सायमंड्स विवाद ने खोली दुनिया की आंखें

himanshu dixit

हिमांशु दीक्षित

 

hindi news portalजज हेनसन ने सायमंड्स के तर्को में उस तर्क पर भारी हैरानी व्यक्त की जिसमें उन्होंने जज के सामने कहा है कि टेस्ट मैच में विरोधी खिलाड़ी के साथ दोस्ताना संबंधों की कोई जगह नहीं है। हेनसन ने उनके इस बयान को यह कहकर खारिज किया है कि यदि यह उनके विचार है तो मुझे आशा है कि सभी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर इसे नहीं अपनाएंगे जब ऐसा होगा तो वह क्रिकेट के लिए दुखद भरा दिन होगा। इस फैसले के बाद क्रिकेट की जीत हुई है और ऐसे प्रयास निष्फल हो गये हैं जिनसे क्रिकेट की दोस्ताना जैसी मूल भावना का दमन हो रहा था। भारतीय क्रिकेट टीम को हरभजन सिंह बड़े खुश होंगे कि वह बरी हो गये हैं। लेकिन चेतावनी उनके लिए भी है कि क्रिकेट केवल बल्ले और गेंद से ही नहीं खेला जाता है उसके लिए सभ्यता और दिल और दिमाग की भी जरूरत होती है। सिडनी की यह घटना क्रिकेट जगत के लिए आंख खोलने वाली घटना कही जाएगी।

सिडनी टेस्ट के तीसरे दिन चार जनवरी को 116वें ओवर के दौरान इस घटना की शुरूआत हुई थी जब हरभजन सिंह ने आस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज ब्रेट ली की पीठ थपथपाई कि जैसे वह कहना चाहते हैं कि बहुत अच्छी गेंदबाजी कर रहे हैं। उसके बाद का घटनाक्रम क्रिकेट प्रेमियों के लिए बहुत ही अप्रत्याशित था, जिसने उन सभी के मुख का स्वाद कसैला कर दिया था, जो क्रिकेट को दुनिया का सबसे बेहतरीन खेल मानकर उसे सपरिवार देखा करते हैं। इस पूरे प्रकरण में एक प्रश्न यह है कि क्या यह आवश्यक नहीं था कि हरभजन सिंह के खिलाफ सायमंड्स एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराते। मगर लगा कि वास्तव में सायमंड्स का उद्देश्य हरभजन सिंह को अपना निशाना बनाना था। क्या सायमंड्स की हरभजन पर नस्लभेदी टिप्पणी जायज थी? सायमंड्स की टिप्पणी ने ही भारतीय गेंदबाज हरभजन सिंह को रह-रहकर उत्तेजित किया था। इस घटनाक्रम का एक सुखद पहलू यह रहा कि भारतीय तनाव में रहने के बावजूद भारत ने पर्थ में जीतकर इस अपमान और इस बेईमानी का बदला भी ले लिया है।
सर्वविदित है कि हरभजन के खिलाफ आस्ट्रेलिया की नस्लभेदी छींटाकशी की शिकायत आस्ट्रेलियाई खिला
ड़ियों के ही विरूद्घ गयी है। हरभजन को दोषी ठहराकर वे इस प्रमुख ऑफ स्पिनर को शायद भारतीय गेंदबाज आक्रमण से आहत करना चाहते थे। भारतीय क्रिकेट टीम के मैनेजर चेतन चौहान का मानना है कि हरभजन ने एंड्रयू सायमंड्स से मैच के दौरान कुछ गलत नहीं कहा था, बल्कि वे हरभजन को गेंदबाजी से अलग करना चाहते थे, क्योंकि हरभजन ने उन्हें कुछ ज्यादा ही परेशान किया है। भारत के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने भी कहा है कि आस्ट्रेलिया के आलराउंडर एंड्रयू सायमंड्स के हरभजन पर नस्लभेदी आरोप से टीम इंडिया बिल्कुल प्रभावित नहीं है।

