धन्यवाद आपका और ये उम्मीदें आपसे !


स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम के उन सभी पाठकों का लाख-लाख धन्यवाद, जिन्होंने इस हिंदी पोर्टल को अपना चहेता बनाया, इसके विश्लेषणों को पढ़ा और अपने खुले एवं महत्वपूर्ण विचार ईमेल किए। पोर्टल की प्रशंसा में एक से बढ़कर एक ईमेल संदेशों को देखकर हमारे भीतर यह उम्मीद तेजी से परवान चढ़ी कि समाचार विश्लेषण और विचार पढ़ने वालों की कमी नहीं है। आपके संदेशों और सोच का स्तर भी इतना ऊंचा कि वास्तव में आपकी बौद्घिक पसंद बड़ी ही विलक्षण और प्रशंसनीय हैं। हमसे भी बढ़कर आपके राष्ट्रवादी, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विचार और सरोकार हैं, जिनसे स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम को सतत् प्रेरणा मिली है कि हम उन कसौटियों पर और ज्यादा मेहनत करें जिन पर आपने हमें सौ में से सौ नंबर दिए हैं।
हम तो समझते थे कि स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम के कुछ ही विश्लेषण आपकी तेज तर्रार नज़रों और व्यस्ततम दिनचर्या से गुजर पाएंगे, लेकिन स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम की वेबस्टेट्स देखकर पता चला कि आपने तो पोर्टल का एक-एक विश्लेषण पढ़ा है, जो हमारे लिए अत्यंत खुशी और उत्साह की बात है। विभिन्न विश्लेषणों और विषयों पर आईं आपकी कुछ प्रतिक्रियाएं हम इस अंक के साथ दे रहे हैं। कुछ महानुभावों ने अपने ईमेल के साथ प्रतिक्रियाएं भेजी हैं तो कुछ ने केवल प्रतिक्रिया ही व्यक्त की है, जिस कारण हम उन तक केवल इस संपादकीय के माध्यम से ही पहुंच पा रहे हैं। स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम उन ढेर सारी शुभकामनाओं का कृतज्ञता से धन्यवाद देते हुए आपसे हमेशा मार्ग दर्शन की अपेक्षा करता रहेगा।
जैसा कि हमने अपने पिछले अंक में ‘मेरी आवाज़’ में कहा था कि हम ही कोई पत्रकारिता के लंबरदार नहीं हैं, लेकिन हम यह कोशिश हमेशा करेंगे कि आपकी कसौटियों पर खरे उतरते रहें। इस संपादकीय में इस बार एक विषय पर टिप्पणी करने की कोशिश कर रहे हैं। यह विषय राष्ट्रवाद और देश के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को नसीहत देता है और जागरुक बनाता है। इस समय एक ज्वलंत प्रश्न देशवासियों से उत्तर मांग रहा है कि वह बताएं कि इस देश में राष्ट्रवाद की किस परिभाषा को मान्यता दी जाए और किस राष्ट्रधर्म पर चला जाए क्योंकि देश का नेतृत्व जिन हाथों में है उनके पथ अलग-अलग हैं और उनकी राष्ट्रधर्म की परिभाषाएं भी समझ में नहीं आ रहीं हैं।
क्या राष्ट्र से बढ़कर भी कोई होता है? मनीषियों और दार्शनिकों का तो कहना है कि जब राष्ट्र ही नहीं होगा तो हमारा क्या धर्म और क्या अस्तित्व है? हम समझते हैं कि राष्ट्र और धर्म का अटूट रिश्ता है और ये दोनो कभी अलग नहीं हो सकते। तो फिर ऐसे और भी प्रश्नों पर भारत अपने ही देश में किन-किन को और कितनी अग्निपरीक्षाएं देगा? अनेकता में एकता की संस्कृति से समृद्धशाली इस देश के राजनीतिज्ञ और बुद्धिजीवी अगर भारतवासियों को लोकतंत्र एवं धर्म और जाति के नाम पर विघटन का पाठ पढ़ाते रहेंगे तो राष्ट्रवाद का पाठ कौन पढ़ाएगा?

