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तमिल टाइगर्स पर कसा श्रीलंका का शिकंजा
कोलंबो।
श्रीलंका में तमिल टाइगर्स का तमिल ईलम का सपना कमजोर पड़ रहा
है। जो तमिल टाइगर्स श्रीलंका सरकार के सुरक्षा बलों पर भारी
पड़ा करते थे, आज श्रीलंकाई सेना उन पर भारी पड़ रही है।
श्रीलंका की सेना ने तमिल
विद्रोहियों (लिट्टे) के खिलाफ पिछले 25 साल से जारी अभियान
में अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी हासिल की है। सेना ने तीन तरफ
से जबरदस्त हमला बोलकर लिट्टे का मुख्यालय कहे जाने वाले
किलिनोच्चि कस्बे पर कब्जा लिया
है। पिछले साल
सेना ने लिट्टे के गढ़ कहे जाने वाले जाफना प्रायद्वीप में
लिट्टे की अग्रिम रक्षा पंक्तियों को भारी नुकसान पहुंचाने
में सफलता पाई है। श्रीलंकन सेना का तमिल टाइगर्स पर हमला इस
बात का प्रमाण है कि लिट्टे अब श्रीलंका सेना का वैसा मुकाबला
नहीं कर पा रहा है जैसा कि उसने अपने शुरूआती दौर में किया था।
श्रीलंका
के राष्ट्रपति महिंदा
राजपक्षे इस कामयाबी से बहुत उत्साहित हैं। वह श्रीलंका के ऐसे
पहले राष्ट्रपति हैं जिन्होंने अपने यहां तमिल विद्रोह पर काबू
पाने में सबसे ज्यादा सफलता हासिल की है।
इससे श्रीलंका सेना का मनोबल बहुत ऊंचा हुआ है।
लिट्टे की हवाई पट्टियों और उसके कब्जे वाले कुछ शहरों और
कस्बों में श्रीलंका सेना अपना कब्जा जमा चुकी है और जाफना
जैसे इलाके को अपने कब्जे में लेने के लिए श्रीलंका सेना का
सशस्त्र अभियान जारी है।
तमिलों को लंबे समय से तमिल ईलम का सपना
दिखाते आ रहे
लिट्टे के प्रमुख वेलूपिल्लई प्रभाकरन के लिए यह भारी झटका है। वह मीडिया के
जरिए अभी भी यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि
लिट्टे के कब्जे वाले
इलाकों में उनकी
पहले जैसी मजबूत पकड़ है और वह श्रीलंका की आर्मी को
मुंहतोड़ जवाब दे रहा है।
मगर सच्चाई इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। इस
दौरान प्रभाकरन के कई प्रमुख सहयोगी
भी उनका साथ छोड़कर न केवल कहीं और अपना भविष्य खोज रहे हैं अपितु
प्रभाकरन के खिलाफ जमकर बयानबाजी भी कर रहे हैं।
पिछले दिनों श्रीलंका सेना के जबर्दस्त सशस्त्र
अभियान में लिट्टे को भारी नुकसान से गुजरना पड़ा। श्रीलंका
सेना ने न केवल लिट्टे के गोला बारूद और उसकी हवाई पट्टियों को
नष्ट करते हुए
भारी संख्या में तमिल टाइगर्स को मौत के घाट
उतारा अपितु उन क्षेत्रों में अपना मजबूत कब्जा कायम किया,
जहां वर्षों से तमिल टाइगर्स की मर्जी के बिना श्रीलंका सेना
का कोई पक्षी भी पर नहीं मार सकता था। इस तबाही से लिट्टे के
मुखिया वी प्रभाकरन की शक्ति के प्रति तमिलों में आशंका पैदा
हुई है और श्रीलंका सेना के जाफना पर कब्जा करो अभियान से उनमें
भगदड़ सी मची
हुई है। इसका असर भारत में रह रहे तमिलों की प्रतिक्रियाओं में
देखने को मिल रहा है, जिनमें तमिलनाडु के
मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के बयान और भारत सरकार में उनकी
पार्टी के मंत्रियों के इस्तीफे प्रमुख दृष्टांत हैं।
बयानों में
कहा जा रहा है कि श्रीलंका सरकार अपने यहां तमिलों का दमन कर रही
है। करुणानिधि की स्थिति यह है कि वह दक्षिण भारत में अपने को
