हे
पुण्यात्मा! हम तुम्हें शाष्टांग नमन करते हैं। तीनों
लोकों में तुम जहां भी और जिस रूप में भी हो, हमारी तिलांजलि
आप तक पहुंचे और आप तृप्त और प्रसन्न हों। अपने पूर्वजों की
आत्मा की शांति के लिए गंगा में खड़े होकर लाखों लोग रोज ऐसे
ही अपने पितरों को तृप्त करते हैं। कहते हैं कि जो ‘गयाजी’ हो
आए उन्हें मोक्ष मिल गया, उस पर भी अकेले नहीं बल्कि अपने सभी
पितरों के साथ। दुनिया में हिंदू धर्मावलंबियों के लिए गयाजी,
अकेले मोक्ष स्थली के रूप में विख्यात है।
प्राचीन काल से नदियों के किनारे
बसे नगर, किले और इस पर भी अगर वहां पहाडि़यां हों, और वो भी
वनों से घिरी हों तो उसका महत्व विहंगम एवं द्विगुणित हो जाता
है। पहाड़ और राजमार्ग की संधि पर जन्में ऐसे नगरों की अपनी
विशेषताएं होती हैं जो उनकी प्रगतिशीलता की कारक होती हैं। ऐसे
नगर नए जमाने के अनुसार बदलते भी रहते हैं। किंतु गयाजी ही एक
ऐसा घर्मनगर है जिसे पुरातन काल से श्रद्धा भाव के कारण
‘गयाजी’ कहते चले आ रहे हैं। भारत वर्ष के गौरवमयी प्राचीन मगध
क्षेत्र के हृदय भाग में बसा यह नगर इतिहास, धर्म, संस्कृति,
पुरातत्व जनचेतना के मामले में प्रारंभ से ही अग्रणी रहा है।
इस क्षेत्र के कौतुहलपूर्ण इतिहास को हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख
और इस्लाम के संत फकीरों ने विभिन्न मौकों पर उजागर किया है।
पटना से करीब 92 किलोमीटर की दूरी पर और अंतः सलिला फल्गु के
किनारे बसे गयाजी का धर्म और इतिहास के पन्नों पर बड़ा ही नाम
है।
यहां प्राचीनकाल से ही सभी धर्मों
के लोगों के उपासना स्थल का होना, यहां की सहिष्णुता का
साक्षात् प्रमाण है, तभी तो इसे चार धामों की मान्यता के साथ
पांचवा धाम कहा जाता है। हरेक साल 15 दिनों के लिए होने वाला
पितृपक्ष का मेला इस नगर की एक विशिष्ट पहचान है। श्राद्ध,
पिंडदान और तर्पण प्रायः हरेक भारतीय तीर्थों में संपादित होता
है, पर इस अनुष्ठान के नाम पर विशाल मेला केवल गयाजी में ही
लगता है, जहां भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विनी अमावस्या तक इस
कार्य के निमित्त देश-विदेश के दूरस्थ स्थानों से लोगों का
आगमन होता है। इस नगर की खासियत ही कही जाएगी कि यहां साल भर
श्राद्ध पिंडदान होता रहता है।
भारत में तीन नगरों के नाम इतिहास
में असुरों के साथ संबद्ध है। यहां का श्रीपुरुष विष्णुभक्त
पराक्रमी गयासुर देवभक्त था। असुरों में भक्ति का प्रणम्य
पुरुष था, जबकि जालंधर नगरी का जालंधर और तंजौर नगरी के
तेजासुर अपने अनैतिक और दुष्ट कामों के लिए कुख्यात थे। इसी
गयासुर के भक्तिभाव का असर है कि यहां के लोग धर्म-कर्म में
खूब विश्वास करते हैं। सनातन धर्म में ऐसे कोई तीर्थ और देवता
नहीं हैं जिनका गयाजी में स्थान न हो, इसी लिए गयाजी को
सर्वतीर्थमयी भी कहा जाता है। गयाजी एक ऐसा नगर है जहां
प्राचीन और अर्वाचीन का अद्भुत दर्शनीय है। देव मंदिरों के
पूजन अर्चन और दर्शन यहां के लोगों की दिनचर्या में शामिल हैं।
शहर के शताधिक मंदिरों में खासकर श्रीविष्णुपद, माता मंगला
गौरी, श्री बंगला स्थान, माई वागेश्वरी, श्री भैरो स्थान,
मार्कडेश्वर शिव, फल्केश्वर महादेव, पितामाहेश्वर, वृद्धपरपिता
