एक सवाल! देश से बढ़कर कौन?

  • दिनेश शर्मा

एक सवाल! देश से बढ़कर कौन?नई दिल्‍ली। भारत को अपने पड़ोसी देश पाकिस्‍तान में आतंकवादी शिविर होने के बावजूद सीधे कार्रवाई नहीं करनी चाहिए- ‌देश के संवैधानिक और सर्वोच्‍च पद पर आसीन रहते हुए भारत की सुरक्षा, एकता, अखंडता, संप्रभुता और विदेश नीति से जुड़े अत्‍यंत संवेदनशील और गंभीर मामले पर इस तरह विवादास्‍पद बयानबाजी करने के कारण देश के प्रधान न्‍यायाधीश केजी बालाकृष्‍णन पर यह नैतिक दबाव बढ़ता जा रहा है कि उन्‍हें अपने पद से स्‍वतः ही इस्‍तीफा दे देना चाहिए। भारतीय जनमानस के भीतर बड़े ज़ोर से लोकापवाद उठ रहा है कि भारत के प्रधान न्‍यायाधीश केजी बालाकृष्‍णन ने यह कौन सी भाषा बोली है? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में एक कार्यक्रम में न्‍यायमूर्ति केजी बालाकृष्‍णन ने ऐसी और भी कई बातें कहीं, जिन पर शायद वक्‍त की नजाकत को देखते हुए प्रधानमंत्री को चुप रहना पड़ा। उस वक्‍त तो ऐसा लग रहा था कि मानो केजी बालाकृष्‍णन भारत और पाकिस्‍तान के संयुक्‍त प्रधान न्‍यायाधीश हों और वह कोई फैसला सुना रहे हैं। भारत में मानवता और निष्‍पक्ष न्‍यायिक इतिहास की एक से बढ़कर एक मिसालों से बेखबर से दिखे और मानवाधिकारों के लिए देश में सबसे ज्‍यादा चिंतित दिखाई पड़े न्‍यायमूर्ति केजी बालाकृष्‍णन ने भारत को यह भी सीख देने की कोशिश की कि कोई भी भले ही आतंकवाद के आरोप में पकड़ा जाए, उचित न्‍याय दिलाने के लिए उसे सारी कानूनी सहायता मिलनी चाहिए। उनकी भारत को सलाह और नसीहतों का सिलसिला केवल यहीं नहीं टूटता है, उन्‍होंने यह भी कहा कि जब तक दो देशों के बीच में जांच में सहयोग करने की कोई संधि न हो तो सहयोग या जांच के लिए ही सही, सीमित हमला बोलना भी गैर कानूनी होगा। उन्‍होंने बोला कि जब तक भारत के पास आतंकवाद की कोई कानूनी परिभाषा नहीं हो और किसी अंतरराष्‍ट्रीय संधि का उल्‍लंघन न किया जाए तब तक भारत को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी भी पड़ोसी देश की सीमा और संप्रभुता का उल्‍लंघन करे। उन्‍होंने लगते हाथ अमरीका को भी नसीहत दे डाली कि उसने आतंकवाद से निबटने का बहाना बनाकर खुद बहुत सारी अंतरराष्‍ट्रीय नीतियों का उल्‍लंघन किया है जिसके लिए उसे कभी न कभी जवाबदेह होना ही पड़ेगा।
प्रधान न्‍यायाधीश केजी बालाकृष्‍णन के ऐसे बयान पर देश में यह सवाल चल निकला है, कि जब देश और देश की संसद में आतंकवाद से निपटने के लिए एकजुटता और रणनीति पर, एकमत प्रस्‍ताव पारित किया जा रहा हो, तब प्रतिरक्षा जैसे संवेदनशील मामलों पर और वह भी देश के प्रधानमंत्री की मौजूदगी में, देश के प्रधान न्‍यायाधीश के ऐसे विचारों का ‌क्‍या मतलब निकाला जाना चाहिए? क्‍योंकि इससे भारत की स्‍थिति अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर संदिग्‍ध और हास्‍यास्‍पद सी होती जा रही है। इससे देश में अस्‍थिरता का वातावरण बन जाना भी स्‍वाभाविक है। जनसामान्‍य में इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हो रही है। उधर पाकिस्‍तान ने भारत के प्रधान न्‍यायाधीश के बयान को अपने देश में और देश के मीडिया में जोर-शोर से प्रचारित करा दिया है। पाकिस्‍तान