हिंदी कवियों लेखकों की जन्मशती

 

वाराणसी। महादेवी वर्मा, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी और हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती मनाई जा रही है। साहित्य अकादमी इस अवसर पर इनके रचना संसार की समीक्षा करेगी। इसके लिए राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों के आयोजन की तैयारी है। खास बात यह है कि ये आयोजन रचनाकारों से जुड़े स्थलों पर ही किए जाएंगे।
महादेवी वर्मा की जन्मशती दिल्ली में 28 से 30 मार्च तक मनाई गई। विद्वानों ने उनके रचना संसार का पुनरावलोकन किया। बलिया में जन्में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का समय शान्ति निकेतन और काशी में बीता। उनके रचना संसार पर चर्चा के लिए अकादमी ने काशी को चुना। यहां 20 और 21 मई को राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी पर गुजरात के बल्लभ विद्यानगर में संगोष्ठी आयोजित करने की अकादमी की योजना है। रामधारी सिंह दिनकर की जन्मशती पर बड़ा आयोजन करने की तैयारी है। दिल्ली में अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी होगी। वरिष्ठ साहित्यकार और साहित्य अकादमी में हिंदी के संयोजक डॉ विश्वनाथप्रसाद तिवारी ने बताया कि सरकार चाहती है कि दिल्ली में कोई बड़ा आयोजन हो। सितम्बर-अक्टूबर माह तक दिल्ली में अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी तो होगी ही। पटना अथवा मुजफ्फरनगर और भोपाल में भी संगोष्ठियाँ आयोजित की जाएंगी।
आधुनिक जनकवि डॉ हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती का आयोजन इलाहाबाद या मुम्बई में करने पर विचार चल रहा है। अकादमी के उपसचिव डॉ ब्रजेंद्र त्रिपाठी का कहना है कि हमारा प्रयास है कि अकादमी की गतिविधियाँ देश भर में हों ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ सके। इसीलिए पिछले दिनों अकादमी ने हिंदी परामर्श की बैठक हिमाचल में आयोजित की।

‘बच्चन’ की स्मृति में ‘बच्चन’

मुंबई। बालीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की योजना अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की याद में स्मारक बनाने की है। वह मानते हैं कि जाने माने हिंदी भाषा के कवि बच्चन के साहित्य में किए गये योगदान को चुनौती नहीं दी जा सकती। बच्चन ने कहा कि हम उनकी याद में कुछ करना चाहते हैं। चाहे वह उनकी याद को बनाये रखने के लिए ही शोध अथवा अन्य किसी क्षेत्र से जुड़ा हो लेकिन हमारी योजना कुछ करने की है।

पश्तो भाषा गांधी पर पहली किताब

काबुल। हिंसा की आग में झुलस रहे अफगानिस्तान में अंहिसा के पुजारियों की भी कमी नहीं है। ऐसे ही एक पुजारी हैं 50 वर्षीय प्रोफेसर एके राशिद। वह पश्तो भाषा में महात्मा गाँधी पर किताब लिखने में व्यस्त हैं। उनका कहना है कि यह पश्तो भाषा में गाँधी पर उनकी पहली किताब होगी। दुनिया के कुछ सबसे भीषण गृहयुद्धों में से एक के साक्षी रहे राशिद ने अपने जिन्दा शहर काबुल को खंडहर मे तब्दील होते देखा है। शायद यही कारण है कि वह अपने देश के लोगों को एक बार फिर गाँधी से परिचित कराने का बीड़ा उठा रहे हैं।

ज्ञान बढ़ा रहे हैं सांसद

नई दिल्ली। इन दिनों महँगाई में सांसदों की दिलचस्पी अचानक ही बढ़ गई है। संसद में इस मुद्दे पर बहस में उनकी रुचि भले न हो, लेकिन इस बारे में ज्ञान जुटाने के लिए वे जरूर मेहनत कर रहे हैं। संसद के पुस्तकालय के रिकार्ड कुछ ऐसे ही संकेत दे रहे हैं। संसद के पुस्तकालय से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि हाल के दिनों में सांसद खाद्य सुरक्षा, खाद्यान्न संकट, कच्चे तेल का बाजार, जैविक ईंधन और इनसे सम्बन्धित सामग्री वाली पुस्तकों की खूब माँग कर रहे है।

क्या आप पाँचवीं पास हैं?

