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इकतीस मार्च की ही प्रतीक्षा क्यों?
लखनऊ।
मालूम है? वित्तीय वर्ष के आखिरी दिन करोड़ों रुपये की सरकारी
खजाने से निकासी होती है। यह निकासी प्रदेश में चल रहे विकास
कार्यों के भुगतान के लिए है। हर साल होता आया है कि मार्च की 31
तारीख को ही राजकोष से इतनी बड़ी राशि का लेन-देन होता है। अगर
इस दिन सार्वजनिक छुट्टी भी रही तो भी कोषागार बंद नहीं रहते
बल्कि उस दिन और ज्यादा काम काज होता है- रात भर रोकड़िया जागते
हैं और श्रृंखलाबद्ध भुगतान होता है। यह परम्परा मुद्दत से चली आ
रही है कि पूरे साल काम नहीं होता और जब 31 मार्च आती है तो
करोड़ों के चेक उसी दिन काट दिये जाते हैं। कोषागारों में जाकर
देखिये तो आपको एक अजीब नजारा देखने को मिलेगा। वहां भुगतान के
लिए एक अफरातफरी दिखायी पड़ती है और
कोषागार के कोषाधिकारी अपनी
अकड़ में दिखते हैं, आखिर धन की निकासी का जो मामला है।
कोषागारों में रात भर काम चलता रहता है और कहीं-कहीं तो हफ्ते भर
तक लेखाबंदी भी नहीं होती। जानते हो ऐसा किसलिए है? 31 मार्च को
पुराने साल का लेखा जोखा तय होता है। इस दिन अगर विकास मद में
पैसा जारी नहीं हुआ तो बजट में प्राविधानित विकास कार्य भी नहीं
हो सकते हैं और आवंटित धन पीएलए में चला जाता है। यह पैसा आखिर
31 मार्च को धुआंधार तरीके से रिलीज क्यों होता है इस तथ्य के
पीछे कुछ ऐसी चीजें हैं जो शंकाओं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती
हैं और मूल रूप से विकास कार्यक्रमों को ही बाधित करती हैं।
विभिन्न सरकारी विभागों ने अगर पूरे वित्तीय वर्ष बगैर खर्चे के
ही गुजार दिये और बाद में वह पैसा पीएलए में चला गया तो इसमें
किसका दोष?
विधान सभा में जब बजट पारित होता है तो उसमें किसी भी काम में धन
आवंटन का प्रावधान होता है। विभाग के सामने यह बंदिश नहीं होती
कि उसे 31 मार्च के आसपास ही वह धन खर्च करना होगा। लेकिन होता
बिल्कुल इसके विपरीत है आवंटित धन पूरे साल नहीं मिला या उसे
खर्च करने का प्रोजक्ट तैयार नहीं था या प्रोजेक्ट में हेराफेरी
की जाती रही। क्या गारंटी है कि जिन योजनाओं के लिए धन दिया गया
है वह 31 मार्च तक सकुशल पूरी हो गई या हो जायेंगी। सचिवालय,
योजना भवन, जवाहर भवन में चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग, सहकारिता
विभाग, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग जैसे कई विभागों के
मुख्यालयों में चेक काटने का काम जिस गति से होता है, एक बार को
उससे लगता कि जैसे प्रदेश में विकास परियोजनाओं के क्रियांवयन की
बयार चल पड़ी हो। राज्य या जिला मुख्यालयों पर सड़कों के निर्माण
और उनकी मरम्मत का जिस गति और अफरातफरी से काम चलता है या चल रहा
है, वह देखने काबिल है। राज्य में विभिनन परियोजनाओं को पोषित
करने वाली विभिन्न एजेंसियां इस दौरान यहां का भ्रमण करें तो वह
एक बार विकास की गति देखकर चक्कर खा जायेंगी। लेकिन उन्हें यह
शायद ही मालूम होगा कि यह विकास कार्य कम बल्कि इन परियोजनाओं को
आवंटित धन का निपटारा ज्यादा किया जा रहा है। विकास कार्यों के
साथग गुणवत्ता के मामले में हमेशा भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलती
रही हैं। योजना आयोग के सामने विचार रखा
गया
है कि विकास
के साथ-साथ गुणवत्ता भी जरूरी है और विकास दर प्राप्त करने के
लिए ढांचागत विकास दर हासिल करनी बहुत आवश्यक है।
अर्थव्यवस्था
में प्रतियोगिता होने के कारण
ढांचागत क्षेत्र की कार्यक्षमता बहुत ही निर्णायक है क्योंकि
प्रमुख क्षेत्रों में ऐसी सेवाओं में खराब गुणवत्ता ने आर्थिक
क्षेत्र में विकास की काफी रूकावटें पैदा की हैं। बजट को एक ही
बार में निपटाने के चक्कर में विद्युत व्यवस्था सड़क रेल और
सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के निर्माण में उनकी गुणवत्ता काफी
प्रभावित हुई है। आर्थिक सहायता में कमी और व्यवस्थित सुधारों की
कम बहुत धीमी गति के कारण ही हाल के वर्षों में गुणवत्ता युक्त
विकास की परिस्थितियां और ज्यादा खराब हुई हैं। इसलिए इस क्षेत्र
की गुणवत्ता और सामर्थ बढ़ाने के लिए सुधार कार्यक्रमों की भी
उतनी आवश्यकता है, जितनी बजट का धन रिलीज करने में होती है।
विकास योजनायें बनाते समय इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया
जाता है कि विकास योजनाओं को समय से और गुणवत्ता युक्त पूरा करने
के लिए समयबद्ध धन की निकासी की बहुत आवश्यकता है। यह क्या बात
हुई कि बजट का धन खर्च करने के लिए 31 मार्च की ही प्रतीक्षा की
जाती है।
सरकारी क्षेत्र में यह एक गंभीर बीमारी है, जिसमें समयबद्ध विकास
कार्यक्रम नहीं चलाने के कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
आधी अधूरी परियोजनाओं को पूरा दिखाकर धन का भारी दुरुपयोग होने
की संभावना बनी रहती है। यह विचारणीय है कि 31 मार्च को इतने
बड़े धन का लेन देन किस प्रकार विकास की गति हो सकता है। यह भी
एक भारी चिंता का विषय है कि बजट प्रावधान बदलते रहते हैं जिससे
यह संशय बना रहता है कि किस मद में कितनी रकम अवमुक्त होनी है।
निर्धारित विकास कार्यों का संपादन साल भर में क्यों नहीं हुआ यह
हमेशा चिंता का विषय बना रहेगा। पर इसके उपचार की पहल कौन करे?
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