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राजस्थान में जनजातियों
के
नाम हैं शौर्य गाथाएं
जयपुर।
भारत
में राजस्थान पुरातन काल से
ही विभिन्न जातियों,
समुदायों, कला और संस्कृतियों से समृद्घ
रहा है। ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों से तो सभी भली-भांति परिचित हैं
ही परंतु शताब्दियों से जो विभिन्न जनजातियां
यहां निवास कर रही हैं,
उनके बारे में अधिकांश लोगों को बहुत कम जानकारी है। यह समय का
चक्र है कि किसी समय इनका वैभव भी अपनी पराकाष्ठा पर था। इनके
शौर्य की अनेक गाथाएं इतिहासकारों ने नहीं लिखीं। शिलालेखों और
ताम्रपत्रों के पन्नों में इनका उल्लेख यत्र-तत्र बिखरा पड़ा
है। राजस्थान की मीणा और भील जनजातियों को ही ले लीजिए। इतिहास
बोलता है कि राजपूतों के उदय से पहले सारे राजस्थान पर इन्हीं
लोगों का आधिपत्य था पर विजेता राजूपतों ने इनके इतिहास और
संस्कृति का बड़ी निर्ममता के साथ विनाश कर दिया। नतीजतन इनके
पुरातन गौरवपूर्ण इतिहास का बहुत कम अंश ही सुरक्षित रह पाया
है। मीणा जनजाति राजस्थान की प्राचीनतम जनजाति है। प्राचीन काल
में यही जाति मत्स्य जाति के नाम से जानी जाती थी। जिसका
प्रकीण उल्लेख ऋग्वेद, विभिन्न पुराण ग्रंथों बौद्ध और जैन
साहित्य में मिलता है। कालांतर में इसी प्रदेश के विभिन्न
भागों में विभिन्न नामों से संबोधित की जाती रही ये जनजाति
जैसे-मेद, मेव, मेर, मीणा, रावत आदि।
मीणा और भील जनजातियों की उत्पत्ति के बारे में अनेक
किवदंतियां प्रचलित है। उनमें से अधिकांश तो सर्वथा अविश्वसनीय
हैं। इतिहासकार रावत सारस्वत के अनुसार मीणा लोग सिंधु घाटी
सभ्यता के प्रोटां द्रविड़ लोग हैं, जिनका गणचिन्ह मछली था।
आर्य लोग इन्हें मीन शब्द के पर्याय मत्स्य से संबोधित करते
रहे, जबकि ये लोग स्वयं को मीना ही कहते रहे। पर्याप्त समय बीत
जाने पर वैदिक साहित्य में इन्हें आर्य मान लिया गया था। ये
लोग सीथियन, शक, क्षत्रप, हूण जाति के वंशज न होकर यहां के
आदिवासी ही माने जाते हैं, जो भले ही कभी पुरातन काल में बाहर
से आकर बसे हों। इतिहासकारों के अनुसार आर्यों तथा अन्य
जातियों के खदेड़े जाने पर ही ये सिंधु घाटी से हटकर अरावली
पर्वतमाला में आ बसे, जहां इनके गोत्र आज भी हैं। (मीणा
इतिहास, पृष्ठ 21) विभिन्न ग्रंथों में मीना शब्द की व्याख्या
इस प्रकार से की गयी है। मीनाति मन्युनीति मीन (अभियान
चिंतामणिकोष) अर्थात् दुष्टों को मारने वाली जाति को मीना कहते
हैं। मी बधे, त्रियाडम शब्दसेट, मीनाति, मीनीते, आसीत
आमास्तावतः मीनाः (अभियान चिंतामणि कोष) अर्थात अनार्थ दैत्यों
का वध करने वाली क्षत्रिय जाति को मीना कहते हैं। हिन मीना
पाणि केन मीनो, इति निपात्यते सिद्धांत कौमुदी अर्थात दुष्टों
को मार कर गौ-ब्राह्मण की रक्षा करने वाले वीर क्षत्रिय समाज
को मीना कहते हैं।
मीणा जनजाति राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात,
महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में भी पाई जाती है।
यह सुनिश्चित है कि अन्य प्रदेशों में बसे मीणा लोगों का मूल
निवास पहले राजस्थान ही था। यहीं से ये लोग अन्य प्रदेशों में
जाकर बसे हैं। मीणा जाति में 12 पाल, 32 तर्ड़ें और 5200 गोत्र