नई दिल्ली। एनसीईआरटी की एक रिपोर्ट के अनुसार पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाले 45 प्रतिशत बच्चों को गणित का सामान्य जोड़-घटाना नहीं आता। जबकि विज्ञान के बच्चों की स्थिति और भी बदतर है। इस खुलासे के बाद विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी फौज तैयार करने का सरकारी सपना तो चूर हो गया। अब सर्वशिक्षा अभियान के अन्तर्गत होने वाली नियुक्तियों में यह सुनिश्चित किया जायेगा कि प्रत्येक तीन शिक्षकों की नियुक्ति की स्थिति में एक विज्ञान और एक गणित के अध्यापक की नियुक्ति अवश्य की जाय, तभी भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक प्रतिभाओं का विकास सम्भव हो सकेगा।

पुस्तक व्यवसायी अधिवेशन

वाराणसी। सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी में पूर्वांचल पुस्तक व्यवसायी परिषद् का इस जून में प्रथम अधिवेशन हुआ। अधिवेशन में पहली बार पूर्वांचल—वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर, मऊ, भदोही, आजमगढ़, बलिया, मिर्जापुर, ओबरा आदि क्षेत्रों के प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं ने परस्पर विचार-विमर्श किया। वाराणसी के चौकाघाट पर मकबूल आलम रोड स्थित सांस्कृतिक-संकुल में वरिष्ठ पुस्तक व्यवसायी बंधुओं का सम्मान किया गया।

बौद्धिक -साहित्यिक चोरी

वाराणसी। पिछले दिनों काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विज्ञान-संकाय के एक विभाग के प्रोफेसर ने अपने एक सहयोगी शिक्षक के खिलाफ शोध के आँकड़े चुराने का आरोप लगाया। जाँच हुई, आरोप सही पाया गया। लेकिन दोषी को सजा के मामले में विश्वविद्यालय अक्षम साबित हो गया। इस घटना के बाद ही परिसर में बौद्धिक-सम्पदा की चोरी पर बहस हुई। इसी बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्णय लिया कि निर्धारित मानकों के हिसाब से शोध या आँकड़े चोरी का आरोप सिद्ध होने पर शिक्षकों की तीन वेतनवृद्धि पर रोक, प्रशासनिक दायित्व से वंचित कर दस वर्षों के लिये शोध कार्य पर पाबंदी भी लगायी जा सकती है। इसी तरह साहित्यिक-चोरी के दोषी छात्र के शोध प्रबन्ध निरस्त करने, छात्रवृत्ति रोकने और भविष्य में दाखिले या नियुक्ति पर भी रोक लगा दी जायेगी।

