जड़ी-बूटियों का ही बचा सहारा

  • राजकुमार श्रीवास्‍तव


दुनिया भर जड़ी-बूटियों का ही बचा सहारामें आम लोगों का झुकाव अब आयुर्वेद, होम्योपैथी और हर्बल दवाओं की तरफ बढ़ रहा है। यह इससे जाहिर होता है कि एलोपैथिक दवा बनाने वाली अनेक कंपनियां ‘हर्बल दवाओं’ के निर्माण में भी अधिक रूचि ले रही हैं। इसके लिए अब उन्हें बड़ी मात्रा में औषधीय वनस्पतियों की आवश्यकता होगी। देश में जड़ी-बूटियों के उत्पादन को बढ़ावा देना होगा, लोगों में और जागरूकता पैदा करनी होगी ताकि वे जड़ी-बूटियों की खेती में रूचि लें, तब कहीं ये विश्व बाजार की आवश्यकताओं को पूरा कर सकेंगी। विश्व में आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का बाजार कोई डेढ़ अरब रुपए का है और जो जड़ी-बूटियां उपलब्ध हैं, उनमें दो-तिहाई का उत्पादन भारत एवं चीन में होता है। जड़ी-बूटियों का यह व्यापार 25 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहा है। भविष्य में जड़ी-बूटियों की बढ़ती मांग और इसके फैलते बाजार की तरफ भारत से ज्यादा विदेशियों की नजरें लगी हैं। अश्वगंधा, नीम, लहसुन, इसबगोल, घी क्वार, जामुन, भृंगराज, तुलसी, काला जीरा, अर्जुन, काली मिर्च, शलाकी, हल्दी, बहेड़ा, ब्राह्मी आंवला जैसी सौ से भी ज्यादा भारतीय जड़ी-बूटियों के विभिन्न औषधीय गुणों के एकाधिकार अमरीका और यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने प्राप्त कर लिए हैं। जड़ी-बूटियां ही नहीं, रसगुल्ला तथा चटनी की विशेष किस्मों के एकाधिकार भी अब इन बड़ी कंपनियों के पास हैं। इसलिए भविष्य में और भी जड़ी-बूटियों और विशेष खाद्य पदार्थों पर एकाधिकार कर इन कंपनियों का इरादा आयुर्वेद बाजार पर कब्जा जमाने का है।
जिस तेजी से बहुराष्ट्रीय कंपनियां अनेक भारतीय जड़ी-बूटियों को पेटेंट करा रही हैं, उससे भारत को अपनी इस अमूल्य संपदा जड़ी-बूटियों के संरक्षण और उत्पादन पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। अपनी जड़ी-बूटियों पर मंडरा रहे खतरों का अहसास भारतीयों को अब हो रहा है। पहले इन्हें भारतीय जंगलों से बेरहमी से नष्ट किया जाता रहा है। यह विडंबना है कि सबसे ज्यादा जैविक संपदा एवं जैव विविधता विकासशील कहे जाने वाले देशों में है लेकिन इन पर सबसे ज्यादा एकाधिकार विकसित कहे जाने वाले अमीर देशों का हो रहा है। इससे पिछड़े देशों पर अमीर देशों की जबरदस्ती बढ़ने का अंदेशा है। एक तथ्य यह भी है कि भारत और चीन जैसे देशों में जैव विविधिता और इससे संबंधित पारंपरिक ज्ञान प्रचलन में तो है लेकिन इनका प्रामाणिक प्रलेखन पूरी तरह नहीं हो पाया है।
भारतीय उपमहाद्वीप में जड़ी-बूटियों के उत्पादन की असीम संभावनाओं के बावजूद फिलहाल भारत में जड़ी-बूटियों की खेती पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पा रही है, हालांकि हिमाचल प्रदेश, उत्तर बिहार, उत्तरांचल, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में जड़ी-बूटियों की खेती की व्यापक योजना बनाई गई है लेकिन इसके क्रियान्वयन में शायद अभी और वक्त लगे। बिहार की कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने लता कस्तूरी, घृतकुमारी, सतावर, तुलसी, पोदीना, सर्पगंधा, अश्वगंधा, कालमेघ, ब्राह्मी, शंखपुष्पी आदि जड़ी-बूटियों की खेती