नमस्कार!
‘स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम’ ‘ज़माने की आवाज़ ज़माने के साथ’
खोजपूर्ण समाचार, विश्लेषण और विचारों के अलावा यह आपके
दैनिक जीवन में घुला-मिला हिंदी समाचार पोर्टल है, जिसे मैं
विनम्रतापूर्वक अपने श्रद्धेय गुरूजनों, माता-पिता और आपको
समर्पित करता हूं।
मीडिया
जगत में इस समय जागरूकता और एक क्रांति आ रही है। विकास के लिए
क्रांति बहुत जरूरी होती है। यह बदलाव का बिगुल है। आज हम पल
भर में दुनियाभर में पहुंच जाते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ अपनी
सीमाओं में चलना और जिम्मेदारियों को समझना उससे भी ज्यादा
जरूरी है और चुनौतीपूर्ण है। मानते हैं? मीडिया में अशांति को
शांति में, हर्ष को विषाद में बदल देने की गजब की शक्ति है।
हमारा एक ही शब्द किसी अवसाद में डूबे हुए के लिए उत्तरदान बन
जाता है। हमें पढ़कर बच्चे अपनी शैक्षणिक गतिविधियों को
विस्तार देते हैं, छात्र अपनी अखिल भारतीय सेवाओं आईएएस,
आईपीएस एवं अन्य व्यवसायिक परीक्षाओं और प्रतियोगिताओं की
तैयारियां करते हैं। हम दैनिक जीवन की सलाह देते हैं, मनोरंजन
करते हैं तो कभी-कभी पाठकों को चिढ़ा भी जाते हैं। एक मीडिया
मैन या मीडिया संस्थान को अपने ऊपर इन जैसी सारी जिम्मेदारियों
को साथ लेकर चलना कैसा लगता है? इसीलिए तो मीडिया का सर्वत्र
महत्व है।
मीडिया के
विभिन्न क्षेत्रों में पेशेवर संस्थान तेजी से आगे बढ़ रहे
हैं, मगर दूसरे व्यवसायिक संस्थान और कुछ ‘ऐसे भी’ इस क्षेत्र
में घुसपैठ कर रहे हैं जिनके उद्देश्य बहुत सीमित और मतलब
परस्त हैं। देखा जा रहा है कि अपने व्यवसायिक हितों की रक्षा
के लिए धन के बल पर मीडिया के इस्तेमाल की एक श्रृंखला शुरू हो
गई है। आज पत्रकारिता की परिभाषा भी अपने हिसाब से तय करने की
कोशिश की जा रही है। इसमें पत्रकारिता बेहद कमजोर और अकेले
पड़ती जा रही है। जिनके पास कलम है, वह आज लिखने के लिए मोहताज
हैं या कलम से ‘अनैतिक समझौते’ करने को मजबूर हैं। अब ऐसे में
क्या तो साहित्य की रचना होगी और क्या पत्रकारिता का धर्म
बचेगा। इस विषय पर गंभीर विचार और उस पर ध्यान देने की
आवश्यकता है।
आज
पत्रकारिता के नाम पर बड़े पुरस्कार पाने के लिए कुछ तथाकथित
बड़े पत्रकार या मीडिया संस्थान सत्ता के गलियारों और
देश-विदेश में अपनी मार्केटिंग करा रहे हैं। इनमें राज्यसभा या
अन्य प्रतिष्ठित संस्थाओं में कोई पद हासिल करने के लिए जो
मारामारी हो रही है उससे पत्रकारिता के प्रतिष्ठित पुरस्कारों
की गरिमा और महत्व पर सवाल खड़े हो चुके हैं। मार्केटिंग या
अनैतिक अभियान से हासिल किए गए ऐसे पुरस्कार चाहे जितने बड़े
ही क्यों न हों मगर ये ऐसे शोभायमान नहीं हो सकते जैसे हंसों
के बीच में बगुला। हमारे असली पद्मश्री या पद्मविभूषण आज भी
वही हैं और रहेंगे जो अपने कड़े संघर्ष से पत्रकारिता को समाज
का सशक्त पहरेदार और मार्ग दर्शक बनाते-बनाते खुद गुमनामी में
चले गए हैं। इन्हीं के तपोबल के कारण पत्रकारिता में घुसपैठिए
एक समय बाद जरूर बेनकाब होंगे।
पत्रकारिता
की पेशेवर कार्यप्रणाली बिल्कुल बदल रही है और इस बदलाव में सब
एक दूसरे के आगे-पीछे चल रहे हैं। मीडिया का एक वर्ग झूठ और
जहर को सच के रूप में परोसने की अनाधिकृत चेष्टा कर रहा है। इस
कारण मीडिया के लोगों का समाज में विश्वास और मान-सम्मान भी
गिरता जा रहा है, पेशेवर अनुशासन तो तार-तार हो ही रहा है।
समाचार विचार और विश्लेषण पढ़ने और उनका मतलब समझने वाला वर्ग
आज पहले से कहीं ज्यादा जागरुक, योग्य और तेज है, जिस पर कोई
भी कहानी या नकल थोपी नहीं जा सकती फिर भी इस सच्चाई को
नजरअंदाज करने की बेशर्म कोशिश की जा रही है। आज हमारे सामने
देश और समाज के जागरूक वर्ग को अपनी लेखनी के विश्वास से
जोड़ने और उस विश्वास को कायम रखने की कड़ी चुनौती है। हम यह
दावा तो नहीं करते कि हम ही पत्रकारिता के मानदंडों पर खरे
उतरने वाले हैं, लेकिन इसकी कोशिश जरूर करेंगे और उसे अंजाम तक
पहुंचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
विकारों
का वायरस केवल पत्रकारिता के क्षेत्र में नहीं आया है, देश के
राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में भी हम सभी भ्रष्टाचार, आतंकवाद,
विघटन, आर्थिक, जातीय और सामाजिक विषमताओं के बियावान में जा
रहे हैं। देश और समाज को जिनसे इन विषमताओं का सामना करने की
उम्मीद थीं, वे इस बियावान से बाहर निकालने के बजाय खुद ही
इसमें और ज्यादा धंसते जा रहे हैं। आज निजी महत्वाकांक्षाओं का
भारी दबाव हमारी शासन और न्याय व्यवस्था के लिए खतरा बन रहा
है। राजनेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार की चर्चाएं चौराहों
पर होती हैं। राजनीतिक दलों ने सत्ता पर कब्जा करने के लिए
सारी मान-मर्यादाएं ताक पर रख दी हैं। साहसिक और न्यायप्रिय
फैसले लेने वाले पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री,
इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसों की
बहुत जरूरत है। मीडिया देश में राष्टवादी और योग्य लीडरशिप के
निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और उसे अपनी
यह जिम्मेदारी मानकर अपने को श्रेष्ठ साबित करना होगा।
स्वतंत्र आवाज़ डॉट
कॉम न तो कोई तहलका मचाने जा रहा है और ना ही यह किसी
स्टिंग आपरेशन का प्लेटफार्म है। हमारी दृष्टि में किसी भी
अखबार, चैनल या पत्रकार का कार्य प्रैक्टिकल करना है ही नहीं,
जैसा कि आज हो रहा है। स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम, पत्रकारिता के
धर्म के साथ देश दुनिया के सामने यथार्थ को प्रस्तुत करने की
पूरी कोशिश जरूर करेगा, उसके लिए हमें चाहे जिन बड़ी शक्तियों
का भी सामना करना पड़े। हम यह मानते हैं कि इसमें आपके सहयोग
के बगैर हमारा कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता। अगर हम गुमराह
हो रहे हों और न्याय से भटकते नजर आ रहे हों तो आप हमारे
लोकपाल हैं। आपके पास हमारा ई-मेल है, आप इसे इस्तेमाल कीजिए,
क्योंकि यह आपकी ही आवाज़ है।
ये
लाइने लिखते हुए मुझे उन महान
मार्गदर्शकों, सहयोगियों, शुभचिंतकों और अपने गुरुजनों की याद
आ रही है, जिनसे हमने अपने जीवन के मूल्य और आदर्श निश्चित किए
हैं। मुझे मेरे गुरू मरहूम अंज़ारूल ह़क सिद्दीकी का ध्यान आ
रहा है जो एक महान शिक्षाविद्, विचारवान, अनुशासन और
न्यायप्रिय थे। मुझसे बहुत स्नेह रखते थे। भाई अशोक मधुपजी,
श्री खुशीराम गौतम जिनका पत्रकारिता के शुरूआती जीवन में मुझे
बहुत सहयोग मिला है। स्वर्गीय राजेंद्रपाल सिंह कश्यप,
स्वर्गीय बाबू सिंह चौहान, स्वर्गीय मुनीश्वरा नंद त्यागी,
मशहूर शायर निश्तर खान काही, श्री विश्वामित्र शर्मा, भाई
चंद्रमणि, सूर्यमणि, पारेश भाई, डॉ गिरिराज शरण अग्रवाल,
जयनारायण अरुणजी, श्री जलील अहमद सलमानी, भाई नरेंद्र कुमार
मारवाड़ी, श्री भोलानाथ त्यागी, श्री सुरेंद्र गर्ग, श्री शिव
कुमार शर्मा, जिनके बीच मैंने अपनी पत्रकारिता का बचपन गुजारा
है। स्वर्गीय वैद्य राम कुमार शर्मा और हम सभीके बीच हर पल
मौजूद रहने वाले जुनूनी पत्रकार स्वर्गीय हरीश खुराना प्रेमी
भी मेरी पुरानी यादों में मेरे सामने हैं। मैं अपने पत्रकारिता
जीवन में श्री रामकृपाल सिंह और श्री कमर वहीद ऩकवी के सहयोग
का भी आभारी हूं। प्रमुख राजनेता और उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व
मुख्यमंत्री स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणाजी को याद करता हूं,
जिनमें मैने गजब की याददाश्त और प्रेरणा का आदर्श भाव देखा है।
मुझे उनसे संपर्क का बहुत कम अवसर मिला लेकिन जब भी मेरी उनसे
मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझे हमेशा पत्रकारिता में नैतिक बल
को ऊंचा रखने की प्रेरणा दी। मेरे जीवन का यह संक्षिप्त फलसफा
देश के प्रमुख राजनेता श्री नारायणदत्त तिवारी जी का जिक्र किए
बिना अधूरा है जिन्होंने मुझे हमेशा अपना भरपूर प्यार और सहयोग
दिया है।
‘स्वतंत्र
आवाज़ डॉट कॉम’ में और क्या अच्छा हो सकता है, मैं
हमेशा आपके महत्वपूर्ण सुझावों की प्रतीक्षा और स्वागत करूंगा।
मेरे इन प्रयासों पर आप अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया जरूर
भेजिएगा।