संस्कृत में गणित, एक प्राचीन दुर्लभ ग्रंथ

कोलकाता। संस्कृत में अंकगणित पर लिखी गई सबसे पुरानी रचना ‘बख्शाली पांडुलिपि’ है जिसे सम्भवतः सातवीं शताब्दी में संकलित किया गया होगा। इसे किसने संकलित किया, इसका कोई उल्लेख नहीं है। कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी ने ‘गणितावली’ नामक ग्रन्थ का प्रकाशन करवाया है। इस ग्रन्थ की पुष्पिका से इतना जरूर पता चलता है कि सुखदास नामक एक कायस्थ ने रामपालदेव के शासनकाल में शक संवत 1615 या 1715 में यह पूरी सामग्री कहीं से हासिल की थी। इस सामग्री की एक अद्वितीय प्रति एशियाटिक सोसाइटी के संग्रह में सुरक्षित है। यह पूरी सामग्री बांग्ला में नहीं, देवनागरी लिपि में लिखी हुई है।
ग्रन्थ के शुरुआती पन्नों में कई खामियां हैं, हालांकि बाद के पन्नों में अधिकांश सामग्री सुवाच्य है।
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के सरस्वती भवन के विभूतिभूषण भट्टाचार्य ने इस सामग्री का सम्पादन किया, लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि उनका देहान्त हो गया। अन्ततः मानबेंदु बनर्जी और प्रदीप कुमार मजूमदार ने अंकगणित, प्रारम्भिक रेखागणित और क्षेत्रमिति (मापन) की सामग्री वाले इस ग्रन्थ का सम्पादन किया। यह ज्योतिषियों की हैण्डबुक है जिसमें गणित व खगोल शास्त्र के कुछ विषय शामिल हैं। इस ग्रन्थ के अज्ञात लेखकों ने अपने शुरुआती वाक्यों में साफ कर दिया है कि यह पुस्तक उन कायस्थों या हिसाब-किताब रखने वालों के लिए है जो गणित का बेहद प्रारम्भिक ज्ञान हासिल करना चाहते हैं।
यह ग्रन्थ कारिका के रूप में लिखा गया है और छह अध्यायों में विभाजित है। सबसे पहले अध्याय में प्रस्तावना दी गई है जो इस ग्रन्थ को लिखे जाने के उद्देश्य पर प्रकाश डालती है। दूसरा अध्याय ‘संख्याविधान’ है जिसमें विभिन्न संख्याओं में मापन का उल्लेख किया गया है। इसकी शुरुआत ‘यव’ (जौ के बीज) से होती है। फिर ‘अंगुली’, वितस्ति या बालिश्त, हस्त डंडा (लट्ठा) जैसे मापों का वर्णन किया गया है। फिर कोस और योजन का उल्लेख है। इसके बाद वजन के मापों का वर्णन है, खासकर चावल के वजन करने वाले माप। सुनारों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मापों जैसे गुंजा, माशा, कर्शा और पल का भी उल्लेख किया गया है।
समय की माप के बारे में काफी रूखे ढंग से वर्णन किया गया है। इसके अनुसार एक दिन में 30 मुहूर्त होते हैं, जबकि 30 दिनों से एक माह और 12 माह से एक साल बनता है। इसमें कुछ ऐसी मापें भी दी गई हैं जो अब प्रचलन में नहीं हैं जैसे वराटका, गंडक या गंडिक, काकिणी, पण, डल्लक इत्यादि। रोचक बात है कि घटीमान, द्रम्मकेदार और दीनार का भी उल्लेख है। तीसरे अध्याय का नाम है ‘परिभाषाविधि’ जिसमें खासकर रेखागणित और अंकगणित से जुड़ी तकनीकी शब्दावली दी गई है। जैसे काया (सम्पूर्ण पिंड), अंशक (भाग), चेद, विश्कंभ, परिधि, भाजक, हरक इत्यादि। चौथा अध्याय ‘परिक्रमाविधि’ विभिन्न अंकगणित समीकरणों व सूत्रों को समर्पित है। पाँचवें अध्याय का नाम ‘व्यवहारविधि’ है जिसमें कई प्रकार के नियम जैसे तीन का नियम, पांच का नियम, गुणन, चक्रवृद्धि ब्याज की गणना आदि को समझाया गया है। साथ ही चतुर्भुज, त्रिभुज, वृत्त इत्यादि के बारे में भी संक्षेप में बताया गया है। छठवें अध्याय में उदाहरणों के जरिए विभिन्न नियमों को समझाने का प्रयास किया गया है।
इस ग्रन्थ में कई कमियाँ निकाली जा सकती हैं। इसके बावजूद कहना पड़ेगा कि यह ग्रन्थ हजारों साल पहले उत्तर भारत में प्रचलित गणित के अध्ययन की एक झलक तो दिखलाता ही है।
भारतीय शैक्षणिक सेवा क्यों नहीं?
पहली बार यह सवाल उठा है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर भारतीय शैक्षणिक सेवा क्यों नहीं? यह सवाल प्रसिद्ध साहित्यकार समीक्षक डॉ नामवर सिंह ने उठाया है जो विश्वविद्यालयों में व्याप्त शैक्षणिक भ्रष्टाचार पर आक्रोश व्यक्त करते हैं। इस प्रश्न की सापेक्षता में कवि-समीक्षक अशोक वाजपेयी का कहना था कि आज का छात्र ‘अपडेट’ है, वह विषय को पूरी तरह हृदयंगम करने के लिये अध्यापक से भी वैसी ही अपेक्षा रखता है, जबकि शिक्षा-संस्थानों में स्थितियाँ विपरीत हैं। डॉ नामवर सिंह इन स्थितियों की भयावहता बतलाते हुए कहते हैं कि इन सवालों पर बहस होनी चाहिए और जितना जल्दी हो सके सरकार को आईएएस की तर्ज पर इंडियन एजुकेशनल सर्विसेज़ के बारे में भी सोचना चाहिए। तभी विश्वविद्यालयों के चरित्र एवं शैक्षणिक स्तर में परिवर्तन हो सकेगा।

पाँच कहानियों की रंगमंचीय प्रस्तुति

नई दिल्ली। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली ने अपने विशेष कार्यक्रम के तहत हिंदी की पाँच श्रेष्ठ कहानियों का सफल मंचन किया जो प्रबुद्ध दर्शकों के बीच आकर्षण का केन्द्र रहा। मंचन की प्रेक्षकों में पर्याप्त चर्चा और सराहना रही। मंचन के लिए चुनी गयी कहानियाँ थीं—यशपाल की ‘परदा’, उषा प्रियंवदा की ‘अकेली राह’, मिथिलेश्वर की ‘बाबूजी’, असगर वजाहत की ‘अपनी-अपनी पत्नियों का सांस्कृतिक विकास’ तथा गंगाप्रसाद विमल की ‘इन्तजार में घटना’। एनएसडी के इस आयोजन का एक बड़ा आकर्षण यह रहा कि लगातार छह दिनों तक हर शाम पाँचों कहानियों का मंचन होता रहा। दर्शकों की रुचि के तहत दो दिन दोपहर में भी अतिरिक्त मंचन हुआ। हर दिन एक साथ पाँच कहानियों के मंचन की अभिनव प्रस्तुति।