माहेश्वर गोदावली, महावीर स्थान, अक्षयवट आदि में बारहो मास
गहमागहमी बनी रहती है।
गयाजी को धरोहर समेटे हुए एक पुरातन
नगरी भी कहा जाता है। गांव-जबारी में पग-पग पर इतिहास-पुरातत्व
के कण बिखरे पड़े हैं। नवाश्म काल से लेकर हरेक भारतीय काल का
जीत स्थल यहां मौजूद है, यहां की धरोहरों पर कार्य करने के लिए
आज भी कितने ही विदेशी शोधार्थी यहां आते रहते हैं। इसके गर्भ
में बौद्ध, जैन और हिंदु स्थलों की भरमार है। गयाजी की बात चले
और बोधगया की बात न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? दरअसल शुरू से ही
गया और बोधगया का चोली-दामन की तरह संबंध रहा है। और तो और
पंचकोशी गया क्षेत्र में प्रेतशिला और ब्रह्मयोनी में से एक से
लेकर बोधगया तक की भूमि का उल्लेख किया गया है। गयाजी से
तकरीबन 11 किलोमीटर की दूरी पर निरंजना नदी के पार्श्व में
विराजमान बोधगया वही भूमि है जहां करीब 2550 वर्ष पूर्व तथागत
को आत्मज्योति की प्राप्ति हुई।
गयाजी भ्रमणकालीन संस्कृति का
मूर्धन्य केंद्र कहलाता है जहां भ्रमणार्थी साल भर आते रहते
हैं। यह जानकर गर्व होता है कि यह वही नगर है जहां बिहार
प्रांत में पहले पहल 1855 ई. में एक विशाल पुस्तकालय और
संग्रहालय की स्थापना की गई। आज भी यहां पुस्तकालयों और
संग्रहालयों की कोई कमी नहीं है। मगध संस्कृति केंद्र ने गया
संग्रहालय की स्थापना की है। मंत्र लाल पुस्तकालय, मारवाडी
पुस्तकालय, जनता पुस्तकालय पाठक के दिलोदिमाग में आज भी बसे
हैं। गया क्षेत्र की मूल भाषा मगही है जो बुद्ध काल के पूर्व
की भाषा मानी जाती है। हालांकि लोग कहते हैं कि गयाजी की भाषा
और बोली गर्म है, जबकि सच्चाई यह है कि किसी गयावासी के मुख से
कोई मगही संवाद सुन लें तो उसमें अक्खड़पन लिए प्यार-मनुहार का
रूप प्रतीत होता है। आज इस क्षेत्र में मगही में कितने ही
कार्य हो रहे हैं तब भी यह संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान
पाने से वंचित है। यह सर्वप्राचीन भारतीय लोकभाषा है।
गया रास-रंग के लिए भी दूर-दराज तक
प्रसिद्ध है। एक ओर जहां खूब तीखा और खट्टा प्रेमी यहां मिल
जाएंगे, तो कितने ही लोग ऐसे हैं जो मिष्ठान से ही पेट भर लेते
हैं। पान के बारे में तो पूछिए मत! इन सबके दांत इस बात के मूक
गवाह हैं कि इनका खाना बगैर पान के हजम नहीं होता। बैठकबाजी,
बतकही और फबती भी गयाजी के लोगों को अच्छा लगती है। चर्चा चाहे
किसी विषय की हो पर तय है कि यहां से निकली बात दूर तलक जाती
है। हाल के दिनों में गयाजी ने बिजली और पानी की समस्या से तो
निजात पाई है, पर गंदगी का कोई स्पष्ट हल नहीं निकला है। यहां
के साहित्यकार-पत्रकार संघ ने भी इस दिशा में पहल की है, पर
नतीजे कुछ खास नहीं निकले। गयाजी नगर की यह भी विशेषता कही
जाएगी कि यहां लेखनहारों की कोई कमी नहीं है। प्रत्येक मुहल्ला
यहां लेखकों से शोभायमान है। कलमकारी यहां का जीवंत पेशा है।
कुल मिलाकर यह कहना उचित जान पड़ता है कि इस लोक से परलोक के
बीच संबंध का स्थल गयाजी एक तरण तारन की स्थली है जहां के
प्राचीन आदर्श आज भी उसी रूप में जीवंत है। आपका गयाजी आगमन हर
पल, हर घड़ी शुभकारी होगा, ऐसा शास्त्रोउक्त मत है।
पितृ कौन हैं?
माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी
पूजा माना गया है। जो जीवन रहते उनकी सेवा नहीं कर पाते, उनके
देहावसान के बाद बहुत पछताते हैं। इसीलिए हिंदू धर्म शास्त्रों
में पितरों का उद्धार करने के लिए तर्पण की अनिवार्यता मानी गई
है। राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा जी को
स्वर्ग से धरती पर ला दिया। जन्मदाता माता-पिता को मृत्योपरांत
लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान
बताया गया है। प्रस्तुत है पितृ एवं पितृ पक्ष के महत्व की
विशेष जानकारी -
एकैकस्य
तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन
दद्याज्जलाज्जलीन।
यावज्जीवकृतं
पापं तत्क्षणदेव नश्यति।
अर्थात जो अपने पितरों को
तिलमिश्रित जल से तीन-तीन अंजलियां जल की प्रदान करता है, उसके
जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है।
हिंदू धर्म दर्शन के अनुसार जिसका
जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है, उसी प्रकार जिसकी
मृत्यु हुई है उसका जन्म भी निश्चित है। ऐसे कुछ विरले ही होते
हैं जिन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन
पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के पिता तीन पीढ़ियों तक के पिता
पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए
तर्पण किया जाता है। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ
तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात
ही स्वयं पितृ तर्पण किया जाता है। भाद्रपक्ष पूर्णिमा से
आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते
हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथि को
पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार
पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य
के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है,
उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं, और घर, परिवार व्यवसाय और
आजीविका में हमेशा उन्नति होती है।
पितृ दोष
पितृ दोष का उल्लेख भी यहां जरूरी
है जोकि जातक के जीवन में अत्यंत अशुभ और गंभीर दोष माना जाता
है। इसके अनेक कारण होते हैं और विद्वान साधकों ने इसको दूर
करने के सफल उपाय भी बताए हैं। परिवार में किसी की अकाल मृत्यु
होने से अपने माता-पिता आदि सम्माननीय जनों का अपमान करने से,
मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध न
करने से, उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों
का दोष लगता है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति वंश वृद्धि
में रूकावट, आकस्मिक बीमारी, नाना प्रकार के संकट, धन में बरकत
न होना, सारी सुख सुविधाएं होते हुए भी मन असंतुष्ट रहना आदि
पितृ दोष के ही कारण हो सकते हैं। यह भी कि कहते हैं कि यदि
परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हो हुई हो तो भी पितृ दोष
माना गया है। पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के
अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर
श्राद्ध करवाएं तो यह दोष दूर हो जाता है।
ध्यान रहे कि आप कितने ही धन शक्ति
सम्पन्न हों, किंतु इसके निमित्त कर्म के करने में अनेक
सावधानियां बरतनी होंगी, जिनमें धन-संपदा या अपने सामाजिक या
सत्ता-शासन के आडंबरपूर्ण प्रदर्शन की तो सख्त मनाही है जैसाकि
बहुत लोग करते हैं। आप कर्मकांड स्थल पर अपनी बारी की
प्रतीक्षा करें, इसके लिए अपने प्रभाव का कदापि इस्तेमाल न
करें। इसका उपाय किसी विद्वान जानकार के द्वारा धर्म विधि
सम्मत ही होना चाहिए इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि आप
सामर्थ्यवान हों। यदि आप निर्धन भी हैं तब भी इसे शास्त्रीय
विधि से ही कराएं। यदि आप दान देने में सक्षम हैं तो यह
सुनिश्चित करना भी आपका कर्त्तव्य है कि आपका दान-दक्षिणा किसी
पात्र व्यक्ति को ही प्राप्त हो। ऐसा करना आपके पितृ को
प्रसन्न और संतुष्ट करेगा। ऐसे आपके पितृ आपकी सुख-समृद्धि में
सहायक होंगे। एकाग्रचित होकर संपूर्ण श्रद्धा और आदर भाव से इस
कर्म काण्ड को संपूर्ण कराना सभी जातकों के लिए समान है। आप