इसी प्रकार एटमी मुद्दे पर देखा गया और देखा जा रहा है कि देश की लोकसभा में कुछ वे दल इस मुद्दे से कैसे दूर भागते नज़र आए हैं, खासतौर से वो, जो अपने को राष्ट्रवादी कहते हैं। जिनका संबंध सीधे राष्ट्रवाद से प्रचारित किया जाता है, वो भी कुछ वामपंथी भगौड़ों की भाषा बोल रहे हैं, यानी भाजपा और अकाली दल। एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार एक समय इसी एटमी डील की सूत्रधार थी। उसे क्या हो गया? वैसे ही भारत राजनीतिक मक्कारों और दलालों की आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से जूझ रहा है। वह अकेला है और सबको केवल उससे अपने ही लाभ की उम्मीदें हैं। फिर देशहित के मुद्दों पर बड़े राजनीतिक दलों को लकवा क्यों मार गया है? ऐसे मुद्दों पर बात करने वाला व्यक्ति समाज से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। राजनीतिक दल तो ऐसे मुद्दों पर बात करने से कतरा ही रहे हैं। सामाजिक, जातीय और क्षेत्रीय ऐजंडे राजनीतिक सुविधा के अनुसार तय किए जा रहे हैं?
अमरीका के साथ एटमी करार का मामला जिस प्रकार भारत के विरुद्ध साजिश करार दिया जा रहा है, उससे पूरा देश असमंजस में खड़ा है। मीडिया से जुड़े बुद्घिजीवियों का एक तबका भी लिख रहा है कि भारत अब अमरीका का गुलाम हो जाएगा। विश्व बैंक का कर्जदार होकर भारत तो गुलाम पहले ही हो चुका है। रही बात भारत के सैन्य ठिकानों की तो भाई लोग यही बता दें कि भारत की ऐसी कौन सी फाइल है जिसकी फोटो कापी सीआईए केजीबी और आईएसआई जैसी खुफिया एजंसियों के पास नहीं है? यानी आपका दुनिया से छिपा क्या है? राजनीतिज्ञ देश की गोपनीय फाइलों की सूचनाएं लोकसभा में पढ़कर सुनाते हैं कि नहीं? मायावती ने अपने भ्रष्टाचार के संबंध में सीबीआई के आईओ की एक अत्यंत गोपनीय रिपोर्ट एक रोज सार्वजनिक कर तो दी, जो केवल सीबीआई या अदालत को ही मालूम थी, और सील बंद थी। फिर मायावती को ये कैसे मालूम हुआ कि वे सीबीआई के आईओ की रिपोर्ट में निर्दोष हैं? कहने का मतलब यही है कि गलतफहमी में न रहिए, दुनिया से आपका कुछ भी छिपा नहीं है। सब फ्लापियों में देश से बाहर जा रहा है। भारत की मुद्रा तक तो सुरक्षित है नहीं, और एटमी डील के विरोध की बातें हो रही हैं। बहुत से नेता और बुद्घिजीवी, बहुत देश दुनिया पर बोलते हैं मगर एटमी करार की एबीसीडी तक नहीं पता है। उन्हें बस एटमी करार और अमरीका का विरोध करना है।
देश में दूसरे नंबर के राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रपति से अनुरोध कर रही है कि वे अमरीका के साथ एटमी करार को मान्यता न दें। भाजपा डील के खिलाफ राग अलाप रही है जबकि समाजवादी पार्टी ने करार के पक्ष में खड़े होकर राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करने का ऐतिहासिक फैसला किया है। जहां तक वामपंथियों की बात है तो सोमनाथ चटर्जी को अलग कर दें तो उनमे कई ऐसे हैं कि बारिश मास्को या बीजिंग में होती है और छाता भारत में तानकर खड़े होते हैं। चार साल से वामपंथियों के साथ राजनीतिक मजबूरियों के चलते यह देश नाचता ही रहा है और नचाने वालो में वो भी हैं जो गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं, जिन्हें अपने खिलाफ मुकदमों से मुक्ति पाने की और किसी भी तरह से प्रधानमंत्री बनने की ज्यादा चिंता है, जैसे मायावती, जो एटमी करार की एक लाइन से भी वाकिफ नहीं हैं और आज वह छद्म आवरण ओढ़कर चीन के दलालों के साथ खड़ी हो गई हैं। सोचिए! आज भारत कितने संकट में है और अमरीका से एटमी करार को न होने देने के लिए किस प्रकार यहां लाबिंग चल रही है। लेकिन याद रहे ऐसे न भारत कभी टूटा है और न कभी टूट पाएगा, भले ही इस देश के गद्दार तथाकथित राष्ट्रवादी, जातिवादी और वामपंथी भी, भारत में विदेशी मिसाइलों के साथ क्यों न कूद पड़ें।
स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम ने इस अंक में आपको ऐसे विषयों से जोड़ा है जो आपके ही के बीच से आए हैं। राजनीति के उन महाभ्रष्ट जातिवादी चेहरों को भी आप पहचानिए, हमने भी उन्हें बेनकाब करने की कोशिश की है। मायावती जैसी भ्रष्ट राजनेता अगर इस देश में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करेंगी और प्रकाश करात, सीताराम येचुरी और एबी बर्द्घन जैसे अवसरवादी राजनीतिक ब्लैकमेलर आगे बढ़ेंगे तो यह देश वास्तव में कभी बच नहीं पाएगा। तब भारत शर्मसार ही होगा। देश के राजनीतिक और संवैधानिक पदों पर हर उस देशवासी का स्वागत है जो किसी भी धर्म और समाज में जन्म लेकर राजनीति में अवतरित हुआ है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारतीय लोकतंत्र की यही एक ताकत है जो दुनिया में उसे महान बनाती है। भारत के राष्ट्रवादियों के लिए एक निर्णय लेने का समय आ रहा है जब लोकसभा चुनाव होगा जिसमें एक-एक मत राष्ट्रवाद की असली परिभाषा को स्थापित करेगा। आपकी सुबह एक सुखद अनुभव से शुरू हो और रात्रिकाल चिंता से मुक्त हो इन कामनाओं के साथ आप देश की सुख समृद्घि शांति और सौहार्द के लिए, सामाजिक समरसता के लिए आगे बढ़ें और भारत की एकता और अखंडता को अपने स्वार्थों से खंडित करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दें, चाहे वो कोई भी हों। जयहिंद।

दिनेश शर्मा