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चीनी मछलियों का भारतीय नदियों पर कब्जा
चीनी मछली सिल्वर कार्प ग्रास, ग्रास कार्प तथा कानन
कार्प भारतीय नदियों में आतंक फैलाकर भारत की देशी मछलियों को
खत्म कर रही हैं। चीन ने भारतीय वैज्ञानिकों को ये मछलियां
भारतीय तालाबों में पालने के लिए भेंट की थीं जो वे बाढ़ के
कारण तालाबों से निकलकर भारत की प्रायः सभी नदियों में पहुंचकर
अपनी जनसंख्या बढ़ाकर, भारतीय मछलियों को अपना आहार बनाकर खत्म
कर रही हैं। इसके साथ ही गंगा, जमुना सहित देश की अन्य नदियों
में समुद्र के खतरनाक परजीवी रास्टेल एस्केटिस तथा घातक
रसायनों से भी भारतीय प्रजाति की मछलियों का अस्तित्व खतरे में
पड़ गया है।
भारत की नदियों में चीनी मछली कामन कार्प ने देशी मछली
रोहू, कतला और नयन को पीछे छोड़कर अपनी प्रजनन क्षमता के कारण
भारतीय नदियों पर एक तरह से कब्जा कर रखा है। तीस साल पहले
वैज्ञानिकों की एक गलती की वजह से इन मछलियों ने बाढ़ आदि के
जरिये पूरे देश की नदियों से अपनी आमद की दस्तक तो दी ही है,
बल्कि छोटी देशी मछलियों को अपना भोजन बनाकर जहां उनकी नस्ल को
खत्म कर रही हैं, वहीं अपनी संख्या निरंतर बढ़ा रही हैं।
केन्द्रीय मुक्त शिक्षा संस्थान महाराष्ट्र के वैज्ञानिकों को
चीन प्रवास के दौरान ये मछलियां पालने के लिए दी गई थी, जो अब
तालाबों से पहले कुछ नदियों और फिर बाढ़ आदि के बाद देश के सभी
नदियों पर कब्जा जमा रखा है।
विदेशी मछलियों के आक्रमण से भारतीय मछलियां त्राहिमाम
कर रही हैं। तीन दशक पूर्व भारत में आई चीनी मछली कामन कार्प
की विभिन्न नस्लें देश की लगभग सभी नदियों पर काबिज हो गई हैं।
बाजार में भी इन्हें राहू के नाम पर धड़ल्ले से बेचा जा रहा
है। मत्स्य वैज्ञानिकों की रिपोर्ट पर सरकार ने विदेशी मांगुर
बिगहेड तथा पयामी आदि पर प्रतिबंध तो लगाया, लेकिन इनकी बिक्री
रोक पाने में उसे कामयाबी नहीं मिली। बिगहेड तथा विदेशी मांगुर
शिकारी मछलियों में आती हैं। ये देशी मछलियों को ही अपना भोजन
बना लेती हैं। मुक्त व्यापार संधि के बाद चीनी उपभोक्ता
सामग्री ने बाजार में भारतीय कंपनियों के सामने प्रतिस्पर्धा
खड़ी कर दी है और आतिशबाजी तक को भारतीय बाजार में उतार दिया
है।
कामन कार्प की भारतीय नदियों में आवक का इतिहास तीस साल
पुराना है। इस नस्ल को चीन ने बड़ी चालाकी से भारतीय
वैज्ञानिकों के हाथ भेजा था। पहले इसकी संख्या गिनी चुनी थी
लेकिन जबरदस्त प्रजनन क्षमता और समय-समय पर आई बाढ़ के कारण
देखते ही देखते उन्होंने पूरे बााजर पर अपना अधिकार कर लिया।
पता चला है तीन दशक पूर्व केन्द्रीय मुक्त शिक्षा संस्थान
महाराष्ट्र के निदेशक तथा कई वैज्ञानिकों को चीन सरकार ने
आमंत्रित किया था। आमंत्रण पर पहुंचे वैज्ञानिकों को चीन ने
तालाब में पालने के लिए सल्पिर कार्प ग्रास कार्प तथा कामन
कार्प प्रजाति की मछलियों के बीज दिए थे। भारतीय वैज्ञानिक
मछलियों को पालने के लिए ले तो आए, लेकिन शायद वे यह नहीं समझ
पाए कि यही मछलियां नदियों में पहुंचकर भारतीय प्रजाति को