‘विदेशों में हिंदी शिक्षण’ संगोष्ठी

नई दिल्ली। जय-जयवंती संस्था की ओर से नई दिल्ली के इण्डिया हैबिटेट सेण्टर में जयजयवंती साहित्य संगोष्ठी की नवीं कड़ी ‘विदेशों में हिंदी शिक्षण’ आयोजित की गई, जिसके मुख्य अतिथि पूर्व राज्यपाल डॉ भीष्मनारायण सिंह थे तथा अध्यक्षता पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय के प्रो सुरेन्द्र गम्भीर ने की। कार्यक्रम में विदेश मंत्रालय की हिंदी उपसचिव मधु गोस्वामी तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की प्रो वशिनी शर्मा ने अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि डॉ रामदरश मिश्र को ‘जयजयवंती सम्मान’ से सम्मानित किया गया, जिसके अन्तर्गत ब्रज कला केन्द्र के सौजन्य से लैपटॉप कम्प्यूटर तथा हिंदी सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस के सौजन्य से हिंदी सॉफ्टवेयर प्रदान किए गए।

‘उत्तरांचल की कहानियाँ’

मुंबई। मुम्बई में डा राजेश्वर उनियाल सम्पादित ‘उत्तरांचल की कहानियाँ’ का विमोचन भारत सरकार के पूर्व मंत्री श्रीराम नाईक ने किया। उत्तरांचल सरकार में योजना आयोग के उपाध्यक्ष डॉ मोहन सिंह रावतजी ‘गाँववासी’ विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

‘हमारे क्रांतिकारी विचारक’

तिरुवनंतपुरम। दूरसंचार विभाग की हिंदी सलाहकार समिति की बैठक में प्रसिद्ध कवि-साहित्यकार ‘खनन भारती’ के पूर्व सम्पादक एवं दूरसंचार विभाग की केंद्रीय हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य राजेन्द्र पटोरिया की पुस्तक ‘हमारे क्रांतिकारी विचारक’ का विमोचन संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री डॉ शकील अहमद ने किया।

मुरली मनोहर जोशी की पुस्तक

नई दिल्ली। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ मुरलीमनोहर जोशी के भाषणों के संकलन ‘साइंस सस्टेनेबिलिटी एण्ड इण्डियन नेशनल रिसर्जेंस’ का श्री सत्य साँईं बाबा इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में विमोचन हुआ। एमजीके मेनन ने पुस्तक का विमोचन करते हुए मुरलीमनोहर जोशी को एक महान भौतिकशास्त्री बताया।

‘शताब्दी के पाँच काले पन्ने’

जबलपुर। अनिल माधव दवे लिखित पुस्तक ‘शताब्दी के पाँच काले पन्ने’ पुस्तक का विमोचन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भावी पीढ़ी के लिए यह पुस्तक पथ-प्रदर्शक होगी। दवे ने कहा कि यह पुस्तक भारतीय मानस की भूलने की कमजोरी को ध्यान में रखकर लिखी गई है।

मेरठ में लोकार्पण एवं गोष्ठी

मेरठ। भारतीय साहित्य परिषद् के तत्वावधान में मेरठ में आयोजित लोकार्पण समारोह में डॉ शैल के प्रकाशित गीत-कविता संग्रह ‘हीरकनी मुस्कान’ का लोकार्पण प्रसिद्ध गीतकार भारत भूषण ने किया। अध्यक्षता की प्रो वासुदेव शर्मा ने तथा संचालन का दायित्व निर्वाह किया कथाकार-आलोचक डॉ सतीशराज पुष्करणा ने। इस अवसर पर डॉ शैल प्रणीत गद्य-गीत संग्रह ‘कुछ बिखरी-सिमटी यादें’ का लोकार्पण प्रख्यात कवयित्री डॉ सुधा गुप्ता ने किया।