के विदेश विभाग ने इस बयान के आने के बाद कहा है कि वह प्रतिरक्षा जैसे मामले पर भारत के प्रधान न्‍यायाधीश की राय को अंतरराष्‍ट्रीय मंचों पर अपने पक्ष में इस्‍तेमाल करेगा। पाकिस्‍तान का कहना है कि केजी बालाकृष्‍णन भारत के प्रधान न्‍यायाधीश हैं न कि भूतपूर्व प्रधान न्‍यायाधीश, इसलिए वर्तमान न्‍यायाधीश का कोई भी कथन भारत के संविधान की ही आवाज होती है और इसे सत्‍य माना जाना चाहिए। इस बात से कोई मतलब नहीं है कि उन्‍होंने यह बयान कोई निजी तौर पर दिया हो, क्‍योंकि ऐसे पद पर रहते हुए किसी भी व्‍यक्‍ति का कुछ भी निजी नहीं होता है। संविधान विशेषज्ञों का मत है कि इससे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और भारत के कूटनीतिक मामलों पर विपरीत प्रभाव पड़ना लाजिम है, क्‍योंकि इससे भारत के प्रतिरक्षा जैसे प्रयासों के मनोबल को झटका लगा है। इस विषय पर हालांकि भारत में अनेक राजनेताओं ने सार्वजनिक राय प्रकट करने से परहेज किया है, लेकिन फिर भी प्रधान न्‍यायाधीश का यह बयान देश की सीमा के बाहर तो जा ही चुका है।
न्‍यायमूर्ति केजी बालाकृष्‍णन का उद्देश्‍य भले ही ऐसा नहीं रहा हो जिससे भारतीय जनमानस आहत हो या भारत की प्रतिरक्षा नीतियां प्रभावित हों, किंतु उनके बयान ने आग में घी का काम और पाकिस्‍तान का काम आसान तो किया ही है। इसके परिणाम चाहे जो भी हों। वे तो यही कहेंगे कि उनका उद्देश्‍य ऐसा नहीं था जो कि समझा गया है लेकिन वास्‍तव में उसका मतलब यही समझा गया है कि उन्‍होंने ऐसे समय पर ऐसे विषय पर बेहद गैर जिम्‍मेदाराना और आपत्‍तिजनक तरीके से बोला है जिसके बारे में भारत का जनसामान्‍य उनसे बिल्‍कुल ही अलग और स्‍पष्‍ट विचार रखता है। अपवाद को छोड़कर कोई भी भारतीय, पाकिस्‍तान के मुद्दे पर कोई ऐसी टिप्‍पणी सुनना पसंद नहीं करता जो भारत के आंतरिक और सुरक्षाहितों को चोट पहुंचाती हो। जनसामान्‍य भारतीय कानून से नियंत्रित होता है, मगर देश इस कानून के भी ऊपर है। भारतीयों के राजनीतिक, मौलिक, आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा और अभिव्‍यक्‍ति की आजादी की गारंटी भारतीय कानून देता है, मगर जहां राष्‍ट्र और राष्‍ट्रीयता का प्रश्‍न आता है, वहां देश सबसे ऊपर आ जाता है। देश के न्‍यायिक, विधायिका और कार्यपालिका के उच्‍च पदों पर बैठे हुए महानुभावों को किस सीमा तक बोलने की आजादी हो, इसका भारतीय संविधान में स्‍पष्‍ट उल्‍लेख है, इसलिए ऐसे महानुभावों से यह उम्‍मीद की जाती है कि वह राष्‍ट्र और उसकी सुरक्षा से जुड़े विषयों पर अपने विचार प्रकट करते समय यह जरूर ध्‍यान रखेंगे कि उनका बोला हुआ एक ही शब्‍द हर्ष को विषाद में शांति को अशांति या आक्रोश में बदल सकता है। संविधान उनसे हमेशा अपेक्षा करता है कि वह अपने देश और देश के नागरिकों के लिए मर्यादा सम्‍मत, उन आदर्शों और नैतिक बल का प्रसार करें जिनसे देश में और उसके बाहर रहने वाले भी चरित्र निर्माण के लिए प्रेरित हों। ऐसे पदों पर आसीन महानुभावों का धर्म यह भी है कि वह ऐसी कुरीतियों और प्रणालियों पर प्रहार करें जो देश और समाज को और देश के नागरिकों को पथभ्रष्‍ट करने की शिक्षा देती हों या ऐसे तत्‍वों को प्रश्‍चय देती हों। देश की सुरक्षा से जुड़ा कोई भी मामला अत्‍यंत संवेदनशील होता है, जिस पर ऐसे लोगों को सार्वजनिक रूप से कुछ भी बोलने से परहेज रखना चाहिए।