होना बताया जाता है, राजपूतों के आगमन से पहले राजस्थान की इस
धरती पर इन्हीं लोगों के छोटे-छोटे राज्य थे।
खोह पर चांदा गोत्रीय मीणों का राज्य था। इस राज्य के
अंतिम राजा आलनसिंह को उसी के धर्म भानजा दूल्हाराय कछावा ने
संवत 1023 में उस समय धोखे से मारकर उसका राज्य हस्तगत किया।
जब वह अपने सैनिकों और सामंतों सहित निःशस्त्र होकर तालाब के
पानी में घूसकर अपने पित्तरों का तर्पण कर रहे थे।माची का
सीहरा राज्य। इस राज्य पर सीहरा गोत्रीय मीणा राजा राव नाथ का
अधिकार था। इस राज्य को भी दूल्हाराय कछावा ने ही जीता। राव
नाथू का पुत्र मेंदा बड़ा पराक्रमी था। अतएव वह चुप नहीं बैठा
अन्त में दूल्हाराय कछावा माची के निकट रराव मेदा से युद्ध
करते हुए मारा गया। गेटोरघाटी और झोटवाड़ा का नॉडला राज्य। इन
दोनों राज्यों पर नॉढला गोत्रीय मीणों का अधिकार था। दूल्हाराय
कछावा की म़ृत्यु के पश्चात उसके पुत्र कांकिल ने इन दोनों
राज्यें को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।
आमेर का सूसावत राज्य। आमेर में सूसावत गोत्रीय मीणों
का राज्य था। आमेर अंतिम मीणा राजा शूरसिंह सूसावत से मैदलराव
कछावा ने यह राज्य छलकपट से जीता। मैदलराव न अम्बिकेश्वर
महादेव के दर्शनों के बहाने पालकियों में अपने सिपाही ले जाकर
आमेर में प्रवेश किया था। अवसर पाकर राजूपतों ने उनके स्वागत
के लिए आये शूरसिंह के पुत्र भानोराव और उसके अंगरक्षकों का
सिर धड़ से अलग कर दिए गए। फलस्वरूप चारों ओर भगदड़ मच गई,
जिसका लाभ उठाकर मैदन राव और उसके सैनिकों ने आमेर पर अपना
अधिकार लिया। आमेर ढूंढाड़ क्षेत्र के सब मीणा राज्यों के संघ
का प्रधान स्थान और भानोराव उस संघ का प्रमुख था।
रावत सारस्वत (मीणा इतिहास पृष्ठ संख्या 147) के अनुसार
दहाराय ने चांदा मीणों का भाजना बनकर और कांकिल ने सूसावत
मीणों के गोद बैठकर राज्यसत्ता हस्तगत की थी। इस प्रकार
ढूंढाड़ के मीणा राज्य कछावाओं को विजय स्वरूप न मिलकर समझौते
के रूप में मिले थे। यही कारण है कि कालाखोह के मीणों द्वारा
पैर के अंगूठे के रक्त से कछावा शासकों का राजतिलक करने का
रिवाज था। जो मेवाड़ के भीलों की तरह था तथा अब नहीं है।
(कर्नल डॉट कृत एनाल्स एंड एण्टीविवाटीज आफ राजस्थान जिल्द 2,
पृष्ठ संख्या 347) नहान का गोमलाडू राज्य। दौसा के निकट बांसखो
के आसपास गोमलाडू गोत्रीय मीणों का राज्य था। जिसे भारमल कछावा
ने जीतकर अपने राज्य में मिलाया था। इसी प्रकार देवबंद के
काटाराव मीणा का राज्य काकिल के समय, बैनाड के राव धूहड़ मीणा
का राज्य पज्जूणा कछावा के समय और ध्यावण का मीणा राज्य मलेसी
कछावा के समय जीते गए।
रणथम्भौर का टाटू राज्य
रणथम्भौर पर टाटू गोत्रीय मीणों का राज्य था। टाटू राजा
जुहारसिंह को सारंगदेव चौहान ने टाटू राजकुमारी से शादी करने
के बहाने सैनिकों सहित रणथम्भौर किले में घुसकर धोखे से परास्त
किया था।
बूंदी का उधारा राज्य
बूंदी का उषारा गोत्रीय मीणों का राज्य था। सूसावत
मीणों से पहले आमेर पर इन्हीं उषारा गोत्रीय का राज्य था। ये
लोग बूंदी कब और कैसे आये, इसका कुछ पता नहीं चलता। यहां के
मीणा राजा जेता को देवा चौहान ने राजपूत कन्या ब्याहने के
बहाने बुलाया और उसे तथा उसके बरातियों को खूब शराब पिलाकर
