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टाइमपास अध्यापिकाएं
और भीख मांगते बच्चे
लखनऊ। टाइमपास टीचरों अवसादग्रस्त, तलाकशुदा महिलाओं और
अफसरों की बीवियों के हवाले हैं, उप्र की राजधानी लखनऊ के
अधिकांश नर्सरी और पब्लिक स्कूलों के बच्चे और शहरों की क्या
हालत होगी इसका अंदाजा लगाइए! ये वो स्कूल हैं जिनमें दाखिला
हासिल करने के लिए बड़ी सोर्स-सिफारिशों से अभिभावक अपने
बच्चों का दाखिला कराते हैं। इन स्कूलों के नाज़-ओ-नखरे इतने
बड़े हैं कि उनके चपरासी भी सीधे मुंह बात नहीं करते हैं। इन
स्कूलों की फीस आसमान छूती हैं। इन स्कूलों के सभी सांस्कृतिक
उत्सव, खेलकूद और सेमीनार के आयोजन भी एक शो की तरह से बड़े
बजट के होते हैं और वह भी अभिभावकों की जेब की कीमत पर।
यदि इन स्कूलों में पढ़ाने वाली अध्यापिकाओं का विवरण
मांग लिया जाए तो आप आश्चर्य चकित होंगे कि टीचरों के रूप में
इनमें घरेलू अवसाद ग्रस्त तलाकशुदा, अवकाश प्राप्त और अंशकालिक
रूप से काम करने वाली महिलाएं ज्यादा मिलेंगी। ऐसा भी देखा गया
है कि इन टीचरों को जिन खास विषयों के लिए रखा गया है उन
विषयों का भी उनमें उतना व्यावहारिक ज्ञान नहीं पाया गया है।
हद तो यह है कि हिंदी विषयों की अध्यापिका को अच्छी हिंदी नहीं
आती है। इंग्लिश ज्ञान को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखकर उसे
योग्यता का आधार मानने वाले इन स्कूलों में व्यावहारिक ज्ञान
की गिरावट भी इस कदर है कि बच्चे व्यावहारिक प्रश्नों का उत्तर
देने में बगलें झांकने लगते हैं। बच्चों के सामान्य व्यवहार
में भी चिड़चिड़ापन देखने को मिल रहा है और ऐसा प्रतीत होता है
कि वह पाश्चात्य संस्कृति की तरफ ज्यादा भाग रहे हैं अपनी
भारतीय संस्कृति को वह तुच्छ समझते हैं। इससे अनुमान लगाया जा
सकता है कि स्कूलों में पढ़ाई का स्तर कहां जा रहा है और बच्चे
कैसे वातावरण से गुजर रहे हैं।
लखनऊ हो या दिल्ली, चेन्नई हो या कलकत्ता सब जगह एक सी
कहानी सामने आ रही है। लखनऊ में बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा
पब्लिक स्कूल इस टाइमपास भयानक बीमारी से ग्रस्त है। एक सर्वे
में पाया गया है कि एक स्कूल में यदि बीस अध्यापिकाएं हैं तो
उनमें केवल पांच अध्यापिकाएं ही पेशेवर पाई गई हैं, बाकी
अध्यापिकाएं वो हैं जो केवल अपना दिन का ऊबाऊ समय पूरा करने के
लिए स्कूलों में पढ़ाने के नाम पर जाती हैं इनमें अधिकांश
राजधानी में तैनात अफसरों की बीवियां हैं और दूसरे नंबर पर वह
हैं जो कि तलाकशुदा हैं या घर की आर्थिक समस्याओं से परेशान
होकर पढ़ाने का काम कर रही हैं। स्कूलों को भी इन्हें ज्यादा
वेतन नहीं देना पड़ता है। इनमें अधिकांश अनुबंध पर हैं और उनका
स्कूल में कोई रिकार्ड भी नहीं होता है। तीसरा नंबर उनका है जो
सरकारी सेवा से अवकाश ले चुकी हैं और चाहे जितने वेतन में काम
करने को तैयार हैं। ऐसी ही स्थिति उपरोक्त दोनों श्रेणियों की
अध्यापिकाओं की भी है।
मजे की बात यह है कि अपनी समस्याओं से परेशान होकर
पढ़ाने वाली महिलाएं और पेशेवर अध्यापिकाओं से ज्यादा वेतन
अफसरों की वो बीवियां पाती हैं जो केवल लखनऊ में अपने पति की
तैनाती तक अपना टाइम पास करना चाहती हैं। इसका एक कारण यह है
