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अपने आप में एक
पाठ्यक्रम हैं लालू
नई
दिल्ली। नीतिशास्त्र, राजनीति और कूटनीति की परिभाषाओं और राज-पाट की एक से बढ़कर एक अकाट्य रणनीतियों के जनक बिहार में अगर कहा जाए कि लालू राजनीति शास्त्र के लिए किसी पाठ्यक्रम से कम नहीं हैं तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। भारतीय राजनीति के क्षितिज पर इन दो दशकों से जो तेज तर्रार राजनेता अपना इकबाल कायम किए हुए हैं उनमें ‘लालू’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। राजीव गांधी शासन के बाद देश में फैली राजनीतिक अस्थिरता के इस लंबे दौर में बिहार पर करीब पंद्रह वर्ष लगातार शासन करने वाले लालू यादव की रणनीतियों और उनकी कार्यशैली को मान्यता देकर वहां के जन सामान्य ने लालू यादव को एक ऐसा राजनेता बना दिया है जो कि चतुराई से अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर सफलतापूर्वक विजय पाता है और अपने ऊपर गंभीर से गंभीर आरोपों से भी विचलित नहीं होता। लालू अच्छी तरह से जान गए हैं कि उन्हें कब ‘लल्लू’ बनना है और कब ‘लालू’ और कब ‘लालू प्रसाद यादव’ बनने और दिखने से काम निकलेगा। यही राजनीति की सामान्य और सबसे सरल परिभाषा कही जा सकती है जिसे चाणक्य के राज्य से अवतरित हुए लालू यादव ने खूब आजमाया और अपनाया है।
राजनीतिज्ञों से लेकर छात्रों और बच्चों तक में उनको सुनने और देखने के लिए जितनी जिज्ञासा रहती है शायद उतनी जिज्ञासा किसी अन्य राजनेता में नहीं दिखाई देती। पटना में उनके जन्मदिन पर ऐसे ही नजारे दिखाई दिए। गूढ़ से गूढ़ विषय पर लालू यादव ऐसे पकड़ रखते हैं, मानो उन्हें उस विषय का संपूर्ण ज्ञान हो। वह भोजपुरी बोलते हैं तो भी, और, अंग्रेजी बोलते हैं तब भी। लालू यादव या तो बिहार के मुख्यमंत्री होने के समय सामने आए ‘चारा घोटाले’ से जाने गए या फिर केंद्र में रेल मंत्री बनने के बाद से उन्हें देश-दुनिया ने जाना। आज उनकी ‘रेल’ पटरी पर दौड़ रही है। वह केंद्र की यूपीए सरकार के एक ऐसे स्तंभ के रूप में खड़े हैं कि जब भी यूपीए में राजनीतिक भूचाल आता है तो लालू यादव उसे रोकने का काम करते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। अमेरिका से परमाणु करार के मामले में समर्थन जुटाने में लालू यादव की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी सजातीय और कांग्रेस से जबरदस्त खार खाए बैठे समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को न केवल परमाणु करार पर कांग्रेस का साथ देने के लिए सफलतापूर्वक प्रेरित किया अपितु उनके लिए आने वाले लोकसभा चुनाव में अनुकूल राजनीतिक माहौल का मार्ग भी प्रशस्त किया।
लालू
प्रसाद
यादव के राजनीतिक एवं सामाजिक व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए उन्हें हमेशा जिस राजनीतिक ताकत से तुलना करके देखा जाता है तो वह उनके सजातीय और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ही हैं। उत्तर भारत में पिछड़ों की राजनीति का यह एक ताकतवर नेटवर्क माना जाता है। भारतीय राजनीतिक के विश्लेषक इन दोनों को परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों के रूप में देखते आए हैं। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के सांसदों की ताकत का सामना करना अकेले कांग्रेस के लिए कोई आसान नहीं था। राजनीति के अतीत में जाकर देखें तो उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक शक्तिशाली नेता मुलायम सिंह यादव ने कभी कांग्रेस के चक्रवर्ती नेता राजीव गांधी को यूं ही प्रभावित नहीं किया हुआ था। राजीव गांधी और मुलायम सिंह यादव में बहुत दांत काटी दोस्ती थी, जिसकी पुष्टि जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद से की जा सकती है, जिनके दिल्ली में घर पर अक्सर राजीव एवं मुलायम घंटों साथ-साथ बैठकर राजनीतिक सामाजिक चर्चाएं किया करते थे।
यूपी में मुलायम सरकार को कांग्रेस का भी समर्थन मिल चुका है। अपनी उपेक्षा से नाराज कांग्रेसी नेताओं ने मुलायम सरकार से समर्थन वापसी की बहुत कोशिशें कीं थीं लेकिन राजीव गांधी से मजबूत संबंधों के कारण मुलायम सरकार को कांग्रेस का समर्थन जारी रहा। उसी घर में किसी ने सोनिया गाधी का विश्वास हासिल कर मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को इस लोकसभा में लगातार प्रभावहीन और निस्तेज किए रखा है तो अकेले लालू प्रसाद यादव ने। मुलायम के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के दौर में लालू यादव ने कांग्रेस से हाथ मिलाया। कांग्रेस भी मुलायम के मुकाबले पर एक राजनीतिक विकल्प चाहती थी, जिसकी जरूरत लालू ने पूरी कर दी और मुलायम को काफी हद तक यूपी में ही रोक दिया। मुलायम वामदलों के काफी करीब माने जाते
रहे हैं जिन्हें लालू यादव ने इस बात पर राजी करने में सफलता प्राप्त की कि वह उनकी चिंता किए बिना परमाणु मामले पर केंद्र सरकार और कांग्रेस के साथ चलें। यहां भी उन्होंने वामदलों से मोह का एक तीर चलाया कि वामदल अगली लोकसभा में भी फिर से यूपीए के साथ आ जाएंगे।
फिलहाल लालू यादव ने यूपीए सरकार के विश्वासमत के खिलाफ वोट
करने पर और सरकार गिराने की कोशिश करने पर वामदलों को पटकनी
देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे लालू यादव और ज्यादा
ताकतवर बनकर उभरे हैं। इस बार मुलायम सिंह यादव इन्ही लालू
यादव के एक संकटमोचक सहयोगी के रूप में साथ दिखाई दिए और चार
साल बाद सपा के सांसदों को यूपीए सरकार बचाने का सेहरा भी
बंधा।
बिहार में गंभीर आर्थिक और सामाजिक विषमताओं के कारण वहां कुछ ऐसी चुनौतियां और जटिलताएं हैं जिनमें काम करना हर किसी राजनेता के लिए आसान नहीं है, लेकिन राजनीतिक कला कौशल से शासन करके लालू यादव ने देश की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी है, भले ही उनके कई राजनीतिक फैसले और बयान विवादों में रहे या उन्होंने भी भ्रष्टाचार के अत्यंत गंभीर आरोपों का सामना करते हुए कई बार जेल की हवा खाई हो। वे भ्रष्टाचार के आरोपों से तिलमिलाकर अंट का शंट नहीं बोले जबकि मुलायम सिंह यादव की यह सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती है। एक विख्यात राजनेता का भ्रष्टाचार मामलों में जेल जाना, उसके राजनीति जीवन के लिए मुश्किल हो जाता है। इसके बावजूद लालू यादव का भारत के भावी प्रधानमंत्रियों की दौड़ में कई बार गंभीरता से नाम सामने आया है। देश के कई राज्यों के पूर्व मुख्यमंत्री बगैर भ्रष्टाचार के आरोपों के ही देश और अपने प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य से बाहर हैं। लालू यादव तो चौबीस घंटे विवादों में ही रहते आए हैं और देश में विभिन्न राजनीतिक दिग्गजों और गठबंधनों के सामने लगातार अपनी राजनीतिक चुनौती कायम किए हुए हैं। उत्तर भारत में पिछड़ों की राजनीति पर अब अगर किसी राजनीतिज्ञ ने सर्वाधिक कब्जा किया है तो वह लालू यादव ही माने जाते हैं।