बहुसंख्यक मीणों का नरसंहार करके उसका राज्य छीन लिया।
डॉ
मथुरालाल शर्मा ने इस संदर्भ में लिखा है कि धोखा देना ही शायद
रापूतों की युद्ध नीति रही थी, क्योंकि भीलों से कोटा और मीणों
से सिरोही के राज्य भी इन्होंने इसी प्रकार लिए थे। (कोटा
राज्य का इतिहास जिल्द 1 पृष्ठ संख्या 58)
गोडवाड़ के मीणा राज्य
पीला और सिरोही जिलों का क्षेत्र गोडवाड़ कहलाता है।
कभी इस इलाके के दूसरी व नाडौल पर गौड गोत्रीय मीणों का
अधिपत्य था। मेवाड़ के महाराणा रायमल के पुत्र पृथ्वीराज ने इन
पर आक्रमण कर अपना कब्जा जमाया था।
खैराड़ का मीणा राज्य
बनास नदी के दोनों ओर के प्रदेश को खौराड़ कहते हैं। इस
प्रदेश में कभी बरड़ गोत्रीय मीणों का राज्य था। जिसकी राजधानी
गोरमगढ़ थी। इस राज्य को महाराणा प्रताप के भाई जगमल ने मीणों
से छीना था।
भील जनजाति राजस्थान की दूसरी प्रमुख प्राचीन जनजाति
है। जिस प्रकार उत्तरी राजस्थान में राजपूतों के उदय से पहले
मीणों के राज्य रहे, उसी प्रकार दक्षिणी राजस्थान और हाड़ौती
प्रदेश में भीलों के अनेक छोटे-छोटे राज्य रहे है। प्राचीन
संस्कृत साहित्य में भील शब्द लगभग सभी बनवासी जातियों जैसे
निषाद, शबर आदि के लिए समानार्थी रूप से प्रयुक्त हुआ है। इस
प्रकार भील संज्ञा प्राचीन संस्कृति साहित्य में उस वर्ग विशेष
के लिए प्रयुक्त की जाती थी जो धनुष-बाण से शिकार करके अपना
पेट-पालन करते थे यह देखा गया है कि इस स्थिति को परवर्ती
साहित्य में भी लगभग ज्यों का त्यों बरकरार रखा गया। मेवाड़
बागड़ और गोवाड़ प्रदेश में चार विभिन्न जनजातियां मीणा, भील,
डामोर और गिरीसिया निवास करती है पर पत्रकार और लेखक इन चारों
के लिए केवल भील संज्ञा ही प्रयुक्त करते हैं। आज भी सामान्यतः
लोगों की यही धारणा है कि उपरोक्त समूचे प्रदेश में केवल भील
जनजाति ही निवासी करती है।
विद्वानों के अनुसार भील शब्द की उत्पत्ति द्रविड़
शब्द ‘बील’ से हुई है जिसका अर्थ है धनुष। धनुष-बाण भीलों का
मुख्य शस्त्र था अतएव ये लोग भील कहलाने लगे। एक दूसरे मत के
अनुसार भील भारत की प्राचीनतम जनजाति है। इसकी गणना पुरातन काल
में राजवंशों में की जाती थी। जो विहिल नाम से जाना जाता था।
इस वंश का शासन पहाड़ी इलाकों में था। आज भी ये लोग मुख्यतः
पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। इस संदर्भ में एक कहावत भी
प्रचलित है कि संसार में केवल साढ़े तीन राजा ही प्रसिद्ध है
इन्द्र राजा, राजा और भील राजा तथा आधे में बींद (दूल्हा
राजा)। मेवाड़ की स्थापना के बाद से ही मेवाड़ के महाराणाओं को
भील जनजातियों को निरंतर सहयोग मिलता रहा। महाराणा
प्रताप इन्हीं लोगों के सहयोग से वर्षों तक मुगल फौजों से लोहा
लेते रहे थे। यही कारण है कि उनकी सेवाओं के सम्मान-स्वरूप
मेवाड़ के राज्य चिन्ह में एक ओर राजपूत और दूसरी ओर भील
दर्शाया जाता था। आमेर के कछावा राजाओं की भांति मेवाड़ के
महाराणा भी भीलों के हाथ के अंगूठे के रक्त से अपना राजतिलक
करवाते रहे थे। भील जनजाति राजस्थान के सब जिलों में न्यूनाधिक
रूप से पाई जाती है। पर राजस्थान के दक्षिणांचल में इनका भारी
जमाव है।
भील जनजाति राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश गुजरात और