कि स्कूलों का प्रबंधन ऐसी महिलाओं को नौकरी देने में इसलिए
सर्वोच्च प्राथमिकता देता है कि उनके पति उनके स्कूलों की शासन
और प्रशासन में फाइलों, शिकायतों और समस्याओं की देखभाल भी
करते हैं। बड़े शहरों के नर्सरी जैसे स्तर के स्कूलों में
टाइमपास अध्यापिकाओं का बोलबाला है और उनके सामने प्रबंधन को
भी झुकना पड़ता है क्योंकि पतिदेव से एक ही शिकायत पर उनकी
क्लास ली जा सकती है या स्कूल के खिलाफ जांच बैठाई जा सकती है।
निजी क्षेत्र के नामी स्कूलों में यह प्रवृत्ति इतनी आगे चली
गई है कि अब उन स्कूलों में योग्य टीचरों को नियुक्त करने की
स्थिति ही नहीं रह गई है। वैसे भी आज नौकरी पाने के लिए
योग्यता सबसे निम्न पैमाना बनती जा रही है।
स्कूलों में अध्यापिकाओं के एक प्रकार के व्यवहार के
कारण बच्चों को पीटने और उनकी उपेक्षा करने की शिकायतें भी
अधिकांश रूप से ऐसे ही अध्यापिकाओं के संपर्क में रहने वाले
बच्चों की ओर से ज्यादा आती हैं। ये अध्यापिकाएं अपनी कुंठाओं
को अवसाद स्वरूप बच्चों से व्यवहार करके उतारती है। तलाकशुदा
महिलाओं की ओर से इस प्रकार की शिकायतों की ज्यादा बात सामने
आती है, क्योंकि वह अपने घरेलू अवसाद को साथ लेकर चलती हैं और
स्कूल में बच्चों के पढ़ाई के दौरान और टीचरों के साथ आपसी
व्यवहार में यह अवसाद स्पष्ट रूप से झलकता है। इसी की छाया
अभिभावकों के साथ ऐसी अध्यापिकाओं की मीटिंग के रूप में सामने
आती है। अभिभावकों और इस प्रकार की महिलाओं के बीच बच्चों को
लेकर संवाद की एक अलग ही प्रकृति पाई गई है। ऐसी टीचरें अपने
अवसाद को किसी न किसी रूप में प्रकट करते हुए गलतियां कर जाती
हैं जो कि स्कूली बच्चों और अभिभावकों को गंभीर परिस्थितियों
में ले जाती हैं। लखनऊ में अधिकांशतः स्कूलों में यह समस्या
बहुत गंभीर बनी हुई है।
स्कूल प्रबंधन पूर्णकालिक टीचरों को रखने में अपने को
ज्यादा असहज महसूस करता है जबकि वह शौकियां टीचरों को रखने में
उसे कोई संकोच नहीं होता। ऐसी टीचर जिनकी पहुंच ऊपर तक हो की
योग्यता का भी उतना ध्यान नहीं रखा जाता है। प्रश्न यह है कि
ऐसी अवस्था में ऐसी महिलाएं अध्यापन जैसे गंभीर पेशे को
अंशकालिक रूप से क्या उतनी ही निष्ठा सजगता और योग्यता के साथ
अंजाम दे सकती हैं? अध्यापन एक वातावरण है। अध्यापक न स्त्री
है और न ही पुरुष। यह इन दोनों प्रतिरूपों में अपनी अलग-अलग
भूमिकाओं में अपने को प्रस्तुत करता है। अध्यापक कभी अवसाद में
नहीं रहता। अध्यापक को कभी गुस्सा नहीं आता। अध्यापक अनुशासन
की भाषा समझता है और वह उसे दूसरों को ढालने के लिए प्रेरित
करता है। अध्यापक का अनुशासन ही आदमी को मनुष्य बनाता है। एक
बच्चे के भीतर अगर संस्कारों को रोपित करने की जिम्मेदारी मां
की है तो अध्यापक की जिम्मेदारी उन संस्कारों के पोषण की होती
है। अध्यापक ने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए एक
शिक्षार्थी को एक जिम्मेदार पुरुष बनने की प्रेरणा दी है। यह
प्रेरणा केवल शिक्षक से मिल सकती है। शिक्षक के रूप में इस समय
स्कूल प्रबंधन ने जिस प्रकार के तत्वों को मान्यता दे दी है वह
बच्चों को वैसे संस्कार दे ही नहीं पा रहे हैं जो कि एक देश के
नागरिक को उसकी प्रारंभिक शिक्षा में मिलने चाहिए।
