चंदे का धंधा मायावती के‌ लिए भारी

  • सीबीआई जांच कभी भी संभव

  • दिनेश शर्मा

लखनऊ। लोक निर्माण विभाग ओरैया के अधिशासी अभियंता इंजीनियर मनोज गुप्‍ता हत्‍याकांड में जल्‍दबाजी मेंचंदे का धंधा मायावती के‌ लिए भारी दाखिल चार्जशीट किसी भी समय उत्‍तर प्रदेश सरकार को सीबीआई के थाने में घसीट सकती है। अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि ज्‍यादा चालाकी ही अपराध के सारे सबूत पीछे छोड़ देती है- इस मामले में यही हुआ है। राज्‍य की मुख्‍यमंत्री मायावती ने अपने जन्‍मदिन के लिए जबरन चंदा उगाही के पुख्‍ता सबूतों को मिटाने के लिए मनोज गुप्‍ता हत्‍याकांड से अपने आपको बचाने के चक्‍कर में घटना के संबंध में विभिन्‍न अवसरों पर जो बयानबाजी की है, वही इस मामले की सीबीआई जांच के लिए पुख्‍ता आधार बन चुकी है। बाकी कसर राज्‍य के डीजीपी विक्रम सिंह एवं कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने पूरी कर दी है, जिन्‍होंने इस मामले में प्रेस को सरकारी पक्ष की जानकारी देने और मायावती के ऊपर आ रही आफत को टालने के चक्‍कर में बेतुकी एवं विरोधाभारी जानकारियां देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तुरत-फुरत चार्जशीट दाखिल करने की जल्‍दी का कारण यही रहा है कि इसके बाद सीबीआई जांच का लफड़ा खत्‍म हो जाएगा, किंतु संकट के समाधान का यह तरीका मायावती और उनकी सरकार के बड़बोले अफसरों के गले पड़ने जा रहा है।
बसपा विधायक शेखर तिवारी सहित दस लोग इस हत्‍याकांड में सीधे अभियुक्‍त बनाए गए हैं जबकि शेखर तिवारी की पत्‍नी विभा तिवारी को आपराधिक साजिश में शामिल बताया गया है। दिबियापुर के थानाध्‍यक्ष होशियार सिंह, बसपा के जिलाध्‍यक्ष योगेंद्र दोहरे उर्फ भाटिया और विधायक के दोनो गनर भी अभियुक्‍त हैं। सबसे शुरू में मुख्‍यमंत्री मायावती ने कहा था कि मनोज गुप्‍ता की हत्‍या राजनीतिक षड़यंत्र के तहत की गई है‌, फिर कहा गया कि सरकार के खिलाफ साजिश है और यह ठेकेदारों की आपसी प्रतिद्वंदिता का मामला है और राज्‍य के डीजीपी अब कह रहें है कि यह राजनीतिक षड़यंत्र नहीं है। इस हत्‍याकांड में सरकार ने जितनी तेजी से पैतरें बदले हैं और जांच पूरी की है यह सब इस मामले को पेचिदा तरीके से उलझाने की कोशिश माना जाता है। हत्‍याकांड के अगले दिन यही सरकार कई बयान बदली और मायावती के जन्‍मदिन की चंदा वसूली के मामले से इसे अलग रखने के लिए स्‍वयं मायावती सामने आ गईं और उन्‍होंने प्रेस को बार-बार अलग-अलग तरह के बयान दिए। इससे विपक्ष और जनसामान्‍य को यह मानने में देर नहीं लगी कि यह सीधे-सीधे जन्‍मदिन की चंदा उगाही हो रही थी। विधायक पर कहीं से दबाव था कि उसे टारगेट पूरा करना है और उसके लिए वह अपने आपराधिक तरीकों का सहारा लेते हुए मायावती के जन्‍मदिन की बलि चढ़ गया। शेखर तिवारी का इतिहास कोई अच्‍छा नहीं कहा जाता है, मगर वह इंजीनियर से जो चंदा उगाही करना चाहता था उसे वह तुरंत ही बहनजी के चरणों में अर्पित करके वहां अपने नंबर बढ़वाना चाहता था। इस मामले को खत्‍म करने के लिए राज्‍य सरकार ने एड़ी से चोटी तक जो जोर लगाया वह काम नही आया है इसलिए यह मामला अब सीबीआई जांच के काबिल हो गया है। केंद्र सरकार भी कह चुकी है कि वह इसकी सीबीआई जांच कराने को तैयार है।