लालू प्रसाद यादव
और
मुलायम सिंह यादव एक दूसरे के प्रबल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाते
रहे हैं। मुलायम उत्तर प्रदेश में अपना अच्छा खासा जनाधार तो रखते हैं लेकिन राजनीति कला कौशल और जनसंपर्क में वे लालू का सामना कभी नहीं कर पाए हैं। जबकि बिहार में यूपी से कहीं अधिक गंभीर समस्याएं हैं। यह तब है, जब लालू, मुलायम के बाद देश के राजनीतिक परिदृश्य पर आए हैं। राजनीति के इस निराले व्यक्तित्व को लेकर प्रबंध संस्थानों, हालीवुड-बॉलीवुड और मीडिया में जो उत्सुकता पैदा हुई वह देश के किसी और राजनेता के लिए नहीं देखी गई। आधुनिक शिक्षा एवं फर्राटेदार अंग्रेजी शैली का लालू ने बखूबी सामना किया है। वे उन आर्थिक प्रतिष्ठानों के आदर्श के रूप में उभरे हैं जो अपने यहां की प्रगति के लिए अत्यंत महंगे प्रयोग करते रहे हैं। लालू ने भारतीय रेल को देश की प्रगति से जोड़ा और उसके मुनाफे को दुगना-तिगुना बढ़ाकर दुनिया के सामने प्रबंधन की चुनौती पेश की। यहां बात लालू के सामान्य प्रबंधन और उसकी सफलताओं की हो रही है जिसकी आज देश भर में चर्चा है।
यह माना जाता है कि मुलायम
सिंह यादव सत्ता में आते ही वह अपने संघर्ष के साथियों से अलग-थलग पड़ जाते हैं और उन लोगों से घिर जाते हैं जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए उनके पास लगते हैं। अभी तक का यही इतिहास है कि मुलायम ज्यादातर ऐसे ही लोगों के संपर्क में रहते आए हैं जिस कारण उन्होंने अपने कई अत्यंत विश्वासपात्र और वफादार लोगों को गंवाया है। जब भी वे सत्ता में रहे तो इसी कारण सत्ता से बाहर हुए। मुलायम ने अपनों की हमेशा भारी उपेक्षा की है। उनके करीबी लोग कहा करते हैं कि अभी भी मुलायम में अपने और पराए की अधिक समझ नहीं है, इसके लिए वे दूसरों की राय पर ही निर्भर रहते हैं। इसीलिए मुलायम, कांग्रेस से भी अलग-थलग पड़ गए
थे। उन्होंने कांग्रेस के समर्थन के चलते दूसरी पंक्ति के नेताओं को भी अपने व्यवहार से काफी नाराज किया जिससे मौजूदा समय में उनका कांग्रेस में भी कोई शुभचिंतक नहीं
रह गया था। इसका पूरा लाभ लालू यादव ने उठाया। लालू में अपने पराए की गजब की समझ और जनता के करीब बने रहने के विशेष गुण माने जाते हैं।
यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि लालू के कांग्रेस के साथ रहने के कारण वामपंथी भी ‘दुविधा’ में रहते आए हैं। एटमी करार पर मामला फंसने पर लालू सामने आए। आगे देखिएगा कि वामपंथियों के यूपीए से अलग हो जाने के बावजूद वह इन्हीं वामपंथियों को फिर से यूपीए में वापस लाने में अपनी निर्णायक भूमिका निभाएंगे। जितनी बार भी वामपंथियों ने यूपीए सरकार को दबाव में लेकर कांग्रेस को सड़क पर लाने की कोशिश की उसमें वामपंथियों को काबू करने में लालू यादव की भूमिका महत्वपूर्ण रही अन्यथा मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए का केंद्र की सत्ता में बने रहना बहुत मुश्किल था। यह इसलिए भी ज्यादा मुश्किल था कि समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव का कांग्रेस से तीखा झगड़ा रहा है और वामपंथी कांग्रेस से ज्यादा मुलायम सिंह यादव के अधिक करीबी माने जाते