‘ॐ पूर्णमदः’ का लोकार्पण

दिल्ली। आचार्य यादकुमार वर्मा कृत ‘ॐ पूर्णमदः’ काव्य-ग्रन्थ का लोकार्पण भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् के अध्यक्ष तथा संसद सदस्य डॉ कर्ण सिंह ने किया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि मॉरीशस के राजदूत मुखीश्वर चूनी ने लोकार्पित पुस्तक के सन्दर्भ में अपने देश में प्रचारित वैदिक साहित्य की चर्चा की।

कानपुर में कथा साहित्य पर गोष्ठी

कानपुर। ‘वर्तमान समाज का संकट और कथा साहित्य’ पर मेधाश्रम संस्था के तत्वावधान में प्रेस क्लब, कानपुर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरेण्य साहित्य सेवक वात्स्यायन ने कहा कि विगत समय में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम घटनाएँ घटी हैं और साहित्य इनसे अछूता नहीं रह सकता है। युवा साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के इस दौर में साहित्य को संवेदना के उच्च स्तर को जीवन्त रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप में समेटकर देखना चाहिए। साहित्यकार के सत्य और समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। ‘पुनर्नवा’ के संयोजक एवं कथाकार राजेन्द्र राव ने कहा कि कथा साहित्य पर आया संकट तात्कालिक है। प्रेमचंद के जमाने में भी साहित्य पर संकट आया था, लेकिन उसमें संवेदना खत्म नहीं हुई थी।

आधुनिक हिंदी पर संगोष्ठी

मुंबई। सोनुभाऊ बसवंत कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, शहापुर के हिंदी विभाग और महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुम्बई के संयुक्त तत्वावधान में ‘आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में आंचलिक बोध’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गयी। उद्घाटन सत्र में उद्घाटक के रूप में हिंदी के प्रख्यात समीक्षक डॉ शिवकुमार मिश्र उपस्थित थे। सत्र की अध्यक्षता मुम्बई विश्वविद्यालय की पार्वती व्यंकटेश जी ने की। हिंदी की प्रख्यात कथा लेखिका सूर्यबाला, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष श्री नंदकिशोर नौटियाल जी इस अवसर पर उपस्थित थे। प्रपत्र वाचकों में गोवा से आये डॉ एपी त्रिपाठी, उज्जैन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग अध्यक्ष डॉ शैलेन्द्र कुमार शर्मा, मुम्बई से डॉ शशि मिश्र और डॉ सतीश पाण्डेय उपस्थित थे। यह संगोष्ठी तीन सत्रों में चली।

भगत सिंह पर संगोष्ठी

दार्जिलिंग। जनवादी लेखक संघ दार्जिलिंग जिला समिति ने मिश्र सम्मेलिनी में भगत सिंह के व्यक्तित्व एवं विचारों को केन्द्रित करके सेमिनार तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया। सेमिनार सत्र में जलेस जिला अध्यक्ष दिलीप सिंह, सचिव ओमप्रकाश पाण्डेय, साहित्यकार महेन्द्र सिंह पुनिया, डॉ दिलीप सरकार, डॉ पार्थ सारथी दास, जीएस होश, गणेश त्रिपाठी, नंद दुला देवनाथ, डॉ अरुण होता, डॉ मनीषा झा तथा मुन्नालाल प्रसाद ने कहा कि साम्राज्यवादी वैश्वीकरण और देशी-विदेशी पूँजीपतियों के लूट-खसोट के इस भयानक दौर में भगत सिंह के विचार काफी प्रासंगिक हो गये हैं। विशेष रूप से धार्मिक अन्धविश्वास, साम्प्रदायिकता, जातीय आतंकवाद, देशी शासक वर्ग के चरित्र तथा जनता की मुक्ति के लिए क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण को लेकर भगतसिंह के विचार पूर्णतः प्रेरक तथा सार्थक हैं। भगत सिंह के विचार आज भी प्रासंगिक हैं, उनके विचारों को जानना, आत्मसात् करना तथा क्रान्तिकारी वर्गों की भूमिका को रेखांकित करना जरूरी है।