ये प्रेरणादायक बातें अनेक अवसरों पर देश के बड़े-बड़े विद्वान न्‍यायमूर्तियों ने अपने फैसलों में कही हैं। यही नहीं देश की अदालतों में लाखों फैसलों में ऐसे आदर्श विचारों और अनुभवों को शामिल करते हुए ऐतिहासिक फैसले सुनाए गए हैं। स्‍वयं न्‍यायमूर्ति केजी बालाकृष्‍णन ने भी विभिन्‍न विषयों पर मतों और आदर्शों का उल्‍लेख किया है, इसलिए अदालत के बाहर उनके देश की सुरक्षा से जुड़े विषयों पर ऐसे विवादास्‍पद बयान से जन सामान्‍य में निराशा स्‍वाभाविक है। जहां तक मानवाधिकारों का प्रश्‍न है तो उस पर सभी की एक सी राय है। दुनिया जानती है और भारत का इतिहास बोलता है कि वह शुरू से ही इनका प्रबल पक्षधर रहा है और है। भारत ही है जहां मानवाधिकारों पर सर्वाधिक जागरुकता और चिंता रहती है। यहां सभी को न्‍याय मिलता है चाहे वह शत्रु के देश का ही क्‍यों न हो। यहां की न्‍याय प्रणाली ‌पर दुनिया यकीन करती है। मीडिया में न्‍यायिक मामलों से जुड़े महानुभावों के संबंध में लिखते और बोलते समय काफी सावधानी बरती जाती है, वह इसलिए कि न्‍यायपालिका के मान सम्‍मान पर कोई आंच नहीं आने पाए। यह अलग बात है कि इसी के कुछ लोग इसे भी चौराहों और पार्कों में ही सिमटा देने पर तुले हुए हैं।

लेकिन यहां यह यक्ष प्रश्‍न उत्‍तर मांग रहा है कि यदि देश की सुरक्षा ही खतरे में पड़ी हो तो ऐसे विषयों पर न्‍यायिक पदों पर या किसी भी और वह भी संवैधानिक उच्‍च पद पर बैठे महानुभावों को किस सीमा तक सार्वजनिक रूप से बोलने की आजादी हो? राजनीति में तो साम-दाम-दंड-भेद का प्रचलन है किंतु न्‍यायपालिका सहित अन्‍य सरकारी सेवाओं में ऐसा नहीं है। राजनीतिज्ञों पर भी यह व्‍यवस्‍था लागू है कि वह केवल कानून सम्‍मत व्‍यवहार करें जिसके उल्‍लंघन पर उन्‍हें यथा समय दंड भी सुनाया गया है। ये तर्क इसलिए प्रासंगिक समझे जाते हैं कि अभिव्‍यक्‍ति की आजादी के नाम पर कुछ भी बोल देने की आज्ञा नहीं है। फिर यह तो ऐसा विषय है कि जिसमें देश और उसकी सुरक्षा का हित निहित है,जिस पर प्रधान न्‍यायाधीश केजी बालाकृष्‍णन बोलते हुए कदाचित सुरक्षा सीमाएं ही लांघ गए।
न्‍यायमूर्ति केजी बालाकृष्‍णन जो भी बोले हैं, उनके बयान को पाकिस्‍तान ने तेजी से लपक लिया है। उसने कह दिया है कि वह भारत के प्रधान न्‍यायाधीश का बयान अपने पक्ष में इस्‍तेमाल करने के लिए अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर ले जा रहा है। बयान के आधार पर पाकिस्‍तान संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के आतंकविरोधी पक्ष की धज्‍जियां उड़ा रहा है। वह इसके आधार पर संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत को निरुत्‍तर करना चाहता है कि भारत के पाकिस्‍तान पर जो आरोप और जो तर्क हैं वह झूठे हैं, जिसकी पुष्‍टि भारत के ही, न्‍यायमूर्ति बालाकृष्‍णन के बयान करते हैं, इसलिए भारत, पाकिस्‍तान को आतंकवाद के मुद्दे पर नाहक ही परेशान करता आ रहा है। कानूनविदों का मत है कि प्रधान न्‍यायाधीश बालाकृष्‍णन ने भारत को एक अजीब दुविधा में डाल दिया है। उनका