आज बच्चों के सामने अपनी ही मातृभाषा को सीखने का एक
भारी संकट है। बच्चे हिंदी, संस्कृत और गणित से दूर भाग रहे
हैं। हिंदी का संकट इन स्कूलों में जबर्दस्त व्याप्त है। हिंदी
की अध्यापिकाएं नहीं हैं और हिंदी के रूप में रोपित होने वाले
संस्कारों के जानने वाले भी बहुत कम रह गए हैं। क्या वो
अध्यापिकाएं जो केवल अपना टाइम पास करने के लिए प्रबंधकों ने
स्कूल में पढ़ाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य पर लगाई हुई हैं कौन से
संस्कार दे पाएंगी? इस प्रश्न से रूबरू होते हुए भी इन स्कूलों
में कोई भी अभिभावक ऐसी आवाजें नहीं उठा रहा है। नर्सरी
स्कूलों से स्कूल प्रबंधन, प्रिंसिपल की शिकायतें तभी बाहर आती
हैं जब अति हो जाती है। सामान्य शिकायतों को अभिभावक नजरंदाज
ही कर जाते हैं क्योंकि यह अभिभावकों की एक बड़ी मजबूरी है
जिसमें बच्चे का भविष्य सामने होता है। अभिभावकों के रूप में
कुछ संगठन जरूर अपनी दुकान चलाते हुए स्कूलों में बच्चों के
दाखिले की दलाली कर रहे हों।
आज पब्लिक स्कूलों में दाखिले के लिए अभिभावकों को
पुलिस का सहारा लेना होता है। पुलिस के कहने से इसलिए दाखिले
होते हैं कि आए दिन स्कूल प्रबंधन को अपने यहां की आंतरिक
समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले पुलिस की जरूरत होती है।
इसलिए बहुत से अभिभावक उन पुलिस अधिकारियों का सहारा लेते हैं
जो उन स्कूलों की समस्याओं से संबद्ध रहते हैं। लखनऊ के
कैथेड्रिल स्कूल में या लामार्टिनयर स्कूल में इलाके के पुलिस
इंस्पेक्टर की दाखिले के मामले में जितनी सुनी जाती है, उतनी
शायद मंत्री की न सुनी जाए। दून स्कूल में देहरादून के एसएसपी
की जितनी सुनी जाती होगी शायद उत्तरांचल के मुख्यमंत्री की
उतनी नहीं सुनी जाएगी।
लखनऊ के बड़े-बड़े स्कूलों में एक और भयानक कुरीति ने
जन्म ले लिया है। यह कुरीति बच्चों के संस्कारों पर विपरीत
प्रभाव डालती है। कुरीति यह है कि जब भी स्कूल में कोई
सांस्कृतिक मीट या अन्य कोई कार्यक्रम होता है या फिर किसी
प्राकृतिक आपदा में मदद करने के लिए कोई फंड एकत्र करने की
जरूरत होती है तो स्कूल के बच्चों के हाथ में एक लिस्ट दे दी
जाती है और उनसे कहा जाता है कि वह अपने घर जाकर अपने आस पड़ौस
से चंदा इकट्ठा करके लाएं। ऐसा लगता है कि कई स्कूल प्रबंधन
अभिभावकों से चंदा वसूली के लिए आपदा जैसे बहानो की प्रतीक्षा
में रहते हैं ताकि उन्हें बच्चों से भीख सी मंगवाकर धन एकत्र
करने का मौका मिले जिसे वे संबंधित कोष में जमा करके अपने
स्कूल की वाहवाही लूटते हैं। बच्चे घर आकर उन पर थोपे गए
लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपने मां-बाप पर दबाव बनाते हैं और
उस लिस्ट के साथ चंदा वसूली के लिए घर-घर भी जाते हैं। उनको
चंदा वसूली का वह लक्ष्य पूरा करना ही होता है जो उनकी क्लास
टीचर की तरफ से दिया जाता है। इस संबंध में अभिभावक क्लास टीचर
अथवा प्रिसिंपल या स्कूल प्रबंधन से शिकायत करते हुए भारी
संकोच करते हैं क्योंकि उन्हें आशंका होती है कि ऐसी शिकायत
करने पर कहीं उनके बच्चे के साथ भेदभाव न शुरू हो जाए। बच्चे
पर क्लास टीचर का मानसिक दबाव बहुत रहता है और बच्चे किसी भी
अवस्था में क्लास टीचर के आदेश की अवहेलना करने की स्थिति में