अस्मितादर्श साहित्य सम्मेलन

मुंबई। अस्मितादर्श साहित्य सम्मेलन का आयोजन अम्बेडकरीय साहित्य प्रबोधिनी, चन्द्रपुर (महाराष्ट्र) में सम्पन्न हुआ। दो दिवसीय इस सम्मेलन का उद्घाटन राज्य साहित्य संस्कृति मंडल, महाराष्ट्र के अध्यक्ष पद्मश्री मधु मंगेश कर्णिक ने किया। सुप्रसिद्ध दलित साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि ने सम्मेलन की अध्यक्षता की। वरिष्ठ साहित्यकार एवं अस्मितादर्श पत्रिका के सम्पादक गंगाधर पांतावणे ने अस्मितादर्श साहित्य सम्मेलन के आयोजनों की सफलता पर प्रकाश डाला और कहा कि ‘‘डॉ अम्बेडकर विचार से प्रेरित यह आन्दोलन सबका आह्वान करता है।’’
इस अवसर पर अनेक साहित्यकारों को, रोहन नागदिवे (स्थितिचा ओला कोलाज-कविता संग्रह), महेंद्रा सुके (अथांतर-नाटक), विवेक (कहानी-संग्रह), प्रो यादव गायकवाड़ (बौद्ध धम्माची नवी फसल-वैचारिकी), यशोधरा (माझी मी-आत्मकथा), शरण कुमार लिम्बाले (बहुजन-उपन्यास), मुकेश वाल्के (अनुराग-कविता संग्रह), डॉ मच्छिंद्र चोरमारे (तापलेले दिवस-कविता संग्रह) को अस्मितादर्श साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

मॉरीशस में हिंदी पर संगोष्ठी

हिंदी के विश्वव्यापी प्रचार-प्रसार और इसे अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में संवर्धित करने के उद्देश्य से भारत और मॉरीशस के सहयोग से स्थापित ‘विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीशस’ ने एक भव्य संगोष्ठी का आयोजन किया, जिसका विषय था ‘हिंदी की वैश्विक स्थिति और नागरी लिपि’।
इन्दिरा गाँधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र, मॉरीशस के विशाल सभागार में आयोजित समारोह का उद्घाटन मॉरीशस के शिक्षा एवं मानव संसाधन मंत्री माननीय धरम गोकुलजी ने किया। उन्होंने बताया कि मॉरीशस में हिंदी शिक्षा की व्यवस्था प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक है। यहाँ हिंदी को पूर्णतः बढ़ावा दिया जाता है। यहाँ दो विश्व हिंदी सम्मेलन भी हो चुके हैं।
भारत से आमंत्रित डॉ परमानन्द पांचाल ने हिंदी के विश्वव्यापी प्रचार-प्रसार में मॉरीशस की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए मॉरीशस सरकार की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि मॉरीशस में हिंदी तो है और यहाँ अधिकांश लोग हिंदी जानते हैं किन्तु हिंदी दिखाई नहीं देती। सार्वजनिक स्थानों पर सर्वत्र फ्रेंच और अंग्रेजी के ही बोर्ड दिखाई देते हैं। यदि इनके साथ ही हिंदी के भी कुछ साईनबोर्ड लगाए जाएँ तो इससे हिंदी की लोकप्रियता बढ़ेगी।
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में, डॉ परमानन्द पांचाल ने नागरी लिपि के इतिहास, उसकी वैज्ञानिकता और उसके ध्वन्यात्मक गुणों पर विस्तार से प्रकाश डाला और अन्य लिपियों की तुलना में नागरी लिपि की श्रेष्ठता को पावर प्वाइंट की सहायता से सचित्र रूप में प्रदर्शित किया। अगले सत्र की अध्यक्षता डॉ उदयनारायण गंगू ने की। मॉरीशस के कई विद्वानों और प्राध्यापकों ने भी अपने विचार रखे।

राष्ट्रीय मानव संग्रहालय विचार गोष्ठी

भोपाल, राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में आयोजित विचार गोष्ठी में हिंदी भाषा और साहित्य पर वरिष्ठ कवि भगवत रावत, हिंदीसेवी कैलाशचन्द्र पंत, कला समीक्षक विनय उपाध्याय, लेखक डॉ जवाहर कर्नावट, आलोचक युगेश ने मंतव्य प्रकट किए। कैलाशचन्द्र पंत का कहना था कि यदि हम शुद्ध हिंदी या शत-प्रतिशत रूप में हिंदी के प्रयोग न किये जाने और उसमें अंग्रेजी या चालू भाषा के प्रयोग को लेकर चिंतित हैं, तो हमें दूसरी ओर हिंदी के विश्व स्तर पर प्रयुक्त होने पर संतुष्ट होना चाहिए। आज बाजारवाद और भूमंडलीकरण से उपजे सभ्यताओं के संघर्ष में हिंदी को ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के रूप में विश्व मानवता को मनवाने के सौभाग्यशाली संस्कार प्राप्त हैं।

