राजवाड़ों की दुर्दशा पर प्रशासन की अनदेखी

  • हिमांशु जोशी

रतलाम (मध्‍य प्रदेश) रतलाम में राजमहल रणजीत विलास पैलेस आज सिर्फ कहने मात्र को राजमहल है मगर अब इसका नाम खंडहरों में शुमार हो रहा है। यह ऐतिहासिक धरोहर इतनी जर्जर स्थिति से गुजर रही है कि यहां कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। संबंधित अधिकारी इस राजमहल की बुरी हालत की चाहे किसी भी कारण से अनदेखी कर रहे हैं, लेकिन रतलाम वालों के लिए यह अच्छा नहीं हो रहा है। इसका जिम्मैदार किसे कहा जायेगा? राजमहल को किस तरह से होर्डिंग हाउस बना दिया गया है इसे विस्तार से बताने की जरूरत नहीं लगती। राजवाड़े के अंदर जमीनें बिक चुकी हैं। मकान, दुकान, शासकीय कार्यालय बन चुके हैं। तब भी इस राजवाड़े की सुध लेने वाले कहां है?
यहां पूछा जा रहा है कि कहां गए वो रतलाम की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले? राजवाड़ा तो रतलाम की एक पहचान पहचान बन चुका है जिससे यहां मकान, प्लाट काफी महंगे मिलते है। महाराजा सज्जन सिंह, लोकेन्द्र सिंह का राजवाड़ा आज दुर्दशा की चादर ओढ़े खड़ा है। उसको सहारा देने वाला कोई नहीं है। महाराजा रतन सिंह के वंश के आखिरी उत्तराधिकारी महाराज लोकेंद्र सिंह रहे। उनके बाद राजवंश की संपत्ति विवादों में चली गई है जिस पर आज तक भी फैसला नहीं हो पा रहा है। प्रशासन को ना शाही संपत्ति की चिन्ता है और नाही शाही राजवाड़े की।
वैभवता एवं गौरवशाली परंपरा का जीवंत प्रतीक कहलाती हैं हमारी ऐसी प्राचीन ऐतिहासिक इमारतें। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए शाही अंदाज गौरवशाली गाथाओं और स्थापत्य कला के अनूठे अंदाज की अनमोल धरोहर है यह महलवाड़ा है। सन् 1880 में निर्मित रणजीत विलास पैलेस रतलाम शहर की एकमात्र राजशाही धरोहर है। यह अपनी राजशाही शान औ शौकत और वैभवी अंदाज को अपने में संजोए हुए है। सहसा इस महल को देखकर उस रौबदार वफादार पहरी को कौन भूल सकता है? विशालकाय ऊंची-ऊंची पहरेदार दीवारें, भीमकाय स्तंभ कारीगरी एवं नक्काशी की बेजोड़ मिसाल द्वार, मेहराबें, चतुर्भुज सेना एवं राजशाही ठाट-बाट में जीवन जीने वाले लोग हमारे दिलो-दिमाग पर हमेशा से छाए हुए हैं।
समय बीतता जा रहा है, समय की गति के आगे भला कौन ठहर सकता है। यह प्राचीन वैभव भी धीरे-धीरे लुप्त होने लगा है। आज यह धरोहर सिर्फ कहने मात्र को राजमहल है। यह राजमहल संरक्षण के अभाव में जीर्ण-शीर्ण एवं जर्जर अवस्था को पहुंच चुका है। राजमहल अपनी गौरव गाथाओं से हमे याद दिलाता है कि समय बड़ा बलवान होता है। समय के प्रवाह में शनैः शनैः सब कुछ खत्म होने लगता है।
ऐसी स्थितियों में सबका कर्तव्य बन जाता है कि राजमहल के संरक्षण के लिए जन जागृति लाई जाए। यदि मप्र पुरातत्व विभाग की नज़रअंदाजी एवं कर्तव्य विमुखता और नगर प्रशासन की अनदेखी इसकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है तो उतना ही नगरवासियों का इस धरोहर के अस्तित्व एवं संरक्षण के प्रति उदासीन दृष्टिकोण। शहर का राजमहल आधुनिकता की चकाचौंध से स्वयं को महफूज नही रख पाया है। किसी समय जहां राजशाही दरबार लगा होता था, न्याय की आस लिए लोगों का जमावड़ा होता था, चतुर्भुज सेना की गर्जना होती थी, आज वहां बड़े-बड़े महल बन चुके हैं जिनकी कीमतों का अंदाजा लगाना बहुत ही मुश्किल है।