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जाने कहां गए वो सात सुर
?
मुंबई।
विभिन्न टीवी
चैनलों पर सुरसंगीत प्रतियोगिताओं को देखकर ऐसा लगता है कि
जैसे संगीत की बेसुरी
दुकानें
खुल गई हों। सात
सुरों तक पहुंचने वाले गले आज सुनाई ही नहीं पड़ते
हैं। एसएमएस से
वोट कराकर या निर्णायकों के सामने प्रतिभागी का चयन करने की जो
परंपरा शुरू हुई है उससे संगीत का कितना भला होगा-उनमें कितने
मोहम्मद रफी, मुकेश, किशोर कुमार, लता मंगेशकर या सुरैया सरीखे
कलाकार अवतरित होंगे कि नहीं यह कहना बहुत मुश्किल है अलबत्ता
इन प्रतियोगिताओं के माध्यम से जो संगीत का बेसुरा बाजार खड़ा
हो गया है उसमें भारतीय संगीत जरूर नेस्तनाबूद हो रहा है। आज
टीवी के किसी भी मनोरंजन चैनल को ऑन करते ही कुछ नवोदित गवैये
कुछ अंजाने निर्णायकों के सामने गानों की शक्ल में चिल्लाते और
उछलते कूदते असंगत
पोशाकों में नजर आएंगे। इससे यह पता चलना
कोई आसान काम नहीं है कि यह प्रतियोगिता गाने की है या उछल
कूदने की। किसी ऐसी सुर प्रतियोगिता के जरिए प्रतिभा का आंकलन
नहीं किया जा सकता। लता मंगेशकर जैसी महान गायिका का यह कहना
ऐसी प्रतियोगिताओं के आयोजनों पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
वास्तव में लगा है कि लता मंगेशकर आज के संगीत से व्यथित हैं।
वे इससे पहले भी कई बार ऐसे प्रतियोगी कार्यक्रमों पर अपनी साफ
राय दे चुकी हैं।
पिछले कुछ
वर्षों में भारत में टीवी चैनलों पर और फिल्मों में संगीत के
नाम पर संगीत का जो जनाजा निकला है उससे अब आगे वैसे कर्णप्रिय
संगीत की उम्मीदें खत्म हो रही हैं। भारत का संगीत दुनिया में
आदिकाल से अपनी एक पहचान बनाए रहा है। भारतीय संगीत में ही वह
ताकत है कि जिससे कुछ लोग मरीजों का उपचार करते हैं, मेघों से
पानी बरसने लगता है और वन में विचरण करने वाले मृग मधुर संगीत
सुनकर रूक जाते हैं और कृष्ण की बांसुरी से निकला संगीत तो जगत
प्रसिद्ध हैं जिसकी तान सुनकर गायें भी कृष्ण के पास दौड़ी चली
आती हैं और गोपियां उनका हाल ऐसे हो जाता है जैसे जंगल में एक
मृग अपने भीतर छिपी कस्तूरी की सुगंध में सारी सुधबुध खो देता
है। इस संगीत को दुनिया ने गले लगाया और भारतीय फिल्मों में और
टीवी चैनलों पर बेसुरे संगीतकारों ने इसे दफन कर दिया। यह
जुगाड़ू संगीतकार और गीतकार और उनके गाने वाले कहां से आ गए
हैं यही एक गाली मुंह से निकलती है। सचमुच आज गानों के नाम पर
जो तुक्केबाजी परोसी गई है उसके अंदर संगीत कम है और अश्लीलता
ज्यादा है। सारेगामापा की सात सुरों की धुनों तक ही आज किसी
प्रतियोगी गवइये का गला पहुंच ही नहीं पाता है। यह ताकत या तो
मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मन्नाडे, महेंद्र कपूर, लता मंगेशकर
या आशा
भोंसले के गले में ही देखी गईं हैं। क्या अब इन सात
सुरों का अंत हो गया है?