नुकसान पहुंचाएंगी। नतीजा आज सामने है क्योंकि चीन को पता था
कि भारत के तमाम इलाके बाढ़ग्रस्त हैं और अब इन पर नियंत्रण
पाना भारत के लिए कठिन होगा।
मत्स्य वैज्ञानिकों के अनुसार भारतीय प्रजाति की
मछलियां बहते हुए पानी में ही प्रजनन के लिए सक्षम होती है,
जबकि चीनी मछलियां ठहरे हुए पानी में भी प्रजनन कर लेती हैं।
इसके बच्चे आठ माह में एक से डेढ़ किग्रा वजन के हो जाते हैं,
जबकि भारतीय मछलियों के बच्चे यह वजन पाने में एक साल लगा देते
हैं। इस तरह जनसंख्या की जंग में कामन कार्प ने तीन दशक के
दौरान पूरे देश की नदियों पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया
है। विगत वर्ष सरकार ने विदेशी मांगुर बिगहेड तथा बांग्लादेश
की पयासी मछलियों के पालन तथा बीज वितरण पर प्रतिबंध लगाया था।
मत्स्य विभाग के अधिकारी ऐसी मछलियों को पकड़ने के बाद गड्ढे
खोदकर जमीन में दफन करते रहे।
बीज वितरण पर कड़ाई से प्रतिबंध लगाया गया। बावजूद इसके ये
मछलियां मत्स्य बाजारों में धड़ल्ले से बिक रही हैं।
बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत कोई भी देश अपनी संपदा पर
टैक्स लगा सकता हैं यदि चीन ने कामनकार्प को अपनी संपदा घोषित
कर अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत दावेदारी ठोंक दी तो उस पर
भारत को टैक्स देना पड़ सकता है।
उधर दिनों दिन मर रही गंगा के लिए एक और बुरी खबर है। समुद्री
जल में पनाह पाने वाले खतरनाक परजीवी रास्टेल एस्केरिस
वाराणसी, इलाहाबाद और कानपुर से उत्तर दस किलोमीटर तक गंगा के
जल में पाया गया है। केवल खारे जल में जिंदा रहने वाला यह
परजीवी थाई मांगुर जैसी हत्यारी मछलियों को भी चट कर जाता है।
थाई मांगुर और खारे जल की मछली साइप्रिंस कार्पियों इलाहाबाद
में गंगा के साथ यमुना में भी पाई गई हैं। नतीजा यह है कि इन
दिनों देशी मछली सिंघी और बेकरी नदी से गायब हो रही है।
विशेषज्ञों की चिंता यह है कि दो बाहुबली मछलियां और
उन्हें भी चाट जाने वाला यह परजीवी गंगा-यमुना में न सिर्फ
जिंदा हैं, बल्कि तेजी से बढ़ रहा है। इन पर नजर रखने वालों का
कहना है कि एक वर्ष ऐसा और रह गया तो बाम और सौरी मछलियों का
भी अंत हो जायेगा। बड़ा खतरा गंगा जल पीने वालों के लिए है। यह
परजीवी इंसान की पाचन शक्ति बिगाड़ने में सक्षम है। इन मछलियों
और परजीवी की मौजूदगी से साफ है कि गंगा समुद्र का गुण अपना
रही है। प्रदूषण के कारण हो रहा यह परिवर्तन नहीं रूका तो
नतीजे बेहद खतरनाक हो सकते हैं।
खतरे को शुरूआत में ही खोज निकालने का श्रेय जाता है
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग की शोध छात्रा
गीतांजलि को जो हर महीने गंगा यमुना से मछलियां जुटाती हैं
उनके जीवन में हो रहे बदलावों पर अध्ययन किया है, जिनको सहयोग
दिया है उनके गुरू डा संदीप मल्होत्रा ने। डा मल्होत्रा बताते
हैं कि बीते अस्सी वर्ष में गंगा-यमुना में रहने वाली
मछलियों, कीटों, वनस्पतियों और सभी परजीवियों के बारे में
अध्ययन किया गया है। थाई मांगुर डेढ़ बरस पहले दिखी थी गंगा
में छतनाग के पास। खतरे का आभास उन्हें उसी समय हुआ था। निदान