शुरू की है। भारत सरकार के भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होम्योपैथी विभाग के अनुसार देश के 16 जलवायु क्षेत्रों में कोई 50,000 प्रकार के पौधों में 15,000 पौधे औषधीय महत्व के हैं। अनुमान के अनुसार औषधीय पौधों की खेती का विश्व बाजार 600 अरब रुपये का है जिसमें भारत का हिस्सा मात्र पांच सौ करोड़ रुपया है। इसमें अकेले चीन की हिस्सेदारी 160 अरब रुपये की है। भारत सरकार ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर पांच हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। कुछ साल पूर्व राज्यों में ‘स्टेट मेडिसिनल प्लांट बोर्ड’ का गठन किया गया है जिसमें कृषि विश्वविद्यालय, वन एवं पर्यावरण विभाग, कृषि विभाग एवं उद्योग मंत्रालय सहित कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को सदस्य बनाया गया है।
औषधीय एवं जड़ी-बूटियों वाले पौधों के मामले में धनी प्रदेश उत्तराखंड तो जड़ी-बूटी की खेती को उद्योग का दर्जा देने की तैयारी कर रहा था। पता नहीं क्या हुआ। उत्तराखंड की आबोहवा की यह खासियत है कि वहां पैदा होने वाला आंवला आकार में छोटा किंतु विश्व के उच्च कोटि के आंवले की तरह है। यहां औषधीय गुणों वाली कोई 175 जड़ी-बूटियां पहचानी गई हैं। इनमें लगभग 35 जड़ी-बूटियां तो ऐसी हैं जिनके नष्ट होने का खतरा है। इसी वजह से इन जड़ी-बूटियों के दोहन को प्रतिबंधित घ्कर दिया गया है। प्रतिबंध के बावजूद इन दुर्लभ जड़ी-बूटियों का अंधाधुंध दोहन भी जारी है। उत्तराखंड के रूप में नया प्रदेश बनने के बाद वहां की सरकार वनौषधि संरक्षण पर ज्यादा ध्यान दे रही है। उत्तराखंड के जंगलों में अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं जिनसे अनेक गंभीर रोगों की दवा भी बनाई जाती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इस बूटी से बनने वाली दवा लाखों रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकती है। अतीस, हत्थाजड़ी, जटामासी जैसी बहुमूल्य वनौषधियां भी यहां पाई जाती हैं।
हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू कश्मीर के लद्दाख में भी अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भंडार है। यदि राज्य सरकारें एवं केंद्र सूझ-बूझ से काम ले तो भारत जड़ी-बूटियों के मामले में फिर से एक समद्ध राष्ट्र बन सकता है। विश्व में इस समय हर्बल दवाओं और जड़ी-बूटियों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है। हर्बल दवाएं, वनौषधियां, जड़ी-बूटियों आदि के बाजार की विकास दर कोई 25 प्रतिशत है जबकि एलोपैथिक दवाओं की मात्र आठ प्रतिशत। ऐसे में सरकारों पर जड़ी-बूटी के उत्पादन और व्यापार को प्रोत्साहित करने का दबाव बढ़ गया है। जड़ी-बूटियों के साथ-साथ दुनिया में सुगंधित पौधों की भी मांग बढ़ रही है। अनेक एरोमेटिक पौधे भारत में बहुतायत मात्रा में उपजाए जाते हैं। मेंथॉल, हल्दी, तुलसी, कचनार, चंदन, मेंहदी, कपूर, गुलाब जैसे अनेक पौधे औषधि के साथ साथ सुगंध भी प्रदान करते हैं। देशी विदेशी बाजार भी इनकी भी मांग बहुत ज्यादा है। आइए! भारत की इस अमूल्य संपदा का संरक्षण करें और इसे गंभीर से गंभीर रोगों के निदान में सहायक बनाने के लिए इसकी उपज बढ़ाएं।

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