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सुरजीत
हमेशा याद किए जाएंगे!
नई दिल्ली। किसी
दार्शनिक
ने कहा है कि आप जब पहले किसी मनुष्य में उसकी अच्छाइयां
देखोगे और उनकी चर्चा करोगे तो उसमें बुराइयां अपने आप ही खत्म
हो जाएंगी। हम यहां जिनकी चर्चा कर रहे हैं वो हैं-हरिकिशन
सिंह सुरजीत उर्फ लंदन तोड़ सिंह, एक महान क्रांतिकारी और देश
के जाने-माने वामपंथी। इस नाम के साथ कई विशेषण जुड़े हैं जो
अच्छे तो हैं ही मगर कुछ खराब भी हैं। विवादास्पद मामलों में
कभी-कभी ज्यादा ही चुभती बात कहने वाले और कभी काला चश्मा
लगाकर सच्चाई से अलग हटकर बोल जाने वाले कामरेड सुरजीत और
राजनीतिक संकट में मध्यस्थ की भूमिका में सक्रिय होने वाले
सुरजीत अब इस दुनियां में नहीं हैं। दिल्ली में निगमबोध घाट पर
उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुईं देशभर की राजनीतिक, सामाजिक,
आर्थिक, साहित्य जगत की विख्यात हस्तियों के बीच कामरेड सुरजीत
के व्यक्तित्व की ऐसी ही चर्चा होती रही।
इस कामरेड में पता नहीं ऐसी क्या बात थी कि उनकी
राजनीतिज्ञों के बीच मौजूदगी हलचल पैदा करती थी और उनमें
राजनीतिज्ञ अपने समाधान खोजते हुए नज़र आते थे। कहां पंजाब की
जाट संस्कृति और कहां बंगाल का खालिस वामपंथ, कोई मेल नहीं,
लेकिन सुरजीत ने इसे कर दिखाया और बंगाली भाइयों को अपने पीछे
खड़ा कर दिया। तीसरे मोर्चे के लिए लामबंदी करने वाले मुलायम
सिंह यादव और कामरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत के बीच गज़ब की
जुगलबंदी थी। सच पूछिए तो मुलायम सिंह यादव ने कामरेड ज्योति
बसु और कामरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत और सोमनाथ चटर्जी के अलावा
किसी को वामपंथी माना ही नहीं। अनेक अवसरों पर मुलायम और
सुरजीत का गठजोड़ देखा गया है। इसीलिए उस दिन निगम बोध घाट पर
सुरजीत की अंत्येष्टि पर सबसे पहले अपने अमर सहयोगी के साथ
मुलायम सिंह यादव ही पहुंचे।
पंजाब प्रांत के जालंधर जिले के बडाला गांव में तेईस
मार्च 1916 को बस्सी जाट परिवार में पैदा हुए कामरेड हरिकिशन
सिंह सुरजीत का जीवन क्रांतिकारी योद्धा के साथ शुरू हुआ और
भारत के वामपंथ के एक शिखर पीढ़ी के साथ जाकर अस्त हो गया।
सरदार भगत सिंह को अपना आदर्श मानने वाले हरिकिशन सिंह सुरजीत
जब बालपन में होशियारपुर की अदालत की छत पर चढ़कर तिरंगा
फहराते हुए अंग्रेज पुलिस की गोली से घायल हुए और जब उन्हें
जख्मी हालत में अदालत में पेश किया गया तो उनके तेवर एक ऐसे
क्रांतिकारी के थे कि जो किसी भी समझौते को तैयार नहीं था। जज
ने जब उनका नाम पूछा तो जानते हों सुरजीत का जवाब क्या था?
मेरा नाम लंदन तोड़ सिंह है।
देशभक्ति के जज़बाती इस कामरेड ने भारत के बड़े-बड़े
राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक उतार-चढ़ाव अपनी नजरों से देखे और
भोगे हैं। सोने की तरह से तपातपाया यह कामरेड अगर विवादों में
रहा है तो चाहतों में भी रहा है। राजनीतिक संकट में हरिकिशन
सिंह सुरजीत को ही मीडिया वाले सबसे पहले घेरा करते थे। अगर
किसी मीडिया वाले के पास उस रोज कोई खबर नहीं है तो वह हरिकिशन
सिंह सुरजीत से ही खबर हासिल किया करता था। मीडिया वालों का
सुरजीत के घर खूब आना-जाना हुआ करता था और सुरजीत भी
वामपंथियों में या फिर मीडिया वालों में घुसे रहते थे।
जब-जब देश ने राज्य सरकारों के राजनीतिक संकटों,
गठबंधनों और उनके पतन के झगड़ों का सामना किया तब-तब हरिकिशन
सिंह सुरजीत बीच में आए। देश में तीसरे मोर्चे के लंबरदार
सुरजीत कांग्रेस के विरोधी थे और एक समय ऐसा आया कि जब बंगाल
के मुख्यमंत्री ज्योति बसु का नाम कांग्रेस के समर्थन से देश
के प्रधानमंत्री के लिए चला तो हरिकिशन सिंह सुरजीत अकड़ गए और
उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि कांग्रेस के समर्थन से बसु के
प्रधानमंत्री बनने का सवाल ही नहीं उठता। इस बात को लेकर
वामपंथियों में हरिकिशन सिंह सुरजीत को विरोध का सामना भी करना
पड़ा। लेकिन सुरजीत की वामपंथी ताकत के सामने किसी की चल नहीं
पाई। हालॉकि कुछ समय बाद कामरेड कांग्रेस का कड़ा विरोध करते
