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अब भगवान पशुपति नाथ के लिए
क्या आदेश हैं ?
काठमांडू।
नेपाल
में अभी तक भगवान शिव के पशुपति नाथ मंदिर से ही राजशाही की
सत्ता का दिन शुरू हुआ करता था यानि भगवान पशुपति नाथ को ही
नेपाल का संरक्षक माना जाता है इसलिए अब यहां पूछा जा रहा है
कि भगवान पशुपति नाथ के लिए भी माओवादी सरकार का क्या नया आदेश
है? नेपाल में धर्म और सत्ता का गहरा संगम है, यह देवताओं की
नगरी कही जाती है। यह मंदिरों, अद्भुत संस्कृति और परंपराओं का
देश है जहां पर दो दशक से राजशाही और लोकतंत्रवादियों के बीच
सत्ता संघर्ष चला आ रहा है। विश्व समुदाय और नेपाल के अधिकांश
लोग नेपाल के भविष्य के प्रति भारी आशंकित हैं क्योंकि जिन
माओवादियों के हाथ में नेपाल की सत्ता आ रही है उनका अतीत
विद्धंसक आपराधिक, अराजक और चीन के दलाल वाला बिकाऊ माना जाता
है।
कहते हैं कि भगवान पशुपति नाथ मंदिर में शाह वंश की
पांचवीं पीढ़ी के राजा ने नेपाल के लिए अपना बलिदान दिया था
इसलिए शाहवंश के राजाओं की पशुपति नाथ मंदिर में मूर्तियां भी
लगी हैं और इस मंदिर का प्रबंधन भी शाहवंश के हाथ में है।
नेपाल के शासक यहीं से आदेश प्राप्त करते रहे हैं। शाहवंश को
जनसामान्य में भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। नेपाल के
पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र अब नेपाल के अंतिम शासक के रूप में जाने
जा रहे हैं। उनका महल नारायणहिती नेपाल सरकार का संग्रहालय बना
दिया गया है। राजमुकुट जमा करा लिया गया है। नेपाल में अभी
संविधान सभा के दिशा-निर्देशों को लेकर एक भ्रम की स्थिति कायम
है क्योंकि संविधान सभा में किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला
है। सरकार के गठन को लेकर भी भारी गतिरोध है। इसलिए अभी यह
कहना पूरी तरह से सही नहीं होगा कि नेपाल में राजशाही के
प्रभाव का भी अंत हो गया है। इस देश में और क्या-क्या एजेंडे
लागू करते हैं।
नेपाल में पहले राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के पद
माओवादियों के हाथ से निकल चुके हैं जिससे माओवादियों के शिविर
में भारी निराशा दिखाई पड़ती है। कमल दहल प्रचंड भले ही
संविधान सभा में सबसे ज्यादा सीटें जीते हों लेकिन राष्ट्रपति
और उप राष्ट्रपति के चुनाव में उनकी राजनीतिक और सामाजिक
नीतियों को भारी झटका लगा है। ऐसी स्थिति में हो न हो कमल दहल
प्रचंड को कुछ समय बाद नेपाल के प्रधानमंत्री की कुर्सी से भी
हाथ धोना पड़ जाए। सत्ता हस्तांतरण में मुह की खाए माओवादी
खिसियाए हुए हैं इसलिए वे अभी भी हथियार डालने को तैयार नहीं
दिखाई देते। क्योंकि संविधान सभा के फैसलों को लागू करने वाले
दिन जश्न मनाते हुए माओवादियों के कई नेता हथियार हाथों में
लिए अपने चेहरे को मुखौटों से ढके हुए थे जिसकी बाद में नेपाली
जनसामान्य में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। माओवादियों के नेताओं
के पास यह जवाब नहीं है कि जब आज उनका ही साम्राज्य आ रहा है
तो फिर मुखौटे लगाए हुए ये लोग कौन हैं जो कि माओवादियों के
प्रमुख नेताओं के इर्दगिर्द मंडराते हुए दिखाई दिए हैं। क्या
अभी भी इन माओवादियों को अपना चेहरा छिपाकर हिंसा जारी रखनी है
या ये वो लोग हैं जो पड़ोसी देश भारत में या दूसरे विभिन्न
इलाकों में माओवादियों की हिंसक गतिविधियों का नेतृत्व कर रहे
हैं।
नेपाल अभी किस लोकतंत्र के हवाले हैं इसका अता-पता
फिलहाल कोई नहीं जानता है। इन चार महीनों में नेपाल में
उलटते-पलटते समीकरण ही देखने को मिले हैं जिनमें एक बात बड़ी
ही स्पष्टता से उभर कर सामने आई है वो यह कि नेपाल की जनता का
जो भी जनादेश है उसके प्रति विश्व समुदाय आशावादी और संतुष्ट
दिखाई नहीं देता। चुनाव हो जाने के बाद सत्तारोहण की लंबी
प्रतीक्षा किसी ने किसी आशंका और अविश्वास को तो जन्म दे ही
दिया है। इस बीच नेपाल में जो-जो परिवर्तन हुए उसमें सबसे बड़ा
परिवर्तन यही हुआ कि नेपाल राजवंश के अंतिम शासक ज्ञानेंद्र
बगैर किसी प्रतिरोध के वह राजमहल और अपना राजमुकुट राष्ट्र को
समर्पित कर गए जो 240 वर्षों की राजशाही का अनंतकाल तक गवाह
रहेंगे। माओवादी नेता प्रचंड के गुंडे नेपाल के पूर्व राजा
ज्ञानेंद्र से राजमुकुट और राजमहल छीनने की योजना बनाते ही रह
गए। इसी बीच नेपाल के राजकुमार पारस भी अपने बच्चों सहित
सिंगापुर जाकर बस गए हैं। पूर्व नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र भी नई
लोकतांत्रिक व्यवस्था के राज-पाट संभालने से पहले ही अपना
आर्थिक साम्राज्य समेट लेना चाहते हैं।
नेपाल में कमल प्रचंड के सामने एक के बाद एक नई
परेशानियां खड़ी हो रही हैं। भारत के साथ संधि की समीक्षा और
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके बयानों ने उन्हें काफी मुसीबत में
डाल दिया है। नेपाल में उन्होंने मीडिया को सरेआम धमकाया और वह
उसी प्रकार का व्यवहार कर रहे हैं जिस प्रकार वह अपने छापामार
विद्रोहियों की तरह करते थे। दुनिया का एक मात्र यह हिंदू
राष्ट्र एक गणतांत्रिक देश के रूप में बदल तो गया है लेकिन अभी
भी यही एहसास कायम है कि नेपाल में लोकतंत्र नहीं बल्कि राजवंश
का ही राज है। नेपाल में विष्णु का अवतार कहे जाने वाले राजा
को जब यह आदेश सुनाया गया कि वह नेपाल का राजमहल खाली कर दें
क्योंकि उनसे नेपाल के राजा का खिताब वापस ले लिया गया है तो
इसके समाचार से नेपाल में गणराज्य में शामिल होने वालों के बीच
से भी असमंजस के कुछ स्वर सुनाई दिए। नेपाल की जनता और खासतौर
से नेपाली यहां के भूमिगत हिंदू संगठनो ने इस पर अपना कड़ा
विरोध दर्ज किया। नेपाल के हिंदू स्वरूप को समाप्त करने पर
विश्व समुदाय की भी मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।

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