लता के
संगीत को उदाहरण बनाएं तो उन्होंने संगीत के हर दौर को अपने
सुर और सदाबहार गीतों से सजाया, परखा है। लता और उनके समकालीन
गायकों ने सुर साधना के साथ संगीत सुनने वालों के दिलों पर एक
छत्र राज किया है, और आज भी कर रहे हैं। इसलिए गायकी के बारे
में उनसे ज्यादा किसको समझ होगी? लेकिन आज के संगीत प्रतियोगी
आयोजक बड़ी बेशर्मी से ऐसे-ऐसे बेसुरों को स्टेज पर उतारते हैं
कि संगीत की खिल्ली उड़ने लगती है। इन दिनों देखा जा रहा है कि
कुछ प्रमुख संगीतकारों और परंपरागत गायकों ने ऐसी
प्रतियोगिताओं से अपने को दूर कर लिया है क्योंकि उनकी बाहर
मजाक उड़ने लगी थी और निर्णायक मंडल पर आयोजकों का यह दबाव
बढ़ने लगा था कि वह फला प्रतियोगी को कम नंबर दें और फला
प्रतियोगी को ज्यादा नंबर दें। इनमें अब ऐसे निर्णायक आ धमके
हैं कि जिनसे चाहे जो करा लीजिएगा। इसलिए इन प्रतियोगिताओं का
अब महत्व खत्म होता जा रहा है और इनके बारे में सुर संगीत
जानने वालों की धारणाएं बदलती जा रही हैं। देश के विभिन्न
शहरों में संगीत प्रतियोगी संस्थाएं चल रही हैं और नवोदित
कलाकारों का संगीत के नाम पर शोषण करने में लगी हैं। जो
प्रतियोगी स्टेज पर शो कर रहे हैं उन्हें वरिष्ठ कलाकारों के
इशारों पर नाचना पड़ रहा है और किसी को फिल्मों में गाने का
आफर भी तभी मिल रहा है जब वह उनके संगीत क्लबों के कार्यक्रमों
में गा बजा रहे हैं।
विभिन्न
टीवी चैनलों पर संगीत में अपना भविष्य खोजने वालों की बाढ़ सी
आई हुई है। ऐसी प्रतियोगिताओं में निर्णायकों का ध्यान गायन
क्षमता की बजाय मंच पर कलाकारों के प्रदर्शन पर लगा रहता है।
ये सभी प्रतियोगितायें प्रतिभा के आंकलन का सही जरिया है इस पर
भारी विवाद शुरू हो चुका है। टीवी चैनल गायकों में प्रतिभा
खोजने के लिए जो तरीके अपना रहे हैं उनसे यह साबित नहीं किया
जा सकता कि श्रेष्ठ गायक या गायिका वही है जिसे चैनल के
निर्णायक अपने सर्वाधिक नंबर दे रहे हैं या जिसके लिए श्रोताओं
का सबसे ज्यादा पोल हुआ है।
पिछले कुछ
समय में अच्छे कलाकार पर्याप्त पोल के अभाव में चैनलों की कई
संगीत प्रतियोगिताओं से बाहर हो गए। लता मंगेशकर तो संगीत की
वैज्ञानिक हैं मगर जो लोग थोड़ा भी संगीत जानते हैं वे भी इस
बात को मानते हैं कि कभी-कभी नहीं, बल्कि अब तो अक्सर ऐसे-ऐसे
बेसुरे प्रतियोगियों के नाम पर खड़े कर दिए जाते हैं कि मन
करता है कि टीवी के सामने अपना सर पटक लें। उनका संगीत न किसी
काबिल होता है और न उनमें प्रस्तुति का अंदाज। वे स्थापित गायक
या गायिका की नकल भी नहीं कर पाते। शुरू-शुरू में कुछ
प्रतिभायें चैनलों पर दिखाई पड़ीं लेकिन धीरे-धीरे यह होने लगा
है कि किसी को संगीत के नाम पर जबरदस्ती पेश किया जा रहा है।
फिल्मी दुनिया में ऐसा हो रहा है कि एक संगीत निर्देशक गायक या
गायिका से नाराजगी होने के कारण वह गाना किसी ऐसे गायक या
गायिका से गवा दिया गया जो उसके उपयुक्त ही नहीं था। इसका
खामियाजा संगीत ने भुगता जिसका असर फिल्मी दुनिया की गायकी पर
सीधा दिखाई पड़ा है।
फिल्मी
गायकी की दुनिया में गायक और गायिकाएं किसी भी गाने को किसी भी
तुक्के से गाने के लिए संगीतकारों के घर चक्कर लगाते घूम रहे
हैं। इन गायकों ने उच्चकोटि की गायकी का सबसे ज्यादा नुकसान
किया है। संगीत को रीमिक्स में बदलने वाले धंधेबाज इस दौर के
संगीत का जितना नुकसान कर रहे हैं वह पीड़ा लता मंगेशकर की
भावनाओं से प्रकट होती है। संगीत को तोड़-मरोड़कर जो प्रयोग
किये जा रहे हैं उनसे भारतीय संगीत की असली पहचान लुप्त होती
जा रही है। न तो गानों का कोई तारतम्य है और न संगीत की लय में
कोई जादू दिखाई पड़ता है। लता मंगेशकर न जिस गाने को भी उनमें
उन्होंने सुर और लय से संगीत को जीवंत बनाया। आज भी
रात्रिकालीन पुराने गानों में सबसे ज्यादा गाने लता मंगेशकर के
ही सुनाई पड़ते हैं। इसलिए आज गायक-गायिकाओं को लता जैसा वह
स्थान न तो मिल पाया है न ही मिल पाएगा जो लता मंगेशकर को उनके
सुर के दम पर हासिल हुआ है।
संगीत
प्रेमियों ने ऐसा भी संगीत का दौर देखा है जब देश के पहले
प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू लता के गाए देश भक्ति के
गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी’ पर रो दिए
थे। इस गीत की विशेषता यह थी कि जो पंक्तियां इसमें देश भक्ति
का भाव व्यक्त करती हैं लता का सुर भी वही भाव बिखेरता है। यह
ताल और संगम आज के गवैय्यों में दूर-दूर तक नजर नहीं आता।
टैलेंट हंट प्रतियोगिता में प्रतियोगियों को अपनी कला का
प्रदर्शन करते हुए कम देखा जा रहा है। उछलते हुए और थिरकते हुए
वह ज्यादा दिखते हैं। प्रतियोगी ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सा
लेने पर कहता है कि उसके जीवन का उद्देश्य पूरा हो चुका है। वह
अपने लक्ष्य को ऐसी प्रतियोगिताओं में ही पूरा होना मान ले रहा
है जबकि अन्य बड़े कलाकारों की सुर साधना देखिए वे आज भी कहते
हैं कि संगीत में संगीत की ऊंचाइयों को छूना अभी भी बाकी है।
आज भारतीय संगीत में पाश्चात्य संगीत की जो घुसपैठ हुई है उससे
अगर मुक्ति नहीं पाई गई तो हम न अपने संगीत को न याद रख
सकेंगे।
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