कानूनविदों का अभिमत है कि इस मामले की ठीक से पैरवी हुई तो यह कानूनी रूप से भी निश्‍चय ही सिद्घ किया जा सकेगा कि मायावती अपने जन्‍मदिन पर या विभिन्‍न अवसरों पर अपने विधायकों-सांसदों पदाधिकारियों, अफसरों और मंत्रियों से किस प्रकार जबरन चंदा उगाही कराती हैं। मनोज गुप्‍ता हत्‍याकांड इस मामले का पूरी तरह से पर्दाफाश करने के लिए एक ज्‍वलंत एवं सटीक प्रमाण है। इसीलिए मायावती सरकार इसे कभी ठेकेदारी का विवाद और कभी विधायक शेखर तिवारी को शराबी कबाबी बताकर और कभी थानेदार होशियार सिंह को इसके लिए सीधे जिम्‍मेदार ठहराकर इससे पल्‍ला झाड़ने की असफल कोशिश कर रही हैं। मगर अब स्‍थितियां ऐसी हैं कि सीबीआई के हाथ में जाने पर इस मामले में किसी भी प्रकार की सौदेबाजी की भी गुंजाईश नहीं बची है। सभी आरोपियों एवं जांच अधिकारियों और उत्‍तर प्रदेश के डीजीपी विक्रम सिंह, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह एवं मुख्‍यमंत्री मायावती के विरोधाभासी बयान सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं एवं इलेक्‍ट्रानिक प्रचार माध्‍यमों में रेकार्ड भी हैं। वैसे भी इस मामले में शुरू से ही सीबीआई जांच की मांग की जा रही है जिसे राज्‍य सरकार टालने की भरपूर कोशिश करती आ रही है। इसमें सीधे-सीधे मायावती पर आंच आ रही है। इसके साक्ष्‍य मिटाने की कोशिशें भी हो रही हैं लेकिन अब यह मामला बहुत आगे बढ़ गया है जिसकी सीबीआई जांच कभी भी हो सकती है।
बेशर्मी और क्रूरता से भरा मायावती का सर ए आम यह चंदा वसूली अभियान इस हद तक सर चढ़ कर बोल रहा है कि अब यह शर्म भी नहीं बची है कि इस प्रकार के चंदे की जबरन वसूली नहीं होनी चाहिए। बसपा विधायक, मंत्री, उनके कार्यकर्ता और चाटूकार अफसरों की जमात को यह यकीन है कि अगर कोई इसके खिलाफ बोलने की कोशिश करेगा तो उसके विरुद्घ ऐसी कार्रवाई की जाएगी, सरकारी मशीनरी की ओर से ऐसा हमला किया जाएगा कि वह तो क्‍या औरों की भी बोलती बंद हो जाएगी। मनोज गुप्‍ता का मामला तो बहुत छोटा उदाहरण है, ऐसे न जाने कितने वीभत्‍स मामले हैं जो भय के कारण सामने नहीं आ सके हैं। इसलिए इसको विपक्षी दल या अन्‍य बुद्घिजीवी वर्ग में अब चंदा नहीं बल्‍कि गुंडा टैक्‍स की उगाही नाम दे दिया गया है। व्‍यापारियों और उद्योगपतियों के बीच यह टैक्‍स अब उनके काम के बदले की शक्‍लें ले चुका है। कोई भी भिड़ना नहीं चाहता है बल्‍कि अपनी हैसियत के अनुसार देकर मुक्‍ति चाहता है। वह ये सोचकर यह चंदा देता है कि चलो वह पैसा पानी में गया। बसपा के नेताओं, कार्यकर्ताओं और थानेदारों को जिस प्रकार चंदा वसूली में लगाया जाता है और वह भी मायावती के जन्‍मदिन के लिए तो उसमें किसी को कोई छूट नहीं होती है। उसे या तो टारगेट पूरा करना है या उसे उस पद से जाना है या उसे फर्जी मामलों में जेल जाना है।
मायावती अपनी जनसभाओं में और कार्यकर्ताओं की मीटिंग में यहां तक की अपनी प्रेस ब्रीफिंग में भी बोलती आ रही हैं कि वह चंदा वसूली के लिए कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को कहती हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं की मीटिंग में न जाने कितने लोगों ने इस दबाव को न मानते हुए बसपा से किनारा कर लिया क्‍योंकि बसपा का कोई कार्यकर्ता या विधायक तो ऐसा है जो चंदे का टारगेट पूरा कर सकता है मगर बहुत से ऐसे हैं कि जो इस टारगेट को पूरा नहीं कर सकते। जम्‍मू कश्‍मीर बहुजन समाज पार्टी के अध्‍यक्ष डा सतपाल को मायावती ने इसलिए पद से हटा दिया कि वह बार-बार चंदे की मांग को पूरा नहीं कर पा रहा था। उसने जम्‍मू-कश्‍मीर में बहुजन समाज पार्टी को खड़ा करने के लिए अपनी सरकारी नौकरी तक को दांव पर लगाया और मायावती के कहने पर मुख्‍य चिकित्‍साधिकारी के पद से इस्‍तीफा भी दे दिया। मायावती ने उसकी चंदे के लिए ऐसी दुर्गति की कि उसको बाद में बसपा छोड़नी पड़ी। डा सतपाल जैसे कार्यकर्ताओं के कारण बसपा ने जम्‍मू-कश्‍मीर में बसपा की कई सीटें जीतीं हैं लेकिन इस बार ऐसे कार्यकर्ताओं के अलग होने के कारण बसपा जम्‍मू-कश्‍मीर के चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल पाई। उत्तराखंड में फूल सिंह चौधरी और ईशम सिंह जैसे ताकतवर बसपा कार्यकर्ता भी इसी के शिकार हैं, जो आज मायावती से अलग हैं। 

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