किशोरियों को समर्थ बनाती ये योजनाएं

  • एनसी जोशी

 

किशोर युवतियों को अगर विकास कार्यक्रमों से बाहर रखा गया तो बच्चों के संपूर्ण विकास की अवधारणा अधूरी ही रहेगी। किशोरावस्था बचपन और मातृत्व के बीच का महत्वपूर्ण चरण है। यह मध्यवर्ती अवस्था मानसिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कल्याण के लिए बहुत महत्वपूर्ण और घटनाप्रधान है। विभिन्न सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट पता चलता है कि किशोर लड़कियों का स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सामाजिक रुतबा वांछनीय स्तर से नीचे है तथा किशोरावस्था वाली लड़कियों को स्वास्थ्य और पोषण सूचनाओं या सेवाओं तक पर्याप्त पहुंच नहीं है।
समग्र बाल विकास सेवाओं का उद्देश्य (आईसीडीएस) प्रारंभिक बाल विकास के लिए अवसरों के साथ सामाजिक-आर्थिक और लैंगिक भेदभाव को कम करना है। महिलाओं और किशोर बालिकाओं की चिंताओं से बेहतर ढंग से निपटने के लिए, किशोर वय की लड़कियों के वास्ते कार्यक्रम बनाने के लिए यह जरूरी था जिसमें उनके आत्मविकास, पोषण और गणितीय कौशल और व्यावसायिक कुशलताओं आदि की जरूरत को पूरा करती है।
किशोर वय की बालाओं के लिए आईसीडीएस के बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल कर विशेष हस्तक्षेप किशोरी शक्ति योजना (केएसवाई) और किशोरियों के लिए पोषण कार्यक्रम कार्यांवित किए जा रहे हैं। ये हस्तक्षेप आत्मविकास, पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, साक्षरता और पुनर्सृजनात्मक कौशल निर्माण की उनकी जरूरत को पूरा करने के लिए 11 से 18 साल की उम्र में स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
किशोरी शक्ति योजना किशोर वय की बालाओं को समर्थ बनाने के लिए है ताकि उनको अपने जीवन को बदलने में समर्थ बनाया जा सके। इसे किशोर अवस्था की लड़कियों के विकास के लिए संपूर्णतावादी पहल के रूप में देखा गया है। इसके हस्तक्षेप के माध्यम से चलाए जा रहे कार्यक्रमों का उद्देश्य किशोर अवस्था की लड़कियों के जीवन में बदलाव लाना है। यह उनको ऐसा अवसर उपलब्ध कराने के लिए है जहां वे अपनी क्षमता को पूरी तरह पहचान सके।
मौजूदा किशोरी स्कीम (एजी) को फिर से डिजाइन करके यह योजना तैयार की गई है जो केंद्र पोषित समग्र बाल विकास सेवाएं (आईसीडीएस) स्कीम के घटक के रूप में कार्यांवित की जा रही है। नई स्कीम ने विषय वस्तु के महत्वपूर्ण रूप से समृद्ध होने के साथ पहले चलाई जा रही स्कीम के दायरे में नाटकीय विस्तार किया है। इसने प्रशिक्षण घटक को मजबूत बनाने, खासतौर से कौशल विकास, सशक्तिकरण और आत्म बोध बढ़ाने के पहलू का भी दायरा बढ़ाया है। यह किशोर बालिकाओं और महिलाओं की परस्पर संबद्ध जरूरतों को पूरा करने के साथ अन्य खंड स्तर के कार्यक्रमों के अभिसरण को बढ़ावा देती है।
स्कीम के व्यापक उद्देश्यों में किशोर वय बालिकाओं की पोषण, स्वास्थ्य एवं विकास की दशा को सुधारना और शिक्षा, सफाई, पोषण और परिवार की देखरेख के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देना है। जीवन के कौशल सीखने के अवसरों से जोड़ने, फिर से स्कूल जाना शुरू करने, अपने सामाजिक माहौल को बेहतर ढंग से समझने में मदद करने और समाज का उत्पादक सदस्य बनने में किशोरियों की मदद करना भी स्कीम के उद्देश्य हैं।
योजना आयोग ने किशोरियों और गर्भवती महिलाओं तथा स्तन पान कराने वाली माताओं में अल्पोषण की समस्या को दूर करने के लिए 2002-2003 में देश के 51 जिलों में प्रायोगिक परियोजना के आधार पर किशोरियों के लिए पोषण कार्यक्रम (एनपीएजी) शुरू किया। इस स्कीम के तहत 6 किलोग्राम अनाज दिया गया। उनके वजन के आधार पर योग्यता निर्धारित की गई। प्रायोगिक परियोजना 2003-2004 तक जारी रही। इसे 2004-2005 में जारी नहीं रखा जा सका। सरकार ने 51 पिछड़े जिलों में महिला एवं बाल विकास विभाग के माध्यम से एनपीएजी के कार्यान्वयन का अनुमोदन किया। योजना आयोग ने सिर्फ अल्पपोषित किशोरियों (गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को इसमें शामिल नहीं किया गया क्योंकि वे आईसीडीएस के तहत लक्षित हैं) को 6 किलोग्राम मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने के लिए 2005-2006 में इन जिलों की पहचान की थी। यह स्कीम प्रायोगिक परियोजना के आधार पर 2006-2007 की वार्षिक योजना के लिए जारी रखी गई।
राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को 100 प्रतिशत अनुदान के रूप में धन दिया गया ताकि वे पहचाने गए अल्पोषित व्यक्तियों के परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए मुफ्त अनाज उपलब्ध करा सकें। निसंदेह किशोरियों की पोषण एवं स्वास्थ्य दशा को सुधारने के उद्देश्य से ऐसे कार्यक्रम निश्चित रूप से उनका आत्म विकास करने और उनको सशक्त बनाने के साथ निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ावा देंगे।