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पूर्वोत्तर राज्यों में समृद्ध होती बागवानी
गंगटोक। देश के
पूर्वोत्तर क्षेत्र बागवानी और फूलों की खेती के मामले में
बहुत समद्ध है। यहां अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियां उगती हैं।
केंद्रीय सरकार बागवानी मिशन से प्राप्त धनराशि से मिजोरम,
सिक्किम और मेघालय में अनेक उत्कृष्ट बागवानी केंद्र स्थापित
हो गए हैं जो किसानों में फलों और सब्जियों की खेती के बारे
में सफल प्रचार-प्रसार करने लगे हैं।
कमजोरी को ताकत और सफलता में बदलने के सिद्धांत को
बागवानी के प्रौद्योगिकी मिशन ने अपनाकर मौसमी और बेमौसमी
सब्जियों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से कदम
बढ़ाए हैं। सिक्किम सरकार के बागवानी विभाग ने प्रगतिशील
किसानों को तकनीकी निवेश उपलब्ध कराकर तथा अधिक उत्पादन देने
वाले बीजों तथा प्रशिक्षण की सुविधाएं उपलब्ध कराकर बागवानी
उत्पादन के प्रति किसानों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। इससे
किसानों ने खेती के परंपरागत तरीके को छोड़कर व्यक्तिगत आर्थिक
निर्भरता अपनाई और अन्य राज्यों पर अपनी निर्भरता कम कर ली।
विभाग ने गंभीर रुख अपनाए जाने के बाद एक साल के अंदर
ही परिणाम यह हुआ कि उत्पादन खपत से ज्यादा हुआ और स्थानीय
बाजार की मां पूरा करते हुए अब सीमा पार अपना विपणन बढ़ा लिया।
किसानों की सीमित जमीन का ध्यान रखते हुए कृषि, बागवानी और फसल
विकास विभाग प्रति वर्ग मीटर उत्पादन पर जोर दे रहे हैं और
प्रौद्योगिकी मिशन के तहत लाभ कमाने के लिए सीमांत किसानों को
भी अवसर देने लगे हैं। प्रगतिशील किसानों को खेती के प्रशिक्षण
एवं पौधों की देखभाल के नुस्खे बताए जाने के साथ ही उन्हें
अधिक उपज वाले बीज दिए जा रहे हैं। इसके अलावा विभागकर्मी खेती
पर नियमित रूप से नजर भी रखते हैं।
चूंकि स्थानीय बाजार अतिरिक्त उत्पादन से पट गए हैं,
इसलिए विभाग किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराने के लिए
खासकर टमाटर के लिए, उन्हें गांव स्तर पर विपणन समिति गठित
करने का सुझाव दे रहा है। उन्हें इस बात का भी प्रशिक्षण दिया
जा रहा है कि वे टमाटरों को अलग-अलग करके उनकी श्रेणियां बनाएं
ताकि बाजार पहुंचने से पहले उसकी गुणवत्ता बढ़ जाए। कृषि,
बागवानी एवं नकदी फसल विभाग के अधिकारी बताते हैं कि किसानों
एवं उत्पादकों को बेहतर मूल्य दिलाने के लिए शीत भंडारण सुविधा
एवं समेकित पेकेजिंग इकाई की स्थापना का कार्य युद्धस्तर पर चल
रहा है।
विषम मौसम का स्थल होने के कारण सिक्किम की कुछ अपनी
सीमाएं हैं लेकिन इन सीमाओं को भी लाभ के रूप में परिवर्तित
किया जा रहा है। ऐसी प्रणालियां अपनाई जा रही हैं, जो किसानों
को आर्थिक रूप से संबल एवं आत्मनिर्भर बनाने में सर्वथा अनुकूल
हो। जैसे निम्न वर्षा वाले दक्षिण एवं पश्चिम जिले संकर किस्म
के टमाटर की खेती के लिए चुने गए हैं।
पश्चिम जिले में 56.6 हेक्टेयर जमीन और 631 किसानों का
टमाटर की खेती के लिए चयन किया गया है। एक पौधा औसतन 3.5
किलोग्राम उपज देता है और करीब 11,33,400 पौधे लगाए गए हैं
जिससे तकरीबन 3966.90 टन टमाटर की उपज हुई है। सिक्किम में
प्रतिदिन करीब 25 लाख टन की खपत है जबकि आपूर्ति 125 लाख टन की
है। ऐसे में विभाग राज्य से बाहर बाजार ढूंढने का प्रयास कर
रहा है। इसी तरह खरीफ फसलों के साथ मूली, फूल गोभी, बंदगोभी,
कद्दू वर्गीय सब्जियों, बैंगन, भिंडी, पालक और ककड़ी की बड़े
पैमाने पर खेती की मिशन के तहत विशेष बल दिया जा रहा है।
सिक्किम समेत समूचे पूर्वोत्तर क्षेत्र में 2010 तक
बागवानी उत्पादन दोगुणा करके जीविकोपार्जन अवसर बढ़ाने तथा
समृद्धि लाने के लिए समेकित बागवानी विकास प्रौद्योगिकी मिशन
शुरू किया गया था। यह मिशन संपूर्ण बागवानी विकास, सभी अगड़े
एवं पिछड़े कडि़यों का विकास तथा सभी को शामिल किए जाने पर
आधारित है। प्रौद्योगिकी मिशन के सहयोग एवं राज्य सरकार के
जैविक कृषि को बढ़ावा देने के साथ ही मिशन की सफलता इस बात पर
निर्भर करती है कि प्रगतिशील किसान अपने को आत्मनिर्भर बनाने
के प्रति कितने प्रतिबद्ध है। विपणन सहयोग से ही बदलाव का
सूत्रपात्र हो गया है।
आगे और...

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