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ये है मुंबई नगरिया
अब तू देख बबुआ!
मुंबई। भारत की व्यवसायिक जीवन रेखा कही जाने वाली
मुंबई में दरार आ गई है। इसके तटों पर फैला और लहराता हुआ अनंत
समुद्र भी इस मायानगरी की गहराई को कभी नहीं नाप सका, और न उसे
कभी हिला सका, मगरउसे महाराष्ट्र के कुछ विघटनकारी
मराठावादियों ने जरूर हिला दिया है। इक्कीसवीं सदी में
मराठियों का यह भ्रम भी टूटता जा रहा है कि केवल मुंबई से ही
देश चल रहा है। छत्रपति शिवाजी ने मराठवाड़ा को गौरव दिया था
कि उसकी धरती पर दुनिया अपने सपने खोजने आती रहेगी लेकिन यहां
के ठाकरे बंधुओं और उनकी बिजनेस मंडली ने क्या किया? पहले
मुंबई का कील-कांटा बेच डाला, फिर उसे हिंदुओं के नाम पर
सांप्रदायिकता की आग में जलाया और अब मराठवाड़ा के लंबरदार
बनकर उसके नाम पर गैर मराठियों पर जुल्म कर उनकी हत्याएं करा
रहे हैं, उन्हें महाराष्ट्र से निकाल रहे हैं। देश के सभी
रंगों से मिलकर बनी मायानगरी अब कुछ ही की नगरी के रूप में
सिमटती जा रही है। सरकार की छत्रछाया में हाजी मस्तान, दाऊद
इब्राहिम,
अबू सलेम, कुत्ता, काना, दारूवाला, ताड़ीवाला जैसे नाम मुंबई
की धरती पर ही फल-फूल रहे हैं। राहुल राज गोली से उड़ाए जा रहे
हैं और सूर्यदेव राजनीतिक माफियाओं के पेशेवर गुंडों के
सामुहिक हमले में मारे जा रहे हैं। यहां की धरती से जो विघटन
का तूफान उठा है मुंबई उसमें तबाह हो रही है और पूरा देश उसकी
चपेट में आ रहा है।
मुंबई में बैठकर उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा और
आगजनी करा रहे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गुंडे राजठाकरे को
भी अगर किसी राज्य में पुलिस पटना के राहुल राज की तरह से गोली
से उड़ाती तो शायद उसका भी कोई समर्थन नहीं करता। यह तो पटना
का एक बेरोजगार बालक था जो उत्तर भारतीयों और बिहार के खिलाफ
आग उगल रहे राज ठाकरे को चुनौती दे रहा था कि वह उत्तर
भारतीयों का विरोध करने की हिंसात्मक हरकतों से बाज आएं।
महाराष्ट्र पुलिस जिस राहुल राज को बुलेट प्रूफ जैकेट पहने हुए
बता रही है क्या वह एक देसी कट्टे से राज ठाकरे को मारने आएगा?
उस दिन बस पर कब्जा करके कंडक्टर को बंधक बनाकर अपहरण की सनसनी
फैलाना तो उसका एक प्रतिकात्मक विरोध दिखाई दे रहा था, जिसका
देश भर में संदेश देकर वह सफल हो गया। उसके बाद उसे मुंबई
पुलिस के सामने समर्पण कर देना था। लेकिन पुलिस ने उसे समर्पण
का कोई मौका ही नहीं दिया और महाराष्ट्र के गृहमंत्री आरआर
पाटिल से हरी झंडी मिलते ही राहुल राज पर गोलियां बरसा दी गईं
क्योंकि स्वयं महाराष्ट्र के गृहमंत्री आरआर पाटिल ने बाद में
कहा कि वे गोली का जवाब गोली से देते हैं। फॉरेंसिक रिपोर्ट भी
आ गई है जिसमें साबित है कि उसे अत्यंत नजदीक से गोलियां मारी
गईं जिससे साबित होता है कि यह मुठभेड़ नहीं बल्कि सीधे-सीधे
हत्या थी। जबकि देश के कानून का कहना है कि गोली का जवाब केवल
कानून से दिया जाए न कि गोली से।
अगर ऐसा शुरू हो गया तो देश की विधि व्यवस्था न केवल
छिन्न भिन्न हो जाएगी अपितु पूरा देश गृह युद्ध में चला जाएगा।
उस नासमझ लड़के ने अपनी बात कहने के लिए अगर कानून का उल्लंघन
किया था तो उसको कमांडो कार्रवाई से काबू किया जा सकता था।
आखिर सरकार करोड़ों रुपये ऐसी कार्रवाईयों का मुकाबला करने के
लिए ही तो कमांडो प्रशिक्षण पर खर्च करती है। किसी को काबू में
करने के लिए पुलिस के पास बहुत सारे विकल्प होते हैं। राहुल
राज के पास गोलियों की कोई झोली भी नहीं थी जिससे वह पल भर में
अगली फायरिंग करता क्योंकि उसके कट्टे से एक बार में एक ही
