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साम्प्रदायिक सद़भावना के लोकदेवता-गोगाजी
राष्ट्रीय
एकता व सांप्रदायिक सद़भावना का प्रतीक
धार्मिक पर्व गोगामेडी (राजस्थान) में गोगाजी की समाधि स्थल
पर मेला लाखों
भक्तों के आकर्षण का केंद्र है। यह मेला प्रतिवर्ष भाद्रप्रद
में शुक्लपक्ष पर लगता है और पूरे पखवाड़े तक जोर-शोर से चलता
हुआ लगभग एक माह तक चलता रहता है। इस मेले में देश के
कोने-कोने से श्रद्घालु आकर गोगाजी की समाधि पर धोक लगाते हैं
व प्रसाद चढ़ाते हैं।
मध्यकालीन महापुरूष गोगाजी हिंदू, मुस्लिम, सिख
संप्रदायों की सहानुभूति व श्रद्घा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष
लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्व हुए। गोगाजी का
जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरू) चौहान वशं के राजपूत शासक जैबर
की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरू गोरखनाथ के वरदान से भादो शुदी
नवमी को हुआ था। इनके जन्म की भी विचित्र कहानी है। एक किवदंती
के अनुसार गोगाजी का माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान
प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नही मिला। गुरू
गोरखनाथ गोगामेडी के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी
शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हे पुत्र प्राप्ति का वरदान
दिया और कहा कि वे अपनी तपस्या पूरी होने पर उन्हें ददरेवा
आकर प्रसाद देंगे जिसे ग्रहण करने पर उन्हे संतान की प्राप्ति
होगी। तपस्या पूरी होने पर गुरू गोरखनाथ बाछल देवी के महल
पहुंचे। उन दिनों बाछल देवी की सगी बहन काछल देवी अपनी बहन के
पास आई हुई थी। गुरू गोरखनाथ से काछल देवी ने प्रसाद ग्रहण कर
लिया और दो दाने अनभिज्ञता से प्रसाद के रूप में खा गई। काछल
देवी गर्भवती हो गई। बाछल देवी को जब यह पता चला तो वह पुनः
गोरखनाथ की शरण मे गई। गुरू बोले, देवी ! मेरा आशीर्वाद खाली
नहीं जायेगा तुम्हे पुत्ररत्न की प्राप्ति अवश्य होगी। गुरू
गोरखनाथ ने चमत्कार से एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में
दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत भादो
माह की नवमी को गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका
नाम गोगाजी पड़ा।
चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर
और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का राज्य सतलुज सें हांसी
(हरियाणा) तक था। गोगामेडी में गोगाजी का मंदिर एक ऊंचे टीले
पर मस्जिदनुमा बना हुआ है, इसकी मीनारें मुस्लिम स्थापत्य कला
का बोध कराती हैं। मुख्य द्वार पर बिस्मिला अंकित है। मंदिर
के मध्य में गोगाजी का मजार है (कब्र) है। साम्प्रदायिक
सद़भावना के प्रतीक गोगाजी के मंदिर का निर्माण बादशाह
फिरोजशाह तुगलक ने कराया था। संवत 362 में फिरोजशाह तुगलक
हिसार होते हुए सिंध प्रदेश को विजयी करने जाते समय गोगामेडी
में ठहरे थे। रात के समय बादशाह तुगलक व उसकी सेना ने एक
चमत्कारी दृश्य देखा कि मशालें लिए घोड़ों पर सेना आ रही है।
तुगलक की सेना में हा-हाकार मच गया। तुगलक कि सेना के साथ आए
धार्मिक विद्वानों ने बताया कि यहां कोई महान हस्ती आई हुई है।
वो प्रकट होना चाहती है। फिरोज तुगलक ने लड़ाई के बाद आते
गोगामेडी में मस्जिदनुमा मंदिर का निर्माण करवाया और पक्की
मजार बन गई। तत्पश्चात मंदिर का जीर्णोद्वार बीकानेर के महाराज
काल में 1887 व 1943 में करवाया गया।
गोगाजी का यह मंदिर आज हिंदू, मुस्लिम, सिख व ईसाईयों
में समान रूप से श्रद्वा का केंद्र है। सभी धर्मो के भक्तगण
यहां गोगा मजार के दर्शनों हेतु भादव मास में उमड़ पडते हैं।
राजस्थान का यह गोगामेडी नाम का छोटा सा गांव भादव मास में एक
नगर का रूप ले लेता है और लोगों का अथाह समुद्र बन जाता है।
गोगा भक्त पीले वस्त्र धारण करके अनेक प्रदेशों से यहां आते
हैं। सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश व बिहार के भक्तों की होती
है। नर-नारियां व बच्चे पीले वस्त्र धारण करके विभिन्न साधनों
से गोगामेडी पहुंचते हैं। स्थानीय भाषा में इन्हें पूरबिये
कहते हैं। भक्तजन अपने-अपने निशान जिन्हे गोगाछड़ी भी कहते हैं
लेकर मनौति मांगने नाचते-गाते ढप व डमरू बजाते व कुछ एक सांप
लिए भी आते हैं। गोगा को सापों के देवता के रूप में भी माना
जाता है। हर धर्म व वर्ग के लोग गोगाजी की छाया चढ़ाकर नृत्य
की मुद्रा में सांकल खाते व पदयात्रा करते तथा गोरखनाथ टीले से
लेटते हुए गोगाजी के समाधि स्थल तक पहुंचते हैं। नारियल, बताशे
का प्रसाद चढ़ाकर मनौति मांगते र्हैं।
मेले के दिनों में गोगामेडी में एक अपूर्व आध्यात्मिक
वातावरण बन जाता है और प्राशासनिक व्यवस्था कायम हो जाती है।
विभिन्न संगठनो के स्वयं सेवक भी भक्तों की सुविधा के लिए जुट
जाते हैं। अधिकांश भक्त रेल मार्ग से पहुंचते हैं। हालांकि रेल
विभाग भक्तों की सुविधा के लिए अनेक विशेष रेलगाडियां चलाता है
तो भी रेलों में भीड़ अभूतपूर्व होती है। गोगामेड में इन्ही
दिनों पशुओं का मेला भी लगता है, जहां लाखों पशुओं की
खरीद-फरोख्त होती है। गोगामेडी साम्प्रदायिक सद़भाव व राष्ट्र
की अनेकता में एकता की अनूठी मिशाल है।

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