रहे हैं। भले ही उन्होंने यूपीए में रहने के सवाल पर मुलायम सिंह यादव की भी उपेक्षा की हो। वामपंथी यह जानते हैं कि बिहार में लालू ने भाजपा को रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लालू की राजनीतिक सफलताओं में एक महत्वपूर्ण सफलता के रूप में यह दर्ज है कि उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री रहने के दौरान लालकृष्ण आडवाणी के रथ को बिहार के समस्तीपुर में ही रोक दिया था। भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को बिहार में गिरफ्तार किया और बिहार में उसकी कोई हिंसक प्रतिक्रिया भी नहीं हुई। जबकि उस समय बाबरी मस्जिद आंदोलन के कारण यूपी सुलग रहा था। मुलायम सिंह यादव इस मुद्दे के सांप्रदायिककरण को रोकने में पूरी तरह विफल रहे। यूपी में मुलायम शासनकाल में एक समय ऐसा आया जब पूरे उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में भी कुछ क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पड़ा था। वहां अयोध्या का रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मुद्दा अपना सर नहीं उठा पाया। आडवाणी की गिरफ्तारी बिहार में आग लगा सकती थी, लेकिन लालू यादव ने ऐसी रणनीति से काम लिया कि बिहार तब पूरी तरह शांत रहा। राजनीति के दिग्गजों और विश्लेषकों ने उस समय इसे लालू की बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक सफलताओं में शामिल किया।
लालू यादव
ने पंद्रह साल बिहार पर शासन किया है जबकि मुलायम सिंह यादव स्थाई रूप से अपनी सत्ता को कायम नहीं रख सके। इसीलिए लालू को हमेशा राजनीति का हीरो कहा जाता है। लालू के राजनीतिक दांव आज के राजनीतिक माहौल में नव राजनीतिज्ञों के लिए एक पाठ्यक्रम से कम नहीं कहे जा सकते। लालू को कब लल्लू कब लालू प्रसाद और कब लालू प्रसाद यादव बनना है इसकी कला उन्हें बखूबी आती है। बालीवुड से हालीवुड और खेल खेती खलिहान तक सब जगह लालू यादव का वर्चस्व है। ऐसे कम ही राजनेता हैं जिनके हाव-भाव स्वभाव और कार्यशैली को लेकर न केवल फिल्मों के निर्माण हुए हैं बल्कि साहित्य के व्यंग्यकारों को लिखने के लिए अच्छा खासा मसाला मिला है। लालू के नाम पर कंपनियों ने अपने उत्पाद बेच लिए। लालू की होली और छठ को कवर करने के लिए रिपोर्टर कैमरामैन उनके यहां पहुंचते हैं। स्वभाव में लालू बहुत कम ही उग्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए देखे गए होंगे। उन्होंने गंभीर विषयों पर अपनी शैली में जो प्रतिक्रियाएं दीं वह बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों के सर से उतर गईं। राजनीतिक बयानों के कारण आम तौर पर आम राजनीतिज्ञों को भारी कीमत चुकानी पड़ी है लेकिन लालू यादव के राजनीतिक बयान हमेशा मुनाफे में रहे हैं। लालू अपने बयानों के मार्फत एक साथ कई संदेश देते हैं। उनके मुख से निकला अनायास वाक्य भी कभी-कभी उनके लिए बड़ी अच्छी उपलब्धि और मीडिया के लिए खबर बनता है।
