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स्मृतियां
बज़्मे उर्दू शिवपुरी नहीं रहे
नई दिल्ली।
उर्दू अदब की अजीम श़िख्सयत, उस्ताद शाइर जिन्होंने जिन्दगी भर
अपनी गज़लों और नज़्मों से तमाम महफिलों को रोशन किया, जिनकी
पेशानी पर कभी भी तनाव के बादल प्रकट नहीं हुए, जिनकी गम्भीरता
और सादगी ने अपनों को ही नहीं गैरों को भी प्रभावित किया-जनाब
जहूर अहमद खान ‘जहूर’ अब हमारे बीच नहीं रहे। नई दिल्ली में
उनका इंतकाल हो गया। उनके निधन से बज़्मे उर्दू, शिवपुरी का
रोशन चिराग बुझ गया है, अदबी महफिलों में वीरानगी छा गयी है।
प्रो वायुनंदन पाण्डेय का अवसान
वाराणसी।
काशी की आचार्य-परम्परा में संस्कृतभाषा एवं साहित्य के
मूर्धन्य विद्वान प्रो वायुनंदन पाण्डेय के अवसान से
साहित्य-जगत में एक रिक्ति या शून्यता अनुभव की गयी। डा
पाण्डेय सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में साहित्य
विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी परम्परा के
छात्रों का दिशा-निर्देश करते हुए आजीवन सारस्वत-साधना करते
रहे। केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार के संस्कृत-संस्थान और
अकादमी से सम्मान प्राप्त डॉ० पाण्डेय के प्रति श्रद्धांजलि।
प्रो राममूर्ति शर्मा का निधन
वाराणसी।
देववाणी की परम्परा में दर्शनशास्त्र के विद्वान आचार्य प्रो
राममूर्ति शर्मा ने भी देह त्याग कर दिया। काशी में वे
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में (1999-2002) तक
कुलपति एवं महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ में कार्यकारी कुलपति
रह चुके थे। केन्द्र और राज्य सरकारों से सम्मान प्राप्त डॉ
शर्मा को पिछले दिनों मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित किया
गया था। वे विभिन्न विश्वविद्यालयों में नेशनल लेक्चरर,
नेशनल-फेलो समेत कई पदों पर रह चुके थे।
सागर खय्यामी का इंतकाल
मुंबई। तंज
और मिजाह (हास्य व व्यंग्य) मशहूर शायर सागर खय्यामी का मुंबई
के नानावटी अस्पताल में इंतकाल हो गया। लखनऊ के मशहूर घराने
गुफरामआब से ताल्लुक रखने वाले सागर खय्यामी पूरी जिन्दगी
लोगों को हँसाते रहे। उनका पूरा नाम सय्यद रशीदुल हसन नकवी था
और तखल्लुस सागर खय्यामी था।
जिन्दगी भर लोगों को अपनी तंजिया गजलों से हँसाने वाले
70 वर्षीय हरदिल अजीज शायर जब दुनिया से रुखसत हुए तो पुराने
शहर में उनके चाहने वालों की आँखों से अश्कों का सैलाब बह
निकला। क्रिकेट से विशेष लगाव रखने वाले इस शायर की क्रिकेट पर
लिखा गजल संग्रह ‘अंडर क्रीज’ बेहद मशहूर हुआ। सागर को भारत
में तकरीबन सभी प्रदेशों की उर्दू अकादमियों ने सम्मान से
नवाजा। वर्ष 1997 में केन्द्र सरकार ने उन्हें मिर्जा गालिब
एवार्ड से नवाजा। उनकी लिखी सर्दी, दिल्ली की बस व क्रिकेट आदि
नज्में बेहद मशहूर हुईं।
तीसरे सप्तक की कवयित्री कीर्ति चौधरी नहीं
रहीं
लंदन। तीसरा
सप्तक की प्रतिष्ठित कवयित्री कीर्ति चौधरी का निधन 20 जून को
लंदन में उनके आवास पर निधन हो गया। वह 74 वर्ष की थीं। उनकी
कविताओं और कहानियों का समग्र भी इस वर्ष प्रकाशित हुआ था।
अज्ञेय के तीन सप्तक में शामिल कीर्ति अपने कहानीकार पति