राजस्थान विश्वविद्यालय राष्ट्रीय सेमिनार

जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के हिंदी विभाग के तत्वावधान में ‘21वीं शती का हिंदी साहित्य और वैश्वीकरण’ विषय पर दो दिनी राष्ट्रीय सेमिनार विभाग के सह आचार्य डॉ अनिल जैन के संयोजन में आयोजित किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाशिल्पी डॉ हेतु भारद्वाज ने की। मुख्य अतिथि दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो अजय तिवारी ने बीज वक्तव्य दिया और विशेष अतिथि थीं, राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष प्रो पवन सुराणा, जिन्होंने भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में सांस्कृतिक विचलन की समस्या पर चिन्ता जताते हुए शैक्षणिक पाठ्यक्रम में संस्कृति को समायोजित करने पर बल दिया। बाद के सत्रों में ‘भूमण्डलीकरण और सांस्कृतिक बहुलतावाद’, ‘भूमण्डलीकरण की अवधारणा’ आदि विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किये गये।

मीडिया और विकास

रायपुर। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर की ‘मीडिया एवं विकास’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। उद्घाटन वक्तव्य में ‘अमर उजाला’ समूह सम्पादक शशिशेखर ने कहा, ‘‘मीडिया को गलत बातें प्रकाशित करने से बचने के साथ ही खामियों को सही ढंग से प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी लेनी होगी। तभी मीडिया विकास में अपनी भूमिका निभा पाएगा।’’
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो बीके कुठियाला ने कहा, ‘‘पश्चिमी देशों ने विकास का जो पैमाना तय किया है, वह भारत के सन्दर्भ में ठीक नहीं है।’’ कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पं रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ लक्ष्मण चतुर्वेदी ने कहा, ‘लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ में इतनी ताकत है कि वह समाज एवं देश में सकारात्मक माहौल बनाए।’
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने मीडिया के विकास पर और प्रकाश डाला। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति सच्चिदानंद जोशी ने पत्रकारों, शिक्षकों और छात्रों को जागृत होने पर जोर दिया। कुलसचिव डॉ डीएन वर्मा ने आभार प्रकट किया।

‘कवि ने कहा’ लोकार्पण

किताबघर प्रकाशन ने वर्तमान समय के दस महत्त्वपूर्ण कवियों की चुनी हुई रचनाओं को ‘कवि ने कहा’ शृंखला में प्रकाशित किया है। लोकार्पण समारोह में रचनाकारों के साथ वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी, कवि कुँवर नारायण और केदारनाथ सिंह शामिल हुए। नामवर सिंह ने कहा, ‘‘साहित्य के प्रति लोगों में रुचि बढ़ाने की दिशा में किताबघर का प्रयास सराहनीय है।’’ अशोक वाजपेयी ने कहा, ‘‘मैंने पहली बार ऐसा विशिष्ट प्रकाशन एक साथ देखा है। लोग साहित्य से विमुख हो रहे होते तो प्रकाशक प्रयोगधर्मिता का प्रयास नहीं करते।’’ किताबघर के निदेशक सत्यव्रत ने कहा, ‘‘हमारे संस्थान ने पूर्व में प्रकाशित ‘मेरे साक्षात्कार’ और ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ शृंखला की तर्ज पर ‘कवि ने कहा’ शृंखला प्रकाशित की है। अनामिका, उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल, मदन कश्यप, लीलाधर जगूड़ी, लीलाधर मंडलोई, विजयेंद्र, विष्णु नागर और ऋतुराज के काव्य-संग्रह प्रकाशित किए गए हैं।’’

रॉबिन शा पुष्प की दो पुस्तक

संस्कार भारती द्वारा आयोजित एक समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार रॉबिन शॉ पुष्प की दो पुस्तकों ‘अलग-अलग अहसास’ और ‘यहाँ चाहने से क्या होता है’ का विमोचन डॉ एके ठाकुर ने किया। डॉ शान्ति जैन ने पुस्तकों का परिचय देते हुए बताया कि उनका लेखन पाठकों को संसार का साक्षात्कार कराता है।