नहीं होते हैं।
पब्लिक स्कूलों की अधिकांश शिक्षिकाओं ने एक और धंधा
शुरू कर दिया है। वे छुट्टी के अवसर पर अपने क्लास के बच्चों
के घर जा धमकती हैं और उनके अभिभावकों को किसी बैंक के लिए
फिक्स डिपोजिट या किसी बीमा कम्पनी के लिए बीमा कराने के लिए
दबाव बनाती हैं। अभिभावकों को अपने बच्चे की शिक्षा को ध्यान
में रखते हुए इन अध्यापिकाओं के अनचाहे प्रस्ताव मानने पड़ते
हैं। कुछ बैंक और कुछ बीमा कंपनियों के लोग स्कूलों में भी
अभिभावकों के घर के पते और संपर्क नंबर मांगते हुए मिलते हैं
ऐसा लगता है इसमें भी स्कूल प्रबंधन कोई सांठ-गांठ किए हुए
हैं। अभिभावक अपने बच्चे से भीख मंगवाने की स्कूल की इस भयानक
प्रवृत्ति को खून के घूंट की तरह पीते हैं। कुछ अभिभावक ऐसे
हैं जो अपने बच्चों को दूसरों के घरों पर न भेजते हुए खुद अपनी
जेब से ही बच्चे पर थोपे गए फंड का वह लक्ष्य पूरा कर देते हैं
लेकिन जरूरी नहीं कि अन्य अभिभावक भी अपनी जेब से वह ‘दंड’
भरने की स्थिति में हों इसलिए उनके बच्चे दूसरों के घरों पर
चंदा मांगने जाते हैं जिससे उन्हें अन्य घरों पर असहज तानों का
सामना करना होता है। यह कोई एक स्कूल नहीं कर रहा है बल्कि यह
दुकान लगभग सभी स्कूलों में चल रही है। इन्हीं स्कूलों में
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खाद्य उत्पाद बेचने वालों का भी
गिरोह सक्रिय रहता है जिसकी साठगांठ स्कूल प्रबंधन से होती है।
टॉफी, चाकलेट और उनकी आड़ में स्कूल की सामग्री बेचने वाले
यहां मंडराते हुए एवं बच्चों को खरीदारी के लिए मजबूर करते
दिखाई देंगे और स्कूल की प्रिंसिपल और मालिक बच्चों को उन्हें
खरीदने के लिए प्रेरित करेंगे। लखनऊ के अग्रणी शिक्षा संस्थान
सिटी मांटेसरी स्कूल ने इस बात की भी चिंता नहीं की है कि उनके
स्कूलों में बच्चों को किसी राजनीतिक दल के पेंसिल बाक्स
बांटने का शिक्षा के वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
लखनऊ से बसपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने की
तैयारी कर रहे अखिलेश दास और बसपा अध्यक्ष मायावती के फोटो छपे
पेंसिल बाक्स बच्चों को बांटे गए हैं। इस प्रचार से अभिभावकों
में तीखी प्रतिक्रिया और काफी निराशा हुई है क्योंकि स्कूलों
में बच्चे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर पढ़ने जाते हैं। सीएमएस
स्कूल के मालिक जगदीश गांधी यूं तो अपने को दुनिया के अग्रिम
शिक्षा प्रबंधकों और शिक्षाविदों में गिनते हैं लेकिन उन्होंने
अपने स्कूल में ऐसे पेंसिल बाक्स बंटवाकर शैक्षणिक वातावरण को
सरेआम तार-तार किया है। स्कूल शिक्षा के मंदिर हैं जहां यह सब
होगा तो कैसे पढ़ाई होगी और हमारी नर्सरी आगे चलकर किस प्रकार
से विश्व प्रतियोगिता का सामना करेगी यह चिंता का विषय है।
निजी क्षेत्र के ये स्कूल व्यवसायिक उत्पाद और फाइनेंस
कंपनियों की आय का भी स्रोत बनते जा रहे हैं। स्कूल प्रबंधन
सेल्स कंपनियों और उनके प्रतिनिधियों को छात्रों की क्लास में
भी आने से नहीं रोकते हैं। स्कूल प्रबंधकों और सेल्स
प्रतिनिधियों बीच एक नया व्यवसायिक रिश्ता कायम हुआ है। अब
राजनीतिक दलों ने भी इस फार्मूले को आजमाया है।
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