गोली चल सकती थी जिससे कि पुलिस के पास उसे काबू में करने के
लिए पर्याप्त अवसर था। चूंकि राहुल राज को गोली से उड़ाने का
फैसला हो चुका था इसलिए उसे गोली से उड़ा दिया गया। उसकी गोली
से मौत के साथ ही यह सच्चाई हमेशा के लिए दफन हो गई कि वास्तव
में उसके पीछे अपना दिमाग था या उसको किसी ने ऐसी सनसनी फैलाने
के लिए उकसाया था। इस घटना क्रम में महाराष्ट्र की पुलिस ने
विधि व्यवस्था की सरेआम धज्जिया उड़ाई हैं इसलिए यदि कानून के
विरूद्घ एक अपराध राहुल राज ने किया तो दूसरा अपराध महाराष्ट्र
की पुलिस ने किया-एनकाउंटर के नाम पर उसकी हत्या करके।
भारतीय पुलिस या मुंबई पुलिस को यह पूरी तरह से अहसास
होना चाहिए कि अगर उसकी किसी ऐसी निर्मम कार्रवाई का भारतीय
कानून और उसके लागू करने वाली सरकार अनदेखी करते हुए संज्ञान
नहीं ले रही है तो संयुक्त राष्ट्र संघ की एक दृष्टि भी उसको
देख रही है और संयुक्त राष्ट्र की एक मामूली कार्रवाई भारत को
संयुक्त राष्ट्र के कक्ष में आने से रोक सकती है जहां भारत को
न केवल दुनिया से अलग-थलग हो जाना होगा वहीं भारत उन समस्त
सुविधाओं से उसी प्रकार दोचार होता नजर आएगा जिस प्रकार एक
न्यूक्लियर टेस्ट करने पर भारत ने वर्षों तक प्रतिबंध झेले
हैं। मानव अधिकार के मामले में संयुक्त राष्ट्र का अपना कानून
है और वह पहले से ही भारत के कश्मीर राज्य में मानव अधिकारों
के हनन पर अपनी नकारात्मक टिप्पणी दे चुका है।
महाराष्ट्र तो फिर भी एक शांत राज्य है जहां पर किसी को
भी देखते ही गोली मारने का आदेश लागू नहीं है फिर भी पुलिस ने
राहुल राज पर इस कानून का बेजा इस्तेमाल किया जिसे पूरी दुनिया
ने इलेक्ट्रानिक चैनल के माध्यम से सीधे प्रसारण के रूप में
देखा जिसकी पुष्टि के लिए ऐसे सबूतों की भरमार है और साबित हो
रहा है कि एक युवक इशारों से कुछ बोल रहा है और वह मांग कर रहा
है कि उसे मोबाइल दिया जाए, उससे किसी को कोई खतरा नहीं होना
चाहिए, वह मुंबई पुलिस कमिश्नर से मिलना चाहता है, वह पूछना
चाहता है कि रेलवे के एक छात्र की मनसे के कार्यकर्ताओं ने
निर्मम हत्या क्यों की? उत्तर भारतीयों के खिलाफ राजठाकरे
क्यों हमले करवा रहे हैं?
लेकिन पुलिस ने या किसी ने भी उसकी ओर ध्यान नहीं दिया
और सारे विकल्प पीछे छोड़ते हुए उसके सर व पेट पर गोलियां धंसा
दी गईं जिसके बाद उस बस के बाहर पुलिस अपनी इस सफलता पर नृत्य
कर रही है। पुलिस के जांबाज अधिकारी इसे इनकाउंटर बताकर अपनी
तारीफों के पुल बांध रहे हैं। मुंबई के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर
सदानंद दाते प्रेस कांफ्रेंस करके पुलिस की प्रशंसा कर रहे हैं
और मीडिया को यह भी समझा रहे हैं उसे किस प्रकार के सवाल पूछने
चाहिए। यह निर्लज्ज पुलिस अधिकारी शायद भूल गया कि जिसे वह
इनकाउंटर बता रहा है उसे पूरी दुनिया हत्या बता रही है। इसलिए
पहला मुकदमा इस अफसर के खिलाफ दर्ज होना चाहिए और राज्य के
मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख राज्य के विधि व्यवस्था का प्रमुख
होने के नाते यह जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए उन शिवाजी को
कलंकित होने से बचाएं जिनकी तलवार ने भारत के खिलाफ आंख उठाकर
देखने वालों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया था।
शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को डूब मरना चाहिए कि वह
हिंदू हितों की बात करते हुए अपने ही देश के किसी बालक पर
पुलिस की गोली चलने से उसकी मौत पर अपने सामना अखबार में यह
छाप रहे हैं कि राहुल एक ‘बिहारी माफिया’ था, जिसको कि मुंबई
पुलिस ने मार गिराया। मीडिया का अपने हितों के लिए बेजा
इस्तेमाल करने वाले बाल ठाकरे को एक माफिया महाप्रभु की तरह से