लिट्टे से अलग करके नहीं चल सकते, भले ही कानूनी दृष्टिकोण से
वह उसका सार्वजनिक रूप से साथ देने में हिचकिचाते हों।
तमिलनाडु के नेताओं ने श्रीलंका में तमिलों के दमन को
लेकर अपना आक्रोश जताते हुए भारत सरकार पर जो दबाव बनाया
हुआ है उसने
श्रीलंका सरकार के सशस्त्र बलों को और ज्यादा मजबूत करने का
काम किया है। भारतीय तमिल नेताओं ने श्रीलंका के तमिलों के
मामलों पर शोर-शराबा मचाकर इस बात की तसदीक कर दी है कि
वास्तव में श्रीलंका सेना श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों पर
भारी पड़ चुकी है और अब ऐसा कोई रास्ता नहीं बचा है कि भारत
सरकार भी इसमें अपनी कोई भूमिका निभा सके, क्योंकि पहले से ही
भारतीय समुदाय में तमिल टाइगर्स को लेकर अच्छी भावनाएं नहीं
हैं। भारत इस समय एक ऐसे आतंकवाद का सामना कर रहा है जिसमें
विश्व युद्घ की स्थितियां निर्मित हो रही हैं। ऐसे में भारत
का ध्यान
अपनी समस्या और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर है,
जबकि भारत के दक्षिण
भारतीय नेताओं में तमिल टाइगर्स के
अस्तित्व को लेकर सामने आ रही चुनौतियों की
चिंता है जिसमें भारत अपने को उलझाना नहीं चाहता है। हालांकि
लिट्टे भारतीय उपमहाद्वीप की पाकिस्तानी आतंकवादी गतिविधियों
से अपने को अलग रखने का संदेश देता आ रहा है, लेकिन लिट्टे पर
भारत को उतना भरोसा नहीं है क्योंकि वह राजीव गांधी
हत्याकांड में संलिप्त पाया गया है।
श्रीलंका के राष्ट्रपति
महिंदा राजपक्षे भारत के दक्षिण भारतीय नेताओं के
श्रीलंका में तमिलों के दमन के आरोप से पूरी
तरह से इनकार करते हैं और कहते हैं कि वह उन क्षेत्रों में
सुरक्षात्मक उपाय कर रहे हैं जहां पर तमिल विद्रोहियों ने
कानून व्यवस्था को अपने हाथ में ले रखा है। तमिलों
की श्रीलंका विरोधी गतिविधियों
को काबू करने का चाहे यही तरीका हो, किंतु इसे अब तक का सबसे
सफल तरीका माना जा रहा है, जिसमें कि लिट्टे को भारी नुकसान
उठाना पड़ रहा है। श्रीलंका के राष्ट्रपति
महिंदा राजपक्षे की यह भारी कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है कि विश्व समुदाय में भी श्रीलंका सरकार अपना
पक्ष रखने में ज्यादा सफल हो रही है। लिट्टे के नेता वी
प्रभाकरन के साथ एक साथ कई सामाजिक और राजनीतिक दिक्कतें खड़ी
हो रही हैं। एक समय था, जब प्रभाकरन ने तमिलों में यह उम्मीद
जगा दी थी कि वह श्रीलंका में तमिल ईलम का सपना साकार करके
रहेंगे। लेकिन उनकी बाद की रणनीतियों ने प्रभाकरन को काफी पीछे
कर दिया और उनके साथ जो तमिल नेता खड़े हुए हैं, उनमें से कई
प्रभावशाली नेता उनसे
गंभीर मतभिन्नता के कारण अलग हो चुके हैं।
अब प्रभाकरन
बुरी तरह से श्रीलंका से घिरे हुए हैं और वह अपने को बचाने के
संघर्ष में जुटे हुए हैं। उनके प्रभाव वाले इलाके में श्रीलंका
के सुरक्षाबल काफी ताकत के साथ घुस रहे हैं और ऐसी कोई खबर
नहीं आ रही है कि जिन इलाकों पर श्रीलंका सुरक्षाबलों ने
कब्जा किया था उन पर तमिल टाइगर्स ने फिर से कब्जा कर लिया
हो। इस समय तमिल टाइगर्स आत्मघाती हमलों को अंजाम दे रहे हैं
और यह उनका डूबते तमिल साम्राज्य को बचाने का अंतिम हथियार माना जाता
है, लेकिन अब सवाल
यह है कि तमिल ईलम
और प्रभाकरन के प्रति निराशाजनक वातावरण में यह हथियार
भी कब तक काम करेगा?
