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फसे हैं दुविधा में
बसपा के अखिलेश-नरेश
लखनऊ।
 अपना
मतलब निकलने पर एक ने मुलायम सिंह यादव पर निशाना साधा तो
दूसरे ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी पर भद्दे तरीके से हमला
किया। यह है उन दो अवसरवादियों की असलियत जो कांग्रेस और सपा
छोड़कर आजकल बसपा में मायावती का गुणगान कर रहे हैं। इन दोनों
की राजनीतिक प्रगति का इतिहास किसी से छिपा नहीं है इसलिए इन
पर बसपा को भी भरोसा नहीं है और ना ही ये बसपा की नीतियों और
रीतियों पर चलने के लिए बसपा में गए हैं। इन दोनों को किसी तरह
से राजनीति में सक्रिय रहकर अपने आर्थिक साम्राज्य को बढ़ाना
और बचाना हैं। इनका अस्तित्व ही इस पर कायम है। बसपा में और
दूसरे राजनीतिक दलों में इनकी चर्चाएं इसलिए नहीं हो रही हैं
कि इनसे बसपा को बहुत लाभ होने वाला है बल्कि चर्चा इसलिए हो
रही हैं कि इनका कोई भरोसा नहीं है कि ये कब धोखा दे भागें।
इनमें एक हैं अखिलेश दास और दूसरे हैं नरेश अग्रवाल।
यूपीए के केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर किए गए
राज्यमंत्री और कांग्रेस के बागी नेता अखिलेश दास यद्यपि बहुजन
समाज पार्टी के लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से अभी से ही चुनाव प्रचार
में उतर गए हैं तथापि वैश्य समाज में नए समीकरणों के कारण
उन्हें लखनऊ से चुनाव लड़ने पर अभी भी संशय कायम हैं। नया
समीकरण यह है कि समाजवादी पार्टी छोड़कर बसपा में आए दूसरे
प्रभावशाली वैश्य नरेश अग्रवाल लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से ही
चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं। इस इच्छा के प्रति उनके अपने
दावे हैं जो अखिलेश दास के दावों से बहुत अधिक मजबूत माने जाते
हैं। बताते हैं कि नरेश अग्रवाल ने अपनों के बीच में यह इच्छा
जता भी दी है कि यदि उन्हें लखनऊ से लोकसभा चुनाव लड़ाया जाता
तो यह उनके लिए सर्वाधिक उपयुक्त होता क्योंकि लखनऊ उनके लिए
जीतने वाली लोकसभा सीट है जबकि लखनऊ का मेयर रहने और यहां
राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने के बावजूद अखिलेश दास के लिए यह
मुकाबला आसान नहीं है चाहे वे महीनों से ही लखनऊ के लोगों में
धन की थैलियां खोले हुए हैं।
उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री बाबू बनारसी दास
के पुत्र, लखनऊ के मेयर रहे, कांग्रेस से दो बार राज्यसभा में
गए, यूपीए के मंत्रिमंडल में केंद्रीय राज्यमंत्री रहे,
व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के मालिक और बिल्डर के रूप में
अपना बड़ा आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने वाले अखिलेश दास भले ही
लखनऊ में पले बढ़े हों और यहीं से अपने राजनीतिक जीवन की
शुरूआत करते हुए कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति तक पहुंचे हों,
लेकिन उन्होंने अभी तक किसी भी सीधे चुनाव का सामना नहीं किया
है। राजनीतिक रूप से लखनऊ में कांग्रेस के रूप में अपने कुछ
सभासद तैयार करने से ज्यादा या लखनऊ में कांग्रेस कमेटी को
अपनी जेबी कमेटी बनाने से ज्यादा सफलता उनके खाते में दर्ज
नहीं है। राज्यसभा का दूसरा चुनाव भी उनके लिए भारी पड़ जाता
यदि उस चुनाव में मतदान हो गया होता। अखिलेश दास ने सीधे चुनाव
में पूर्व पुलिस अधिकारी मंजूर अहमद को कांग्रेस प्रत्याशी के
रूप में लखनऊ के मेयर का चुनाव लड़ाकर अपनी राजनीतिक हैसियत की
असफल थाह ले ली है। भारी धन-बल लगाकर भी वे मंजूर अहमद को लखनऊ
के मेयर का चुनाव नहीं जितवा पाए, यहीं से कांग्रेस का उनसे
मोहभंग शुरू हो गया।
अपना उल्लू सीधा करने के लिए सपा को छोड़ कर बसपा के
साथ आए नरेश अग्रवाल और कांग्रेस से निकल कर बसपा में दाखिल