किसी भी स्थिति में अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ और
श्रेष्ठजनों का अपमान न करें। प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने
पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें। यदि इन सभी क्रियाओं
को करने के पश्चात पितृ दोष से मुक्ति नहीं होती हो तो
समझें कि इसके विधि विधान में कोई त्रुटि रह गई है। ऐसी स्थिति
में किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ विद्वान से श्रीमद् भागवत पुराण की
कथा करवाएं। पितृ दोष से मुक्ति का विधान अत्यंत कठिन माना
जाता है। सामान्यत: यह देखा जाता है कि जातक अपने पितृ पक्ष के
दोष से मुक्त होने के लिए अथवा श्राद्ध कर्म को बड़े ही
सामान्य और औपचारिक रूप से सम्पन्न करता है। ऐसा करना ही जातक
के दुखों का कारण बनता है। वैसे श्रीमद भागवत पुराण की कथा कोई
भी श्रद्धालु पुरुष अपने पितरों की आत्म शांति के लिए करवा
सकता है। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
पितृ पक्ष का
महत्व
ज्योतिष शास्त्र में ऋतुओं और काल,
पक्ष, उत्तरायण और दक्षिणायन, उत्तर गोल और दक्षिण गोल का
अत्यधिक महत्व है। उत्तर गोल में देवता पृथ्वी लोक में विचरण
करते हैं, वहीं दक्षिण लोक, भाद्र मास की पूर्णिमा को चंद्रलोक
के साथ-साथ पृथ्वी के नजदीक से गुजरता है। इसी मास की
प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष भर करते हैं। वे चंद्रलोक के
माध्यम से दक्षिण दिशा से होते हुए अपनी मृत्यु तिथि पर अपने
घर के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं और वहां अपना असम्मान या अपनी
नई पीढ़ी में उपेक्षा का भाव देखकर दुखी होकर श्राप देकर चले
जाते हैं। वे पितृलोक में जाकर अपने साथियों के समक्ष अपने
परिवार का दुख प्रकट करते हैं और पूरे वर्ष दुखी रहते हैं। अगर
उनकी नई पीढ़ी पितरों के प्रति सम्मान रख रही है तो वे दूसरे
पितरों से मिलकर अपनी पीढ़ी की प्रशंसा करते हुए फूले नहीं
समाते हैं। यह ऐसा ही व्यवहार है जैसा पृथ्वी पर लोग एक दूसरे
से करते हैं। ऐसा वर्णन श्राद्ध मीमांसा में आया है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी जब
सूर्य नारायण कन्या राशि में विचरण करते हैं तब पितृलोक पृथ्वी
लोक के सबसे अधिक नजदीक आता है। श्राद्ध का अर्थ पूर्वजों के
प्रति श्रद्धा भाव से है, जो मनुष्य उनके प्रति उनकी तिथि पर
अपनी सामर्थ्य के अनुसार फलफूल, अन्न, मिष्ठान आदि से ब्राह्मण
या किसी पात्र को भोजन कराते हैं। इससे प्रसन्न होकर पितृ उसे
आशीर्वाद देकर जाते हैं। पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध
दो तिथियों पर किए जाते हैं, प्रथम मृत्यु या क्षय तिथि पर और
द्वितीय पितृ पक्ष में जिस मास और तिथि को पितर की मृत्यु हुई
है अथवा जिस तिथि को उसका दाह संस्कार हुआ है। वर्ष में उस
तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर की संतुष्टि के लिए
श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिंड का दान और एक ब्राह्मण या
पात्र को भोजन कराया जाता है। पितृपक्ष में जिस तिथि को पितर
की मृत्यु तिथि आती है, उस दिन पार्वण श्राद्ध किया जाता है।
पार्वण श्राद्ध में 9 ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है,
किंतु शास्त्र किसी एक सात्विक एवं संध्यावंदन करने वाले
ब्राह्मण को भोजन कराने की भी आज्ञा देते हैं। ब्राह्मण का आशय
भी एक सद्चरित्र वाले पात्र व्यक्ति से है।
ब्रह्मा पुराण में वर्णन आया है कि
जो लोग श्राद्ध नहीं करते, उनके पितृ उनके दरवाजे से वापस दुखी
होकर चले जाते हैं। वे पूरे वर्ष श्राप देते और अपने सगे
संबंधियों का रक्त चूसते रहते हैं। उनके क्रोध से वर्ष भर जातक
के घर में मांगलिक कार्य नहीं होते। भारतीय ज्योतिष शास्त्र
में पितृ दोष का सबसे अधिक महत्व है। यदि घर में कोई मांगलिक
कार्य नहीं हो रहे हैं, रोज नई-नई आफतें आ रही है, आदमी
दीन-हीन होकर भटक रहा है या संतान नहीं हो रही है, या विकलांग
पैदा हो रही है तो इसका मुख्य कारण यही माना जाना चाहिए कि उस
व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष है।