बयान भारत और पाकिस्‍तान के सन् 1971 के युद्ध के लिए भी कानूनी अड़चनें पैदा कर सकता है और कारगिल संघर्ष में भारत की ओर से की गई सैनिक कार्रवाई को भी गलत साबित करने का हथियार बनाया जा सकता है। उन्‍होंने ऐसे वक्‍त पर ये बातें कही हैं कि जब भारत और अन्‍य तमाम देशों ने मुंबई हमले के संदर्भ में पाकिस्‍तान पर अपने यहां आतंकवादियों को पनाह नहीं देने और उनके खिलाफ हरसंभव सख्‍त से सख्‍त कार्रवाई करने के लिए दबाव बनाया हुआ है। आतंकवाद में पाकिस्‍तान की संलिप्‍तता के पुख्‍ता सबूतों के मद्देनजर इससे ज्‍यादा और क्‍या हो सकता है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र तक को पाकिस्‍तान के चार बड़े वांछित आतंकवादी, घोषित करने पड़े। संयुक्‍त राष्‍ट्र ने यदि उन्‍हें आतंकवादी घोषित किया है तो उसके पास भी इसके पुख्‍ता सबूत होंगे।
भारत की राष्‍ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के सामने इस मामले में असमंजस की स्‍थिति आ गई है। उन्‍हें यह तय करना है कि देश के प्रधान न्‍यायाधीश केजी बालाकृष्‍णन की इस बयानबाजी पर क्‍या किया जाए और क्‍या नहीं। राष्‍ट्रपति देश की तीनों सेनाओं के कमांडर होते हैं। वह ही प्रधान न्‍यायाधीश के नियुक्‍ति प्राधिकारी होने के नाते उनको शपथ ग्रहण भी कराते हैं। इसलिए वह ही इस बयान पर उनसे सफाई मांग सकती हैं। मगर इसमें भी बहुत सारी दुविधाएं हैं। पाकिस्‍तान ने भारत के प्रधान न्‍यायाधीश के बयान का संज्ञान ले लिया है इसलिए यह संदेश भी जाता है कि भारत सरकार अपने प्रधान न्‍यायाधीश को दबाव में लेने की कोशिश कर रही है। इसके और भी कूटनीतिक परिणाम हो सकते हैं। इसलिए प्रधान न्‍यायाधीश का यह बयान भारत के गले की हड्डी बन गया है कि भारत इसमें क्‍या करे और क्‍या न करें।
हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। अनेक दृष्‍टांत है कि उच्‍च पदों पर बैठे महानुभाव-राजनेता-विचारक-नौकरशाह या बुद्घिजीवी कहे जाने वाले अनेक लोगों को मुह देखकर धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक बातें कहने और लिखने की होड़ लगती है। उच्‍च पदों पर बैठे अधिकारियों में रिटायरमेंट के बाद किताब लिखकर अपनी कुंठा निकालने और सत्‍यों को उजागर करने की चढ़ती है-नेताओं को अपना डूबता या प्रकट होता स्‍वार्थ नजर आने पर सनसनी खेज बयान देने या किसी संवेदनशील मुद्दे पर अपनी प्रतिष्‍ठा को भुनाते हुए सनसनीखेज मांग उठाने की लगती है। राजनीतिक दलों के पास जनसामान्‍य के कल्‍याण के लिए मुद्दे तो रहे नहीं हैं वे भी ऐसे अवसरों की तलाश में रहते हैं कि उन्‍हें अपना गला साफ करने को मिल जाए। देश की प्रतिरक्षा से जुड़े मामले पर बोलना भी कुछ ऐसी ही श्रेणी का समझा जा रहा है। इस बात से कोई मतलब नहीं है कि ऐसा कुछ भी बोलने के बाद देश के जन सामान्‍य में क्‍या वातावरण बनेगा। उन्‍हें बोलना है और बाकी देश को झेलना है। वैसे भी भारत एक ऐसा देश है जो चौबीसों घंटे अपने ऊपर विभिन्‍न प्रकार के हमले झेलता है- दो चार-दस बीस-पचास सौ हमले और भी सही। इसमें यह किसी या किन्‍हीं को नहीं भूलना चाहिए कि सारे पाप पुण्‍य यहीं पर और अवश्‍य ही सामने आएंगे और इतिहास और पीढ़ियां अपने समय पर सारा हिसाब चूकता करेंगी। किसी न किसी रूप में सभी के सामने यह लिखा होगा कि वह लुटेरा था- वह दार्शनिक था-अत्‍याचारी था, वह लोकप्रिय सम्राट था वह दानवीर था और ईमानदार था उसका न्‍याय ऐसा था या वह तो महाभ्रष्‍ट था। जैसा कि हम भी इतिहास में दूसरों के बारे में पढ़ते आ रहे हैं।