मीडिया ने भी लालू की राजनीतिक चपलता और कुशलता को माना है। राजनीतिक विरोधियों के लिए कही गई बातें अक्सर अगले ही पल उन्हें घेर तो लेती हैं लेकिन लालू बड़ी चतुराई से उस घेरे से अपने को बाहर भी निकाल लाते हैं। उनकी पाकिस्तान यात्रा काफी चर्चा में रही और पाकिस्तान में उनकी बातों को लोगों ने बहुत ही सकारात्मक तरीके से लिया। आज कितने ऐसे राजनेता हैं जिनका कि लोग फिल्मी कलाकारों और क्रिकेट खिलाडि़यों के आटोग्राफ लेने की तरह से धक्कामुक्की करते हैं? ऐसा लालू के लिए ही होता है। पाकिस्तान में बहुत से बच्चे छात्र और वहां के नागरिक तो लालू से केवल उनका आटोग्राफ लेने के लिए उनसे मिलने आए थे। अभी उन्होंने एक और शगूफा छोड़ दिया है जिसे मीडिया ने तुरंत लपक लिया। लालू यादव ने भविष्यवक्ता की भूमिका निभाते हुए बड़ी चतुराई से लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री की दावेदारी पर ज्योतिषीय अंदाज में हमला कर दिया। उन्होंने कहा कि आडवाणी कभी भी इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। क्या यह बात उन्होंने अपने ज्योतिषीय ज्ञान पर कही है तो झट से लालू बोल पड़े कि हां। मीडिया शुरू हो गया कि लालू ज्योतिष विद्या भी जानते हैं। इसके भी दो मतलब हैं और दोनों ही सटीक हैं। लालू ने अपने इस राजनीतिक बयान को किस प्रकार ज्योतिष से जोड़ दिया यही उनके राजनीतिक कौशल का एक नमूना है।
देश की नई पीढ़ी के सामने राजनीति एक संक्रमण से गुजर रही है। उसके सामने आज राजनीतिज्ञ जिस प्रकार का बर्ताव कर रहे हैं इस पीढ़ी के लिए यही राजनीतिक पाठ्यक्रम है। उसके सामने से देश के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और आजादी के तीन दशक बाद के नेताओं के बारे में कुछ भी नहीं मालूम हैं और न ही उनके बारे में बताया जा रहा है जिससे नई पीढ़ी ज्यादातर देश के पचास साल के राजनीतिक इतिहास से अनभिज्ञ है। वह राजनीति को अपराध से जोड़कर देखती है जिससे उसकी राजनीति में दिलचस्पी घट रही है। उसमें मनुष्य की अनंत महत्वाकांक्षाओं के शानदार उत्तर दान के रूप में समझी जाने वाली ‘राजनीति’ में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। देश के अपराधी ही इसे अपनी बपौती और अपने बचाव का हथियार बनाए हुए है।
राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को पता ही नहीं है कि वे 11 जून को 61 वर्ष के हो गए हैं। पटना में इकसठ टोकरियों में लालू के फोटो लगे लाल-गुलाबी आम और हज़ारों के हुजूम, पार्टी मुख्यालय पर दरिद्रनारायण भोज और सैकड़ों लोगों के बीच उनकी अर्द्घांगनी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने उन्हें जब गुलाब का खिलखिलाता हुआ फूल भेंट किया तो लालू यादव कहने लगे कि उन्हें खुद नहीं पता है कि वे उम्र की इकसठवीं दहलीज पर पहुंच गए हैं। बोले कि एस्टीमेट पर ही लोग जन्म दिन मनाते हैं, उम्र ज्यादा भी हो सकती है और कम भी। काश! राजनीति की नई पीढ़ी लालू प्रसाद यादव जैसे राजनेताओं को ऐसे ही चतुराई भरे सवाल-जवाब के साथ पढ़े, क्योंकि इसीलिए लालू अपने में एक पाठ्यक्रम माने जाते हैं।
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