ही देखा जा सकता है न कि उसे समाज के शुभचिंतक के रूप में देखा
जाए। बाल ठाकरे का सामना कह रहा है कि पुलिस ने राहुल राज को
मार गिराकर ठीक किया, मुंबई में किसी को आतंक फैलाने की इजाजत
नहीं दी जा सकती है तो इतने दिनों से राज ठाकरे जो मुंबई में
करता आ रहा है वह क्या है? वह कौन सी शांति का मार्ग है कौन
नहीं जानता कि ये अहंकारी लफंगे दिन के उजाले में कुछ और हैं
और रात के अंधेरे में कुछ और। मराठवाड़ा के नाम पर इनके छिपे
हुए कृत्यों पर राहुल राज ने पर्दा उठा दिया है और राहुल राज
ने एक वो मशाल जला दी है कि जिसमें महाराष्ट्र और मराठवाड़ा को
हमेशा हमेशा के लिए सफाई देनी होगी कि उनका फिर शिवाजी के बारे
में क्या कहना है जिन्होंने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की रक्षा
के लिए अपनी तलवार को उठाया था।
मुंबई में पुलिस ने बहादुरी से काम किया यह सामना के
संपादक संजय राउत बोल रहे हैं? और अपने न्यूज पेपर की हैडिंग
का समर्थन करते हैं? और दूसरी तरफ बोलते हैं कि उन्होंने राहुल
को माफिया कभी नहीं कहा? कहा कैसे नहीं? ‘मुख उजले मन काले’ के
रूप में विख्यात मुंबई के ये चेहरे पूरी दुनिया के सामने लाख
सफाई दें लेकिन महाराष्ट्र में इन्होंने सभी तरह के भ्रष्टाचार
और सांप्रदायिकता की जो आग लगाई हुई है उसी की प्रतिक्रिया में
दिसंबर १९९२ में मुंबई में श्रृंखलाबद्घ बम ब्लास्ट की
महाभयानक घटना हुई थी, जिसमें देश की आर्थिक नगरी मुंबई धू-धू
कर जलने लगी थी और लोगों की जानें गईं थीं। सच पूछिए तो
महाराष्ट्र के इस बवाल की जांच रिपोर्ट चाहे जो भी हो मगर यह
शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और दाऊद इब्राहिम का झगड़ा मुंबई की
अकूत दौलत को कब्जाने को लेकर शुरू हुआ झगड़ा था, जिसको बाद
में बाल ठाकरे ने हिंदूईज्म से जोड़ दिया और महाराष्ट्र के
शिवसेना के गुंडों और दाऊद इब्राहिम के वर्चस्व को लेकर यह
झगड़ा मुंबई ब्लास्ट के रूप में बदला। बाल ठाकरे ने अपने
माफियाओं की इस आर्थिक लड़ाई को पैतरा बदलते हुए तुरंत हिंदुओं
की लड़ाई बना दिया। बाद में महाप्रभु बनकर सिंहासन पर जा बैठे
और वहां से राजनीति, समाज और विभिन्न मामलों पर फतवे देते हुए
सिद्घपुरूष कहलाने लगे।
यहां कानून की आंखें बंद नज़र आईं जो यह नही देख सका कि
यह सिद्घपुरूष किसी धर्म, जाति, प्रदेश या देश की लड़ाई नहीं
लड़ रहा बल्कि यह महाराष्ट्र की सत्ता पर कब्जा बनाए रखने के
लिए रोज़ नए अवतार लेता है, यही काम राजठाकरे ने शुरू किया है।
नहीं तो मुंबई में हिंदू-मुसलमान-मराठी और अन्य भाषा-भाषाई
साथ-साथ रहते आए हैं। एक बाल ठाकरे ही हिंदुओं के अवतार हुए
हैं? वह एक बच्चे को मुंबई पुलिस की गोली से मरता हुआ देखकर
उसे पुलिस की बहादुरी कह रहे हैं? महाराष्ट्र के भूतपूर्व
मुख्यमंत्री मनोहर जोशी हिंदुओं के नाम पर महाराष्ट्र के
मुख्यमंत्री हुए और आज कह रहे हैं कि वह हिंदू बाद में है
मराठी पहले हैं? तुम्हारे यह विकृत रूप इस देश को समय-समय पर
सांप्रदायिकता और अराजकता की आग में झोंकते हुए आ रहे हैं।
तुम्हारा यह छद्म हिंदुस्तानी एजेंडा पूरे भारत को तबाह कर
देगा क्योंकि ऐसी घटनाएं ही गृहयुद्ध का बीज बनती हैं। कहां एक
देश को अक्षुण रखने की प्रतिबद्धता और कहां केवल मराठा के नाम
पर क्षेत्रवाद का यह विस्फोट। बाल ठाकरे बताएं कि इनमें से
आपका कौन सा रूप है? कल यदि सारे राज्य इस आवाज के साथ हिंसा
पर उतारू हो गए कि बंगाल में हिंदीभाषी नहीं आएंगे आसाम में
मुंबई वाले नहीं आएंगे उत्तराखंड में गुजराती नहीं जाएंगे और
शेष भारत में मुंबई वाला नहीं घुस पाएगा तब आप कहां जाएंगे?