महाराष्ट्र में भी पाई जाती है। राजपूतों के उदय से पहले
राजस्थान की धरती पर निम्न क्षेत्रों में भीलों के राज्य रहे
हैं।
डूंगरपुर
डूंगरपुर राज्य पर पहले डंगरिया मेर का अधिकार था जिसे
चित्तौड़ के महाराजा रतन सिंह के पुत्र माहप ने धोखे से माकर
उसका राज्य छीना, ऐसा कवि राजा श्यामलदास ने अपने ग्रंथ वीर
विनाद में लिखा है।
बांसवाड़ा
बांसवाड़ा राज्य पर पहले बांसिया भील का अधिपत्य था।
डूंगरपुर के महारावल उदयसिंह के द्वितीय पुत्र जगमल ने इस
राज्य को जीता और अपने अधिकार में लिया।
कुशलगढ़
कुशलगढ़ पर कटारा गोत्रीय कुशला भील का अधिकार था।
अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र में मिणाय ठिकाना भी पहले मांदलियां
भीलों के अधिकार में था। जिनका बनाया किला आज भी मौजूद है और
गढ़ मांदलिया के नाम से प्रसिद्ध है। ईडर गुजरात में सोढ़ा
गोत्र के सावलिया भील का राज्य था, जिसे हराकर राठौड़ों ने
वहां अपनाप राज्य स्थापित किया, मेवाड़ में स्थित जवास जगरगढ़
पर भी भीलों का शासन था। जिसे चॉपनेर के खींचा राजाओं ने जीता
जगरगढ़ को जोगरराज भील ने बसया था। मेवाड़ और मलवे के बीच का
भू-भाग आमद कहलाता है। इस क्षेत्र के दो बड़े कस्बो रामपुरा और
भानपुरा पर रामा और भाना नामक भीलों का अधिकार था जिन्हें
परास्त करके सिसोदिया शाखा के वंशधर चंद्रावतों ने अपना अधिकार
जमाया।
कांठला प्रदेश
कांठला प्रदेश देवलिया प्रतापगढ़ पर पहले मीणों का
राज्य था। संवतः 1617 में बीका सिसोदिया ने वहां के सरदार
भाभरिया मेर को मारकर उसके राज्य पर अपना अधिकार किया था
भाभरिया मेर की पत्नी देउमीणी की चोटी आज भी प्रतापगढ़ के
पहलों में मौजूद है, जिसकी हर साल नवरात्रि के अवसर पर
धूमधाम से पूजा की जाती है। (वीर विनोद कविराजा श्यामलदास) इस
संदर्भ में यहां यह जोड़ देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि जयसमंद
उदयपुर जिला से लेकर ठेठ प्रतापगढ़ चितौड़गढ़ जिला तक के
क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी सदियों से स्वयं को मीणा
कहते-कहलाते आ रहे हैं। ये लोग अपने सर नेम के लिए भी बहुधा
मीणा या रावत शब्द प्रयुक्त करते हैं।
कोटा
कोटा पर शताब्दियों तक भीलों का शासन रहा। कोटा के पास
आसलपुर की ध्वस्त नगरी तथा अकेलगढ़ का पुराना किला भीलों के ही
थे। वहां के भील सरदार की उपाधि कोटिया थी। सन 1274 में बूंदी
के तत्कालीन शासक समर सिंह के पुत्र जेतसिंह ने कोटिया भील को
युद्ध में मार डाला और कोटा में हाड़ा वंश के शासन की जींव
डाली। पुरानी परंपरा के अनुसार जेतसिंह ने कोटिया भील के नाम
पर अपनी राजधानी का नाम कोटा रखा।
मनोहर थाना
झालावाड़ जिले के मनोहर थाना के आसपास के इलाके पर
संवत् 1675 तक भील राजा चक्रसेन का राज्य था। कोटा के महाराव
भीम सिंह ने राजा चक्रसेन को हराकर उसके राज्य पर अपना अधिकार
कर लिया। कोटा राज्य का इतिहास (डॉ मथुरालाल शर्मा पृष्ठ
संख्या 300) मीणा और भील जनजातियों में अनेक फिर्को या
उपजातियां है। हर फिर्को अपनी जातिया के नाम के पहले एक खास
विशेषण लगाकर अपना अलग अस्तित्व कायम रखे हुए हैं। जैसे
पढि़यारमीना, पचवारा मीना, मालवीभील मांदलिया आदि-आदि।
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