रहने पर नरम भी हो गए और जब वामपंथी कांग्रेस के नेतृत्व वाले
यूपीए गठबंधन में शामिल हुए तो उन्होंने इसका विरोध नहीं किया।
हरिकिशन सिंह सुरजीत उन नेताओं में गिने जाते हैं जिनके
बयान से कभी-कभी गुस्सा फूट पड़ता था। अयोध्या में राम मंदिर
और देश के धार्मिक मामलों और स्थलों से जुड़े विवादों पर बोलने
वाले सुरजीत हमेशा भाजपा, आरएसएस और अन्य हिंदुवादी संगठनों के
निशाने पर रहे। वह वैचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी और
आरएसएस के प्रखर विरोधी तो थे। आरएसएस, भारतीय जनता पार्टी के
नेताओं की राय सुरजीत के भारतीय दर्शन से कभी मेल नहीं खाती
थीं। दोनों के बीच में खूब खट-पट हुआ करती थीं। लेकिन उन्होंने
कुछ ऐसे मुद्दों पर जिनका राष्ट्रवाद से संबंध है तो अनायास ही
भाजपा या आरएसएस को निशाना भी नहीं बनाया। जिस कारण सुरजीत को
एक गंभीर राजनेता के रूप में और कभी-कभी एक मजाकिया नेता के
रूप में भी देखा गया। जीवन के अंतिम वर्षों में जब पोलित
ब्यूरो से बाहर आए तो लोगों को लगा कि कामरेड की राजनीतिक
उपयोगिता खत्म हो गई है किंतु हरिकिशन सिंह सुरजीत मरते दम तक
अपनी उपयोगिता को कायम रखे रहे। मृत्यु से कुछ समय पहले जब वह
अस्पताल में दाखिल हुए तो उन्हें देखने के लिए राजनेताओं
मीडियाकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का खूब आना-जाना लगा
ही रहा।
हरिकिशन सिंह सुरजीत की प्रारंभिक वामपंथी पृष्ठभूमि
देखी जाए तो करीब बीस-बाइस साल की उम्र में ही वह वामपंथी हो
गए थे। उन्होंने एक दो पत्रिकाएं भी निकालीं और पंजाब में
किसान सभा की स्थापना की। वे एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने देश के
क्रांतिकारी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और आजादी मिलने
के बाद भी उन्हें फरार घोषित माना गया, जिस कारण करीब चार-पांच
साल उन्हें आजाद हिंदुस्तान में ही अंग्रेजों से बचकर भूमिगत
रहना पड़ा। इसी दौरान उन्होंने अपने को वामपंथी आंदोलन में
उतार दिया और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में पोलित ब्यूरो
के सदस्य तक पहुंच गए। खरा-खरा बोलने की आदत ने उन्हें विवादों
में रखा। गैर वामपंथी और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह
यादव से उनका बहुत अनुराग था और मुलायम भी उन्हें इतना चाहते
थे कि जब मुलायम सिंह यादव और कांग्रेस के बीच झगड़ा शिखर पर
था तो सुरजीत ही इसमें मध्यस्थता करने आए थे। यह अलग बात है कि
इसमें उनको सफलता नहीं मिल सकी। वामपंथियों का यूपीए सरकार को
समर्थन रहा लेकिन सुरजीत के मन में यह टीस हमेशा रही कि
वामपंथी कांग्रेस के साथ खड़े हो गए हैं और वे कांग्रेस के
हाथों मुलायम सिंह यादव को परेशान किया जाना देख रहे हैं। कहने
का आशय यह है कि सुरजीत और मुलायम दोनों एक दूसरे के अत्यंत
करीब रहे हैं।
हरिकिशन सिंह सुरजीत वामपंथियों में इतने ताकतवर नेता
थे कि ज्योति बसु जैसे प्रचंड वामपंथी नेता भी सुरजीत के सामने
ज्यादा नहीं बोलते थे। हालांकि पंजाब में वामपंथ का कोई मतलब
नहीं है लेकिन एक पंजाबी वामपंथी का वह दबदबा जो वामपंथी
समर्थित पश्चिम बंगाल राज्य में था, उसे मानना होगा। कामरेड की
खट्टी-मीठी बातें कभी-कभी बहुत तनाव में चली जाती थीं लेकिन
उनकी बातों का ज्यादा बुरा भी नहीं माना गया। आज प्रकाश करात,
सीताराम येचुरी जैसे नेताओं की राजनीतिक रणनीतियां तो बिल्कुल
विफल समझी जाती हैं। सुरजीत तो उस दौर के हैं कि जब राजनीति
में नैतिक बल और सिद्धांतवादी नेताओं का बोलबाला था।
कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत ने अपना पूरा जीवन देश और
वामपंथ को समर्पित किया। अपने दौर की उनकी राजनीतिक और उनकी
वामपंथी सेवाओं की देश में हमेशा चर्चा होगी। भारत और दुनिया
के वामपंथ में अब उनकी स्मृतियां ही बची हैं। आप चिरनिद्रा में
सोईए लेकिन आपकी रणनीतियां कहीं न कहीं इस देश की राजनीति में
काम आती रहेंगी जिससे आप बार-बार याद किए जाएंगे। स्वतंत्र
आवाज़ डॉट काम का आपको लाल सलाम!
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