हुए अखिलेश दास गुप्ता वैश्य समाज में भ्रष्ट राजनीतिक
अवसरवादियों के लिए सर्वाधिक आदर्श माने जाते हैं। इससे पहले
इन दोनों की एक और बाद में अलग-राहें हुईं। आज ये दोनों एक ही
प्रकार की राजनीतिक बीमारी के शिकार होकर अपना आर्थिक
साम्राज्य बचाने के लिए बसपा की शरण में आ गए हैं। बसपा
अध्यक्ष मायावती ने इन्हें वैश्यों का तारणहार जानकर और लोकसभा
टिकट की मनमानी कीमत वसूल करके इनमें से एक अखिलेश दास को लखनऊ
लोकसभा क्षेत्र से और दूसरे नरेश अग्रवाल को फर्रुखाबाद लोकसभा
क्षेत्र से बसपा का प्रत्याशी तो घोषित कर दिया है किंतु इनके
सामने कांग्रेस और सपा से संयुक्त चुनौती आ खड़ी हुई है जिसका
मुकाबला करने की इन दोनों में क्षमता नहीं दिखती भले ही इनके
खाते में एक मुश्त दलित वोट पड़ा हो।
कांग्रेस में रहने के दौरान ही अखिलेश दास की लखनऊ
लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की इच्छा रही है। इसलिए उनकी
दिलचस्पी और राजनीतिक सक्रियता हमेशा लखनऊ शहर कांग्रेस कमैटी
में ज्यादा रही। इसके बावजूद वे लखनऊ में राजनीतिक तौर पर अपना
प्रभाव कायम नहीं कर सके। मंजूर अहमद के लखनऊ के मेयर के चुनाव
में उनकी सारी राजनीतिक पोलपट्टी खुल गई। कांग्रेस में भी इस
चुनाव को लेकर उनकी खूब छीछालेदर हुई और वे कांग्रेस हाईकमान
की नज़रों में गिर गए। इस बीच उन्होंने धन के बल पर मायावती के
यहां घुसपैठ की, जिसका पता लगने पर यूपीए के मंत्रिमंडल से
बाहर कर दिए गए। इससे पहले कि उन्हें कांग्रेस से भी निकाला
जाता, मायावती से लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से बसपा प्रत्याशी का
टिकट खरीद कर राज्यसभा से इस्तीफा देकर माया बहन की शरण में
पहुंच गए।
बसपा में आने और उसका लखनऊ से प्रत्याशी घोषित हो जाने
के बाद भी अखिलेश दास की राजनीतिक मुश्किलें कम नहीं हुई हैं।
उन्हें राजनीति के चालाक खिलाड़ी नरेश अग्रवाल का डर भी सता
रहा है कि कहीं वह मायावती को उनसे ज्यादा पैसा देकर उनका ऐन
चुनाव के मौके पर लखनऊ से पत्ता साफ न करा दें। सब जानते हैं
कि पैसा मायावती की सबसे बड़ी कमजोरी है और पैसे के सामने
नैतिकता सिद्घांत और वफादारी के लिए बसपा में कोई जगह नहीं है।
इसके अलावा भी नरेश अग्रवाल राजनीतिक रूप से अखिलेश दास से
ज्यादा शक्तिशाली और रणनीतिज्ञ माने जाते हैं। कांग्रेस में भी
नरेश अग्रवाल का पलड़ा ही ज्यादा भारी था, भले ही एक समय
अखिलेश दास तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी से
राज्यसभा सीट हासिल करने मे सफल रहे हों।
नरेश अग्रवाल लखनऊ के पड़ौसी जिले हरदोई के रहने वाले
हैं। उन्होंने हरदोई विधानसभा से कई प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव जीते
हैं। इसके अलावा हरदोई और लखनऊ की राजनीति और वैश्य समाज में
अखिलेश दास से कहीं अधिक प्रभाव रखते हैं। नरेश अग्रवाल की भी
शुरू से इच्छा रही है कि मौका मिले तो लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से
चुनाव लड़ें। बसपा से राजनीतिक जोड़तोड़ में देर कर जाने के
कारण नरेश अग्रवाल को लखनऊ लोकसभा से चुनाव लड़ने का मौका नहीं
मिल सका। लखनऊ से बसपा प्रत्याशी के रूप में एक अवसर उनके हाथ
आया था जिसपर अखिलेश दास ने मौका मार दिया।
नरेश अग्रवाल को बसपा ने फर्रुखाबाद से मैदान में उतारा
है। यह क्षेत्र वैश्य बाहुल्य तो है लेकिन न तो नरेश अग्रवाल
यहां स्थानीय प्रत्याशी की तरह उतने स्वीकार्य हैं और न
फर्रुखाबाद नरेश अग्रवाल के लिए लखनऊ जैसा महत्वपूर्ण माना
जाता है। वैसे भी नरेश अग्रवाल हरदोई और लखनऊ छोड़कर किसी अन्य
जगह में कोई दिलचस्पी नहीं रखते हैं। लखनऊ में वह रहते हैं और
यहां पर उनके व्यवसाय से लेकर सामाजिक संबंधों का व्यापक