ओंकारनाथ श्रीवास्तव के निधन के बाद लंदन में अपनी बेटी अतिमा
श्रीवास्तव के साथ रह रही थीं।
पं देवकीनंदन शास्त्री नहीं रहे
वाराणसी। अंक
ज्योतिष के अप्रतिम विद्वान पं देवकी नंदन शास्त्री नहीं रहे।
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के गोल्ड मेडलिस्ट पं
देवकीनंदन शास्त्री ने वेद व कर्मकाण्ड पर भी कई चर्चित
पुस्तकें लिखीं। इन्हें कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय
पुरस्कार भी मिले थे।
नहीं रहे पद्मविभूषण पं० किशन महाराज
काशी। यहां
की संगीत परम्परा की अनन्य विभूति तबला-सम्राट पं किशन महाराज
(85 वर्ष) का देहावसान 5 अप्रैल को हो गया। वे अपने पितृव्य पं
कंठे महाराज के शिष्य थे। काशी की संगीत-परम्परा में किशन
महाराज स्वयं एक घराने का प्रतिनिधित्व करते थे। संगत-वाद्य
‘तबले’ को एक विशिष्ट स्थान देना ही, लय-ताल के मर्मज्ञ इस
संगीत-साधक का प्रमुख कार्य-क्षेत्र रहा है। देश-विदेश की
विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया था। भारत सरकार ने
पद्मश्री (1973) और पद्मविभूषण (2002) जैसे राष्ट्रीय-सम्मान
से विभूषित किया था।
‘मैनेजमेंट गुरु’ ने भी अलविदा कहा
वाराणसी।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रबन्धन की पढ़ाई को नया आयाम
देने वाले 80 वर्षीय प्रो० मुकुंदलाल ने अंततः इस दुनिया को
अलविदा कह दिया। विद्यार्थी से लेकर शिक्षण तक के अपने जीवन को
अपने ही अन्दाज में जीने और बनारसी तहजीब संजोते हुए प्रो० लाल
उम्र भर शिक्षा ग्रहण करते व बाँटते रहे। वह स्कूल ऑफ
मैनेजमेंट साइंसेज (एसएमएस) के संस्थापक निदेशक व महानिदेशक भी
रहे। इनके नेतृत्व में एसएमएस ने बुलन्दियाँ हासिल कीं। हिन्दी
के प्रति उनकी अगाध निष्ठा का भाव इस बात से ही झलकता है कि
आपने सांख्यिकी की किताब हिन्दी में लिखी और पुरस्कार भी पाया।
वह प्रबंधशास्त्र संकाय (बीएचयू) के डीन रहे तथा वर्ष 1995 में
सेवानिवृत्त हुए। उन्हें प्रबन्धन के क्षेत्र में एक अद्भुत
गुरु के रूप में देखा जाता है।
लेखक सुशील कुमार का निधन
हिन्दी के
लेखक एवं पत्रकार सुशील कुमार का 9 मई को दिल का दौरा पड़ने से
निधन हो गया। वे 73 साल के थे। सन 1935 में इलाहाबाद में जन्मे
कुमार हिन्दी रीडर्स डाइजेस्ट सर्वोत्तम मैगजीन के एडीटर थे।
उन्होंने महाभारत के स्त्री पात्रों, कुंती, पांचाली, गांधारी,
देवकी, सत्यवती, रुक्मिणी पर छह खण्डों में उपन्यास लिखा था।
इसके अलावा उन्होंने कर्ण पर भी दो खण्डों में उपन्यास लिखा
था। वे इन दिनों कौटिल्य पर एक उपन्यास लिख रहे थे।
डा गिरिजाशंकर त्रिवेदी नहीं रहे
देहरादून।
प्रसिद्ध साहित्यकार व संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान 68 वर्षीय
डॉ गिरिजाशंकर त्रिवेदी का 15 अप्रैल 2008 को निधन हो गया। गले
के कैंसर से ग्रस्त होने के कारण पिछले एक वर्ष से वे ठीक से
बोल नहीं पाते थे। इसके बावजूद वे अन्तिम साँस तक पूर्ण सक्रिय
रहे। उनकी चर्चित पुस्तकों में इन्द्रालय (1970), ज्योतिरथ
(1971), हमारी सांस्कृतिक विरासत (1971), वाल्मीकि के वन और
वृक्ष (1988), महाभारत के वन और वृक्ष (1989) उल्लेखनीय हैं।
उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘साहित्यिक अंत्याक्षरी’, ‘मानस
अंत्याक्षरी’ देशभर की शिक्षा संस्थाओं में काफी लोकप्रिय हुई
है। अस्वस्थता के कारण जब उनकी वाणी अवरुद्ध हो गई, तब
उन्होंने अपनी लेखनी को पूर्णतः सक्रिय कर ‘तुलसी के मंगल दल’,
‘उनको याद करें’, ‘इन्द्रधनुष कसे बिजली की डोर’ जैसी रचनाएँ
दी हैं।
कवयित्री डा इन्दु जैन नहीं रहीं
हिन्दी की
प्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका 72 वर्षीय डा इन्दु जैन का 27
अप्रैल को निधन हो गया। उन्होंने कविता पर दस से अधिक व गद्य
एवं अन्य विषयों पर छः से अधिक पुस्तकें लिखीं तथा
‘इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका’ के ‘भारत ज्ञानकोश’ के छह भागों
का सम्पादन भी किया। साहित्य सेवा के लिए उन्हें हिन्दी अकादमी
के ‘साहित्य कृति पुरस्कार’, ‘राजा राममोहन राय कलाश्री
सम्मान’, ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ आदि से विभूषित किया गया।
‘द लैंड’ की लेखिका का निधन
सिओल। दक्षिण
कोरिया की प्रख्यात साहित्यकार पोर्क क्युंग नी का लम्बी
बीमारी के बाद यहाँ निधन हो गया। पोर्क क्युंग नी 81 वर्षीय
महान लेखिका लम्बे अर्से से गले के कैंसर से पीडि़त थीं।
उन्हें 19वीं और 20वीं शताब्दी में कोरिया में हुए दमन के
विरोध में लिखे महाकाव्य ‘द लैंड’ के लिए जाना जाता है। समूचे
कोरिया में तोजी के नाम से मशहूर इस लेखिका ने 1955 में अपने
लेखन की शुरुआत की थी। ‘द लैंड’ की रचना करने में उन्हें
पच्चीस वर्ष लगे। इस महाकाव्य पर कई टीवी सीरियल व फिल्में बनी
और कई नाटकों का मंचन हुआ। इस काव्य में सैकड़ों चरित्र हैं।
दक्षिण कोरिया के सांस्कृतिक मंत्री ने बताया कि साहित्य के
क्षेत्र में तोजी के अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें देश का
सर्वोच्च सम्मान दिया जाएगा।
रचनाकार निर्मला देशपांडे
सुप्रसिद्ध
गांधीवादी रचनाकार, विचारक, सामाजिक कार्यकर्ती, सांसद निर्मला
देशपांडे ने मई महीने की पहली तारीख को इस नश्वर संसार का
परित्याग कर दिया। उनके पिता पुरुषोत्तम यशवंत देशपांडे
प्रसिद्ध चिंतक व साहित्यकार थे। निर्मलाजी अपनी युवावस्था में
ही विनोबाभावे के पवनार आश्रम से जुड़ गयीं और उन्होंने अपना
जीवन भूदान आन्दोलन को समर्पित कर दिया। विभिन्न धर्मों के बीच
आपसी भाईचारे की हिमायती रहीं निर्मलाजी ने महिलाओं,
आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के लोगों की स्थिति सुधारने के लिये
भी कार्य किया। उन्होंने हिन्दी में उपन्यास, नाटक,
यात्रा-वृत्तान्त के अलावा विनोबा भावे की जीवनी भी लिखी।
उन्हें वर्ष 1997 और 2004 में राज्यसभा का सांसद चुना गया। सन्
2005 में उन्हें नोबल शांति पुरस्कार के लिये भी नामित किया
गया था। पद्मविभूषण से सम्मानित निर्मलाजी को सन् 2007 में
राष्ट्रपति पुतिन ने उन्हें ‘आर्डर ऑफ फ्रेंडशिप’ सम्मान
प्रदान किया था। उनके निधन से गांधी-चिन्तन के एक युग का समापन
हो गया।
(कला साहित्य में उपयोग सभी सामग्री भारतीय वांगमय पत्रिका
के जून-जुलाई अंक से साभार)

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