वी प्रभाकरन इस समय भारतीय तमिल नेताओं का समर्थन जुटाने
और उनसे भारत सरकार से इस बात के लिए दबाव बनाने में जुटे हैं
कि वह श्रीलंका सरकार पर यह दबाव बनाए कि वह सुरक्षा के नाम पर
तमिलों पर अत्याचार न करें। भारत सरकार इस समय तटस्थ की
भूमिका में खड़ी दिखाई देती है और वह उन औपचारिकताओं को निभा
रही है जो कि
कूटनीतिक स्तर पर आमतौर पर जरूरी समझी जाती है।
उधर दक्षिण भारत में
कुछ सामाजिक बदलाव आ रहे हैं, जिनका असर लिट्टे पर भी पड़ रहा
है। यह अलग बात है कि लिट्टे सामाजिक मामलों में कोई
अड़ंगेबाजी नहीं करता है और वह निचले तबके को साथ लेकर चलने की
कोशिश करता है। किंतु उसकी श्रीलंकाई परेशानियों के कारण उसके
सामाजिक समीकरणों
पर
भी एक प्रश्न मंडरा रहा है। लिट्टे के लिए श्रीलंका
सरकार के हमलाई अभियान को रोकने या उसका सामना करने के साथ-साथ
यह चुनौती भी है कि वह अपने विश्वसनीय सहयोगियों को अपने साथ
बनाए रखे जो कि प्रभाकरन
के प्रति निराशा के कारण
लिट्टे से अलग होते जा रहे हैं। अब
यह कहां तक संभव है यह वक्त ही बताएगा क्योंकि प्रभाकरन के हाथ
से लगभग महत्वपूर्ण तीर निकल चुके हैं।
किलिनोच्चि के सभी
मुख्य प्रतिष्ठान अब सेना के कब्जे में है, जहां से विद्रोही
संगठन लिबरेशन टाइगर आफ तमिल ईलम (लिट्टे) सालों से
अपनी समानांतर सरकार चला रहा था। सेना की तीन टुकड़ियों ने
टैंकों, भारी तोपों और बमवर्षक विमानों की मदद से तीन तरफ
से किलिनोच्चि पर हमला बोला। विद्रोहियों की रक्षापंक्ति
तहस-नहस कर सेना की टुकड़ियां कस्बे के बीचोंबीच जा पहुंची।
किलिनोच्चि पर कब्जे की घोषणा करते हुए राष्ट्रपति महिंदा
राजपक्षे ने टेलीविजन पर प्रसारित संदेश में कहा, 'किलिनोच्चि
पर अब हमारी साहसी सेनाओं का पूर्ण नियंत्रण है।' सैन्य बलों
की बहादुरी की तारीफ करते हुए राजपक्षे ने कहा कि उन्होंने
लिट्टे की कमर तोड़ दी है। राष्ट्रपति पहले ही घोषणा कर चुके
हैं कि विद्रोहियों के सफाए के बाद उनकी सरकार की तमिल बहुल
वाले समूचे उत्तरी इलाके में चुनाव
कराने की योजना
है।
अपना
मुख्यालय हाथ से निकल जाने को लेकर लिट्टे की ओर से अभी कोई
बयान नहीं आया है। न ही लिट्टे प्रमुख वी. प्रभाकरण समेत
शीर्ष विद्रोही नेताओं के बारे में कोई जानकारी जारी की गई है।
लेकिन,
राष्ट्रपति की इस
घोषणा के कुछ देर बाद ही
लिट्टे के आत्मघाती दस्ते ने कोलंबो
में वायु सेना के मुख्यालय के बाहर धमाका किया। इस हमले में दो
लोग मारे गए। बहरहाल,
सेना की
इस जीत की खबर फैलते ही राजधानी
के लोग जश्न मना रहे
हैं। उधर भारत सरकार प्रभाकरन
पर तमिल सेना का निर्णायक शिकंजा कसता हुआ देखकर प्रभाकरन को
भारत के हवाले करने की मांग उठा चुकी है, जिस पर श्रीलंका
सरकार ने सकारात्मक बयान जारी किया है। श्रीलंका का लिट्टे के
गढ़ों पर कब्जा करने का अभियान सफलतापूर्वक जारी है।
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