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राज ठाकरे ने जो पाया,
सब गंवाया
स्वतंत्र आवाज़ डॉटकाम ब्यूरो
मुंबई। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने
महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमला करके महाराष्ट्र की
विलासराव देशमुख सरकार और केंद्र सरकार की स्थिति को सांप छछूंदर
जैसा बना दिया है। कई दिन तक महाराष्ट्र में राज ठाकरे और उसके
समर्थकों के हिंसक उत्पात के बाद केन्द्र सरकार को यह लगा कि उसे
महाराष्ट्र सरकार से कहना चाहिए कि वह महाराष्ट्र में इस हिंसा
के लिए दोषी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। लेकिन अब बहुत
देर हो चुकी है। केंद्र और महाराष्ट्र की सरकार ने यदि समय रहते
राज ठाकरे के पेंच कसे होते तो इस आर्थिक नगरी में यह नंगा नाच
नहीं होता। राज ठाकरे ने अपनी स्थिति और ज्यादा कमजोर कर ली है
क्योंकि उन्हें राजनीति में आगे बढ़ने के लिए अमरीका या लंदन के
लोगों की नहीं बल्कि भारतीयों की ही जरूरत होगी। इसमें वह खासतौर
से उत्तर भारतीयों का विश्वास खो चुके हैं।
शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने राज ठाकरे के आरोपों को
मूर्खतापूर्ण बताते हुए अपने को इस विवाद से बहुत दूर रखा है
क्योंकि वह समझते हैं कि मुंबई में उत्तर भारतीयों की उपेक्षा
करके और उनके खिलाफ कोई भी अभियान चलाने से अब कोई लाभ होने वाला
नहीं है। उनसे अलग होकर महाराष्ट्र
नवनिर्माण
सेना बनाने वाले राज ठाकरे ने मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ
जो मोर्चा खोला है उससे उन्हें कोई राजनीतिक फायदा होगा कि नहीं
यह तो किसी चुनाव में ही पता चलेगा। लेकिन उन्होंने महाराष्ट्र
के बाहर अपनी राजनीति स्थिति को विवादास्पद जरूर बना दिया है।
ऐसा ही मोर्चा कभी शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने खोला था। लेकिन
उनको भी महाराष्ट्रियों का उत्साहजनक समर्थन नहीं मिला था। राज
ठाकरे जिस प्रकार से उत्तेजनात्मक भाषण देकर बाल ठाकरे की जगह
लेना चाहते हैं यह सपना उनका शायद ही पूरा हो सके क्योंकि बाल
ठाकरे को ही बाल ठाकरे तक पहुंचने में अस्सी साल लगे हैं।
राज ठाकरे का राजनीतिक संघर्ष उन महत्वाकांक्षाओं पर
आधारित माना जाता है जिन्हें वह बाल ठाकरे से हासिल करने में
वंचित रह गये। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में कोई समर्थन नहीं मिला
जिसे वह समर्थन कह रहे हैं वह उस परिवार से अलग होने पर उपजी एक
तात्कालिक सहानुभूति थी जो आज खत्म हो चुकी है और जो लोग शिवसेना
को छोड़कर इधर-उधर भटक रहे थे वह फिर से बाल ठाकरे के दरवाजे
खटखटा रहे हैं क्योंकि बाल ठाकरे ने जो महाराष्ट्र के लिए संघर्ष
किया है वह राज ठाकरे ने देखा ही नहीं है। यदि बाल ठाकरे के
पुत्र उद्धव ठाकरे भी राज ठाकरे के नक्शे कदम पर चलने की कोशिश
करे और बाल ठाकरे जैसा ही आचरण करे तब उन्हें भी वैसा ही सम्मान
नहीं मिलने वाला जो आज बाल ठाकरे को मिला हुआ है।
शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने राज ठाकरे को शिवसेना की
राजनीति की उंगली पकड़कर चलाना सिखाया है। उन्होंने राज ठाकरे से
भी ज्यादा ताकत के साथ महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों की घुसपैठ
से लोहा लिया है लेकिन उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा है कि
पूरी तरह से महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के प्रवेश को नहीं
रोका जा सकता है। महाराष्ट्र में फिल्म निर्माण से लेकर वहां की
व्यवसायिक गतिविधियों में आज उत्तर भारत की महत्वपूर्ण भूमिका
बनती जा रही है। सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के घर पर राज ठाकरे के
गुंडों ने जिस प्रकार से हुड़दंग मचाया उससे राज ठाकरे को फायदे
की जगह नुकसान ज्यादा हुआ है। राज ठाकरे का कोई भी राजनीतिक दल
समर्थन लेते हुए दस बार सोचेगा क्योंकि वहां की सभी राजनीतिक
दलों में उत्तर भारतीय लोग पूरी ताकत से घुसे हुए हैं। कई जगह
ऐसी है जहां की राजनीतिक स्थिति को उत्तर भारतीय पूरी तरह
प्रभावित करते हैं।
कई दिन से मुंबई में हिंसा जारी है और राज ठाकरे समझ रहे
हैं कि उन्होंने बहुत बड़ी सफलता हासिल कर ली है। राज ठाकरे को
जिन लोगों का समर्थन है वह चाहते ही यह हैं कि राज ठाकरे अपनी
अलग ढपली बजाते हुए एक दिन घर बैठ जाएं। शिव सेना प्रमुख बाल
ठाकरे ने भी उनको कई बार यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह
कांग्रेस के साथ खड़े होकर जो कर रहे हैं उससे उन्हें कुछ हासिल
होने वाला नहीं है। यह बाल ठाकरे का बड़प्पन कहा जाएगा कि जिस
प्रकार राज ठाकरे ने इस परिवार के खिलाफ मोर्चा खोला है उस पर
बाल ठाकरे ने अपनी ओर से कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी। आज राज
ठाकरे जिस अंदाज में महाराष्ट्र का नेता बनने निकले हैं इस तरह
से उन्हें कोई राजनीतिक सफलता मिल पाएगी इसमें संदेह है।
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