इसी प्रकार देश के अल्‍पसंख्‍यक मामलों के केंद्रीय मंत्री अब्‍दुल रहमान अंतुले कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि मुंबई हमले में अपने दो साथियों सहित शहीद हुए एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की साजिशन हत्‍या की गई है जिसकी अलग से जांच होनी चाहिए। एआर अंतुले अपने आप न केवल इस निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि हेमंत करकरे की हत्‍या की अलग से जांच की जरूरत है, बल्‍कि उन्‍होंने खास तौर पर मालेगांव कांड का भी उल्‍लेख किया। शायद वह यह कहना चाहते हैं कि हेमंत करकरे को उन लोगों ने मारा जो मालेगांव मामले की जांच करने के उनके तरीके से सहमत नहीं थे। अब्‍दुल रहमान अंतुले से भी अपना बयान वापस लेने या फिर मंत्री पद से इस्‍तीफा देने की मांग की जा रही है। लेकिन उन्‍होंने विवाद अधिक बढ़ने पर बाद में अपने बयान पर लीपापोती कर दी है।

इन दोनो मामलों में फर्क केवल इतना है कि न्‍यायमूर्ति केजी बालाकृष्‍णन के बयान पर सार्वजनिक रूप से शोरशराबा नहीं हो रहा है और अंदर ही अंदर उनके बयान पर तूफान खड़ा हुआ है जबकि अब्‍दुल रहमान अंतुले को संपूर्ण विपक्ष ने उछाल दिया है और हर कोई उनके पीछे पड़ गया है। उन्‍हें शक हैकि हेमंत करकरे को हिंदुओं ने मरवाया है। इतनी सोच वही रख सकता है जिसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी हो। वे मुंबई के कोलाबा इलाके के सांसद हैं जहां आतंकवादियों ने खास तौर पर कहर बरपाया। उन्‍होंने यह जानने-समझने की जरूरत ही नहीं समझी कि आतंकवादी हमले के दौरान उनके निर्वाचन क्षेत्र में क्‍या हुआ? यदि ऐसा नहीं है तो ‌फिर यह स्‍वतः सिद्घ हो जाता है कि उनका एक मात्र उद्देश्‍य दुष्‍प्रचार करना और उन तत्‍वों की मदद करना है जो भारत के लोगों को बरगला करा अपना उल्‍लू सीधा करना चाहते हैं।
एआर अंतुले का बयान पाकिस्‍तानपरस्‍ती का परिचायक है या कि एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की हत्‍या के पीछे कोई साजिश। प्रश्‍न यह नहीं है कि उन्‍होंने ऐसा बयान क्‍यों दिया, बल्‍कि प्रश्‍न यह है कि उनके दिमाग में शक का यह कीड़ा घुसा कैसे कि हेमंत करकरे के कातिल पाकिस्‍तान से आए आतंकवादियों के अलावा कोई और हो सकते हैं? भारत के खिलाफ तरह-तरह के हथकंडे इस्‍तेमाल कर रहे हैं और इस कोशिश में यहां तक कह रहे हैं कि मुंबई में आतंकी हमले के पीछे हिंदुओं और यहूदियों का हाथ है। यह आश्‍चर्य है कि ऐसी नकारात्‍मक सोच के बाद भी वह केंद्रीय मंत्री बने हुए हैं। कांग्रेस ने भले ही अब्‍दुल रहमान अंतुले के बयान से पल्‍ला झाड़ लिया, इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि लोकसभा में जब विपक्ष उन पर बरस रहा था तो वह मुस्‍करा रहे थे। पाकिस्‍तान उनका बयान भी अपने बचाव के लिए इस्‍तेमाल कर रहा है।

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