस्तुतिकरण भी किया जिसमें उत्तर प्रदेश के बदलते परिदृश्य
में और सुधार का जिक्र किया गया है। विश्व बैंक के ही निवेश
मामलों के विशेषज्ञ ध्रुबा पुरुकायस्थ ने बिहार में निजी
क्षेत्र के निवेश के वातावरण में आए सुधार के बारे में
प्रस्तुतिकरण करते हुये बताया कि किस प्रकार बिहार सरकार ने
निवेश वातावरण में सुधार के लिए ठोस एवं प्रभावी पहल की है।
उन्होनें कहा कि उत्तर प्रदेश को भी ऐसी ही रणनीतियां अपनाकर
निवेश के लिए बेहतर औद्योगिक वातावरण बनाने के प्रयास करने
होगें।
इस संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश सरकार के वो सभी प्रमुख
अधिकारी मौजूद थे जो समय-समय पर औद्योगिक विकास विभाग की
रणनीतियां बनाने और उनके किर्यान्वयन से जुड़े रहे हैं और
उन्हें उत्तर प्रदेश में पूंजी निवेश से जुड़ी समस्याओं की
करीब से जानकारियां हैं। इस मौके पर जो उद्यम प्रतिनिधि आए
उन्होंने इनके सामने प्रश्नों की झड़ी लगा दी जिनका की इन
अधिकारियों के पास कोई उत्तर नहीं था। एक प्रश्न प्रमुखता से
सामने आया कि वे अपने राजनीतिक नेतृत्व को क्यों नहीं समझाते
हैं कि उत्तर प्रदेश में अगर ऐसा वातावरण बना रहा तो यहां कोई
भी नही आएगा। अधिकारियों ने अपनी वाकपटुता से उद्यम
प्रतिनिधियों को समझाने की कोशिश तो कीं लेकिन उनमें इसलिए कोई
भरोसा नज़र नहीं आया क्योंकि जिन्हें इन पर अमल करके सिद्घ करना
चाहिए उनके इरादे बहुत भ्रष्ट हैं इसलिए जो दावे इस संगोष्ठी
में किए जा रहे हैं वे शमशान में खड़े होकर वैराग्य की बातें
करने से अधिक कुछ नहीं हैं-उत्तर प्रदेश अब उद्यमियों से पामाल
होने की ओर बढ़ चुका है जिसे अब ये अधिकारी तो क्या कोई नही
रोक सकता। इस कड़वी सच्चाई का कुछ ऐसा संदेश लेकर यह संगोष्ठी
समाप्त हुई।
संगोष्ठी
में बोलने वाले लगभग सभी उद्यम प्रतिनिधि वक्ताओं ने यूपी
के वातावरण पर खुलकर अपने विचार रखें। पीएचडी के प्रतिनिधि
ब्रिगेडियर अमिताभ ने कहा कि निर्धारित नीतियों में बार बार
परिवर्तन नहीं करना चाहिए, ताकि निरंतरता बनी रहे। लखनऊ
विश्विद्यालय के प्रोफेसर वाई-त्यागी, गिरि संस्थान के निदेशक,
डा एके सिंह, अर्थशास्त्री डा अरविंद मोहन ने उत्तर प्रदेश के
औद्योगिक परिदृश्य पर प्रस्तुतिकरण किया। इनके आलावा टाटा
कंसल्टेंसी सर्विस के रीजनल हेड जयंत कृष्ण तथा एसौचैम के
प्रतिनिधि वर्मा ने भी विचार रखे। उद्योग बंधु के अधिशासी
निदेशक अरुण कुमार सिन्हा का दावा था कि राज्य सरकार ने हर
स्तर पर उत्कृष्ट कोटि की अवस्थापना सुविधाओं के विकास में
निजी सहभागिता में प्रमुखता दी है। उन्होंने यह भी कहा कि
उद्यमियों की कठिनाइयों का निराकरण समयबद्ध सुनिश्चित करने की
व्यवस्था की गयी है। गोष्ठी में प्रमुख सचिव, औद्योगिक विकास
नीता चौधरी, प्रमुख सचिव, अवस्थापना विकास वीएन गर्ग एवं
उद्योग बन्धु के संयुक्त अधिशासी निदेशक रणवीर प्रसाद सहित
विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों और उद्यमी संस्थाओं के
प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि
उद्यम प्रतिनिधियों की बातें
जिन
और अधिकारियों को सुननी चाहिए थीं वे इस गोष्ठी में मौजूद ही
नहीं थें क्योंकि वे ही यूपी के इस खराब वातावरण के लिए
जिम्मेदार माने जाते हैं।
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