हिंदी से लोक साहित्य हुआ समृद्ध

देहरादून। उत्तराखण्ड का लोक साहित्य एवं हिंदी की मुख्यधारा विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए पर्यटन मंत्री प्रकाश पंत ने कहा कि आज वैश्वीकरण का दौर है। लेकिन ऐसे समय में हमें अपने लोक को समझना होगा। हमारी सारी जीवन प्रक्रिया हमारे लोक में है।
वरिष्ठ पत्रकार आनन्द बल्ला उप्रेती ने लोक संस्कृति पर हो रहे बाजारवाद के हमले को घातक बताते हुए सजग रहने का आह्वान किया। डॉ प्रयाग जोशी ने उम्मीद जताई कि इस प्रकार के आयोजनों से उत्तराखण्ड के समृद्ध इतिहास को हिंदी की मुख्यधारा से जोड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि पण्डित नैन सिंह रावत और पण्डित गुमानी को हिंदी के इतिहास में जगह मिलनी चाहिए। जुगल किशोर पेटशाली ने जीवन दर्शन की झाँकी को लोक साहित्य की आत्मा बताया। मनु ढौडियाल ने लोक पर उपभोक्तावादी प्रभाव की चर्चा की। जेएनयू के ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि लोक परम्पराओं और मान्यताओं को अपने भीतर आत्मसात करता है। डॉ ताराचंद्र त्रिपाठी ने उत्तराखण्ड के साहित्यकारों की विस्तृत भूमिका पर प्रकाश डाला।
गिरीश तिवारी गिर्दा ने गीत के माध्यम से कहा कि प्रतिशोध से ही अभिव्यक्ति की शुरुआत होती है। शेरदा अनपढ़ और अलगोजा वादक लालसिंह रावत ने अपनी कर्णप्रिय प्रस्तुति दी। डॉ दिनेश व्यास ने स्लाइड शो द्वारा धारचूला एवं व्यास घाटी के जन-जीवन एवं त्योहारों पर महत्त्वपूर्ण और रोचक जानकारी दी। इससे पूर्व संयोजक वाराणसी के डॉ देवेन्द्र सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए परिचय दिया।
समारोह के अध्यक्ष प्रो डीडी शर्मा ने उत्तराखण्ड के लोक साहित्यकारों का उल्लेख करते हुए उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। डा प्रयाग जोशी ने सीमांत, जनजाति और यहां के लोकसाहित्य, लोकसमाज, संस्कृति पर विचार रखे। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ राम सुधार सिंह ने किया। इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार आनन्द बल्लभ उप्रेती के कहानी-संग्रह ‘घोंसला’ का भी विमोचन किया गया। एमटीआई में ‘उत्तराखण्ड का लोक साहित्य एवं हिंदी की मुख्यधारा’ विषयक संगोष्ठी के दूसरे दिन प्रो० आरसी पंत की अध्यक्षता और प्रो राम सिंह के मुख्य आतिथ्य में संगोष्ठी का समापन हुआ।

गीत शाश्वत है

भोपाल। मूर्धन्य गीतकार डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि गीत शाश्वत और निरन्तर है। वह जीवन है, प्रकाश है, अन्तर का नाद है। वे मध्यप्रदेश लेखक संघ की प्रादेशिक गीत गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। इस अवसर पर आपने अपना मधुर गीत ‘एक बार जाल और फेंक रे मछेरे’ का पाठ कर श्रोताओं को मुग्ध कर दिया। गोष्ठी की अध्यक्षता बटुक चतुर्वेदी ने की।
विशेष अतिथि एलएनसीटी के चेयरमैन जयनारायण चौकसे ने कहा—‘‘वर्षों से मध्यप्रदेश लेखक संघ लेखक भवन के लिये प्रयत्नशील था, मैं घोषित करता हूँ कि मैं लेखक भवन के लिये भूमि दूँगा।’’ इतना सुनते ही नरेश मेहता गोष्ठी कक्ष, करतल ध्वनि से गूँज उठा। गोष्ठी में संस्था के उपाध्यक्षद्वय सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित थे। गोष्ठी का संचालन गीतकार दिवाकर वर्मा ने किया।

दुष्यंत कुमार स्मारक व्याख्यानमाला

भोपाल। भारतीय संस्कृति न तो व्यक्तिवादी है और न समूहवादी। हमारी संस्कृति तो व्यक्तित्ववादी है परन्तु पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर हमारा समाज व्यक्तिवाद पर केन्द्रित होता जा रहा है और यही वजह है कि आज हमारे चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है, और व्यक्ति स्वार्थी होता जा रहा है। ये विचार दुष्यंतकुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय के कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में डा बलदेव वंशी ने व्यक्त किए।
दुष्यंत कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय द्वारा दुष्यंतकुमार के 75वें जन्म वर्ष पर व्याख्यान शृंखला का आयोजन किया गया। जिसकी दूसरी कड़ी के रूप में दुष्यंत संग्रहालय और साहित्य अकादमी दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति डा अच्युतानंद मिश्र की अध्यक्षता में डा बलदेव वंशी, अनुराधा शंकर सिंह, डा मीनाक्षी जोशी एवं विजयकुमार देव ने ‘ये सूरत बदलनी चाहिए’ विषय पर व्याख्यान दिए।

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