क्योंकि महाराष्ट्र की भौगोलिक सीमाएं भी ऐसी नहीं है कि आप
मराठा देश बना सकें।
राज ठाकरे मानता है और समझता है कि बाल ठाकरे अब कुछ ही
समय का मेहमान हैं क्योंकि अब उनका शरीर भी यह संकेत दे रहा है
कि किसी भी समय इनका राम नाम सत्य हो सकता है उद्धव ठाकरे की
कोई मजबूत भूमिका नजर नहीं आती है, ऐसे में शिवसेना पर कौन राज
करेगा? इसलिए राज ठाकरे ने मनसे के जरिए और कांग्रेस के
आर्शीवाद से अपना रास्ता तैयार कर लिया है जिसमें कि फिलहाल
महाराष्ट्र के माथे पर यह एक बड़ा कलंक लग चुका है कि उसकी
धरती पर वहां की पुलिस ने एक साजिश जैसी स्थिति बनाकर किसी
बेकसूर की जान ली है। याद रखें कि इसकी प्रतिक्रिया से
महाराष्ट्र बच नहीं पाएगा।
राहुल राज मुंबई जाकर एक नया किरदार बनकर उभरा है और
सूर्यदेव उसकी प्रतिक्रिया की भेंट चढ़ते हुए देखा गया है।
वीरता के प्रतीक शेरों और टाइगरों के बुतो के साथ अपने फोटों
खिचवाने वाले इन सियारों ने कभी असली शेरों और टाइगरों के साथ
खड़े होने की हिम्मत की है? जो अब दुनिया को नया महाराष्ट्र
दिखा रहे हैं, निर्माण की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं और इसे
दुनिया से अलग-थलग करने की साजिशों पर साजिश रच रहे हैं।
महाराष्ट्र की सत्ता पर कब्जा करने के लिए और भी लोकतांत्रिक
तरीके हो सकते हैं जो अब इनके पास नहीं बचें हैं। इनकी
राजनीतिक रणनीतियों में अब कोई दम ही नहीं रहा है। अब
महाराष्ट्र की सत्ता को अपने हाथ में लेने के लिए या तो यह
किसी ब्लास्ट का सहारा लेते हैं या विघटन का या किसी बहुत बड़े
घोटाले का। ये कभी फिल्मी हस्तियों के खिलाफ आग उगलते हैं तो
कभी उनके बगल में जाकर बैठते हैं। इनके एजेंडे अब इतने खतरनाक
हो चले हैं कि उनमें से राजनीति का तो जनाजा ही उठ गया है। राज
ठाकरे को कांग्रेस ने खड़ा किया है ताकि वह मराठवाड़ा के वोटों
का इसी तरह से दोहन कर सके, इसीलिए महाराष्ट्र की बेशर्म
कांग्रेस हाल की घटनाओं को डकार कर बैठ गई है और उसने राज
ठाकरे और उसके गुंडों को खुली छूट दे दी है। बाल ठाकरे की भी
मजबूरी है कि वह मराठियों को अपने साथ रखने के लिए इस घटना पर
आंख मूंद कर बैठें क्योंकि लोकसभा चुनाव सर पर है और अब
शिवसेना में वह दम नहीं रहा है कि उसके महाप्रभु बाल ठाकरे उसे
फिर से महाराष्ट्र की सत्ता दिला पाएं इसलिए वह भी बीच-बीच में
राज ठाकरे के सुर में बोल रहे हैं और सामना में अनाप-शनाप
लिखकर मराठियों को भरमा रहे हैं।
अब राज ठाकरे हों या बाल ठाकरे इनको आने वाले चुनाव में
अपनी औकात पता चल जाएगी कि विघटन में शक्ति है या एकता में
शक्ति, देश में शक्ति है या क्षेत्रवाद में शक्ति है, शांति
में शक्ति है या लोगों की हत्याओं में शक्ति है। पटना का राहुल
राज हो या उत्तर प्रदेश गोरखपुर का सूर्यदेव। यह दोनों बाल और
राज जैसी विघटनकारी शक्तियों को नेस्तनाबूद करने के लिए काफी
हैं।
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