क्षेत्र है जबकि अखिलेश दास लखनऊ के मेयर कहलाने के बावजूद अभी
भी नरेश अग्रवाल जैसे प्रभाव और प्रसिद्घि से कोसों पीछे हैं।
छवि दोनों की ही अच्छी नहीं मानी जाती है। दोनों पर ही अनैतिक
रूप से लखनऊ में जमीन-जायदाद का साम्राज्य खड़ा करने का आरोप
है जिसमें अखिलेश दास का अमीनाबाद के झंडे वाला पार्क का
घोटाला हमेशा उनका पीछा करता है। घोटालेबाजी में नरेश अग्रवाल
भी कम नहीं है लेकिन उनकी गिनती सीधे चुनकर आने वाले नेताओं
में होती है और वह लखनऊ में अच्छा खासा प्रभाव रखते हैं इसलिए
इनकी बहुत सी बातें दबी हुई हैं।
नरेश अग्रवाल अपने खास लोगों के बीच में लखनऊ की चर्चा
भी करते हैं। उनके कार्यकर्ता भी यही चाहते हैं कि वह
फर्रुखाबाद के बजाय लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ते तो
ज्यादा अच्छा होता। यहां-वहां की जनता भी जानती है कि
फर्रुखाबाद में नरेश अग्रवाल को राजनीति नहीं करनी है, उन्हें
केवल यह लोकसभा सीट हासिल करने के लिए ही लड़ाया जा रहा है
जबकि नरेश अग्रवाल लखनऊ को अपनी लोकसभा सीट बनाने की इच्छा
रखते आए हैं। नरेश अग्रवाल का पुत्र भी राजनीति में उतर चुका
है, जिसे नरेश हरदोई से विधायक बनवाना चाहते हैं, और अपने लिए
वह कोई ऐसा लोकसभा क्षेत्र चाहते हैं जो उनके सर्वाधिक अनुकूल
हो जिसमें लखनऊ सबसे उपयुक्त माना जाता है। लखनऊ में अटल
बिहारी वाजपेयी चुनाव लड़ते रहे हैं यदि वह चुनाव नहीं लड़ते
हैं तो यहां से भाजपा की चुनौती उतनी मजबूत नहीं होगी जिसका
लाभ नरेश अग्रवाल को तो मिल सकता है लेकिन अखिलेश दास को नहीं
मिल सकता जो कि अपना मेयर तक नहीं जितवा सके। ऐसे ही कुछ तर्क
बसपा हाईकमान के दिमाग में भी चल रहे बताए जाते हैं। अब यह
फैसला मायावती को करना है कि इन दोनों वैश्य नेताओं के बीच वह
किस प्रकार राजनीति तालमेल बैठाएं और तय करें कि किसको कहां से
लड़ाया जाना उपयुक्त होगा।
अखिलेश दास और नरेश अग्रवाल उत्तर प्रदेश की वैश्य
राजनीति के ऐसे मोहरे हैं जिन्होंने आगे बढ़ने के लिए सर्वाधिक
जोड़तोड़ का सहारा लिया और अपनी आर्थिक प्रगति के लिए भ्रष्ट
तरीकों का इस्तेमाल किया। अखिलेश दास पर लखनऊ में और लखनऊ के
बाहर अनैतिक तरीके से अकूत संपत्ति जमा करने का आरोप है तो
नरेश अग्रवाल पर भी इसी तरह के आरोप हैं। दोनों नेताओं को
हमेशा किसी जांच का सामना करने का डर सताता रहा है। मायावती के
दल में यह दोनों नेता यूं ही नहीं आ गए हैं बल्कि इन्हें यह भी
डर था कि मायावती एक के आर्थिक साम्राज्य और इंजीनियरिंग
कालेजों को फंसा सकती है और दूसरे के परिवहन मंत्रित्वकाल में
हुई बड़ी घपलेबाजियों की जांच कराकर उन्हें बर्बाद कर सकती है।
दोनों नेताओं ने मौके की नजाकत को देखते हुए बसपा का दामन थाम
लिया है और वैश्य समाज को बसपा से जोड़ने की राजनीति शुरू कर
दी है। इसके साथ इन दोनों नेताओं में एक राजनीतिक
प्रतिद्वंद्विता भी सर उठा रही है जिसमें इन दोनों के सामने
अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में सफल होने की बड़ी चुनौती है।
देखना है कि नरेश अग्रवाल बसपा की राजनीति में अखिलेश
दास को गुरु मानते हैं या उन्हें बाहर करके लखनऊ लोकसभा
क्षेत्र से चुनाव लड़ने में सफलता पाते हैं। कहा यही जा रहा है
कि अभी लखनऊ से अखिलेश दास गुप्ता भी दुविधा में हैं भले ही वह
लखनऊ में अभी से धुआंधार चुनाव प्रचार में लग गए हों। लखनऊ से
बसपा का टिकट हासिल करने में नरेश अग्रवाल भी कोई कोर कसर
छोड़ने वाले नहीं है। इस सबके बावजूद एक बात दोनों के लिए
चिंता का कारण है और वह यह कि उत्तर प्रदेश में मायावती के लिए
चुनावी मुकाबला अब कोई आसान नहीं रह गया है, वैसे भी ये दोनों
नेता सपा और कांग्रेस के संयुक्त निशाने पर हैं।

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