के लिए उन्होंने अपने कई कुछ उपाय भी किए।
गोवा विश्वविद्यालय के परजीवी विभाग के संपर्क करके थाई
मांगुर की मौजूदगी से होने वाले नुकसान और उसके निदान की
जानकारी ली। सूबे की किन अन्य नदियों में यह मछली बढ़ रही है
और क्या खतरे देखने को मिल रहे हैं, इसका आंकलन हो पाता, इससे
पहले ही गीतांजलि ने उनके सामने रास्टेल एस्केरिस रख दिया। डा
मल्होत्रा के अनुसार उनके लिए यह अजूबा था। डा मल्होत्रा ने
इलाहाबाद के साथ कानपुर व वाराणसी से गंगाजल के नमूने जुटाए।
जांच की तो पता चला रास्टेल का कुनबा सभी जगह फल-फूल रहा है।
गीतांजलि ने गंगा में थाई मांगुर के साथ साइप्रिंस कार्पियों
को भी ढूंढ़ निकाला। कुछ और जांच की तो पता चला सिंधी और बेकरी
गंगा से साफ हो चुकी हैं। दो हत्यारी प्रजाति की मछलियों की
मौजूदगी के बाद यह असंभव भी नहीं था।
उत्तर प्रदेश में गंगा, गोमती व यमुना के पानी में
आर्सेनिक और क्रोमियम की मात्रा बढ़ रही है। इन तत्वों की
मौजूदगी के कारण मछलियों की तीन प्रजातियां विलुप्त होने के
कगार पर हैं। टार मुसुल्लाह (महाशेर), ओमपॉक पपदा और पाबो
प्रजाति की मछली नदियों में नहीं मिल रही है। ब्रह्मपुत्र और
कावेरी में यह पहले ही खत्म हो चुकी हैं। वैज्ञानिकों ने
थुम्बी, गोंच, अरंगी, सिधर, दरही और मोए समेत 13 प्रजातियों को
बचाने के लिए ‘रेड अलर्ट’ घोषित किया है।
राष्ट्रीय मत्स्य आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो के
शोधकर्ताओं ने मछलियों के विलुप्त होने की वजह पानी में बढ़ता
धात्विक रसायन बताया है। इस वजह से नदियों में खाद्य
सामग्रियां एक तिहाई ही रह गई हैं। वैज्ञानिकों ने साफ किया कि
शिकार की वजह से मछलियों की प्रजातियां खत्म नहीं होतीं। पानी
में लगातार बढ़ता घातक रसायन मछलियों में जीनोटॉक्सिक
(आनुवंशिक विषाक्तता) प्रभाव डाल रहा है। लखनऊ में गोमती, आगरा
में यमुना और कानपुर में गंगा से ‘वाम’ और ‘गिरई’ मछलियों के
नमूने परीक्षण के तौर पर लिए गए। मछली की कोशिकाओं में कुछ
असामान्य लक्षण देखे जा रहे हैं। गुणसूत्र अलग होकर असामान्य
‘माइक्रोन्यूक्लियस’ बना रहा है। गोमती में पाए जाने वाली राहू
मछली का पिछला हिस्सा असामान्य पाई गया। वैज्ञानिक डा एनए
नागपुरे के मुताबिक अब जीन एक्सप्रेशन तकनीक से मछलियों के जीन
पर शोध किया जाएगा। यमुना पर शोध कर रहीं डा राखी चौधरी ने
बताया कि ‘प्रोटो आंकोजीन’ (कैंसर के कारक जीन) को बढ़ाने वाले
रसायन मछलियों में ट्यूमर बढ़ा रहे हैं। यमुना और गोमती के
मछलियों की कोशिकाओं में आर्सेनिक व क्रोमियम की मात्रा अधिक
पाई गई।
भारतीय वैज्ञानिक वैसे इस समस्या से छुटकारा पाने के
लिए गंभीर प्रयास में जुटे हैं, लेकिन जिस प्रकार चीनी मछलियों
ने भारतीय नदियों पर कब्जा जमा लिया है उससे छुटकारा पाना
मुश्किल लग रहा है। हां चीन की चतुराई ने न केवल भारतीय
मछलियों का आघात पहुंचाया है बल्कि उसकी नजर अब भारतीय
अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करने पर लगी हैं।
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