सायमंड्स के आरोपों से हरभजन पर जो विवाद गहराया था, उससे उनकी खेल क्षमता न के बराबर प्रभावित हुई है। ऐसी घटनाओं से खेल भावना पर पूरे विश्व ने प्रश्न चिन्ह लगाया है, क्योंकि आस्ट्रेलिया इस लोकप्रिय खेल को खेल भावना से प्रेरित होकर नहीं खेला है, बल्कि उसने इसे रणक्षेत्र में युद्घ की तरह से लिया है जिसे हर हाल में जीतना ही होता है, जैसा कि पाकिस्तान टीम के कोच ज्याफ लासन ने कहा कि आस्ट्रेलिया की टीम ने सिडनी में अपने अनुचित व्यवहार से अपने देश की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है। पूरे विश्व में इस टीम को घमंडी माना जाता है। हरभजन सिंह एक प्रतिस्पर्धात्मक खिलाड़ी हैं। सायमंड्स का उद्देश्य जो भी रहा हो, उससे जो विवाद गहराया उसमें झूठे आरोपो के आधार पर हरभजन को दंडित करने पर मात्र विचार करना ही दंडित करना है। यह एक खिलाड़ी या टीम इंडिया पर नहीं बल्कि पूरे देश की नस्लवाद विरोधी छवि पर गहरा आघात है। इस आधार पर आईसीसी की पर्थ टेस्ट में बकनर को हटा, बिली बाउन को अम्पायर नियुक्त करना एक दूरदर्शिता एवं प्रशंसनीय कहा जायेगा। लेकिन बीसीसीआई ने झूठे आरोपों के आधार पर हरभजन को देने जाने वाली सजा के खिलाफ खड़ा होकर भारतीय क्रिकेट को निराशा से बचाया है। यह बात हमेशा के लिए आईसीसी के साथ विरोधी टीम के सदस्यों को भी समझनी होगी।

***

अयोग्य अंपायरों की खबर लेने का खुला रास्ता

 

hindi news siteआस्ट्रेलिया ने भारत से 2-1 से क्रिकेट टेस्ट मैच की यह श्रृंखला अवश्य जीत ली है लेकिन एक प्रश्न हमेशा खड़ा रहेगा कि क्या विजेता टीम भारत की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ प्रदर्शन की दावेदार हो सकती है? पर्थ के बाद भारत का आत्मविश्वास स्पष्ट है। सिडनी टेस्ट के दौरान आईसीसी और बोर्ड के बीच जो टकराव की स्थिति आयी थी वह भारतीय टीम के लिए घातक अनुभव था। लेकिन भारतीय टीम ने एक संघर्षपूर्ण चुनौती के साथ अगले ही टेस्ट मैच में एक करारा जवाब दिया।

काबिलेगौर है यह जीत उस पिच पर हासिल की गयी जो आस्ट्रेलियन गेंदबाजों के करतब दिखाने के लिए टेलरमेड मानी जाती है। जहां पर गेंदबाजों की सफलता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता। भारतीय क्रिकेटरों के जुझारूपन की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने तनाव में रहते हुए यह जीत हासिल की। इसके बाद ही इस पूरे विवाद का पासा ही उलट गया और भारत को अपना सम्मान हासिल हुआ। एडिलेड मैच में आस्ट्रेलियाई टीम में एक टीस और निराशा का भी असर दिखाई दिया। ऐसा लगा कि आस्ट्रेलिया इसे किसी भी तरह से ड्रा करने के चक्कर में लग गया है। आस्ट्रेलियाई टीम ने स्वभाव के विपरीत जाकर सुरक्षात्मक ढंग से इसे खेला और वह इसे ड्रा की ओर ले गयी। ऐसा उसने क्यों किया यह भी आश्चर्य की बात है। जो टीम हमेशा मैच को जीतने के लिए खेलती थी वह ड्रा के बारे में सोचने लगी है?

यह श्रृंखला क्रिकेट अंपायरों के मनमाने फैसलों के खिलाफ अपील की सुनवाई का भी मार्ग प्रशस्त करती है। सिडनी में दूसरे टेस्ट में आस्ट्रेलिया टीम के कप्तान रिंकी पोटिंग ने टॉस जीता और पहले बल्लेबाजी सुनिश्चित की। एक अति प्रतिस्पर्धात्मक मैच का खेल आगे बढ़ा और मैच का पहला दिन समाप्त होते-होते भारत के विरूद्घ कई चौंका देने वाले निर्णय ले लिए गए। इससे भारत ही नहीं, पूरे विश्व में क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेल के प्रति लोगों की खेल भावना को गहरी चोट पहुंची। भारत को पुनः ग्राउंड पर उतरना पड़ा क्योंकि आधे दिन का खेल जो बाकी था। अंत में ड्रा से मैच की समाप्ति हुई। भारतीयों ने कड़ी मेहनत कर पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ अपने खेल को अंजाम दिया किंतु अंपायरी के दंश ने उन्हे कहीं भीतर तक आहत कर दिया। स्टीव बकनर के गलत निर्णय ने भारतीय टीम के दृढ़ इरादों और निष्ठापूर्ण खेल भावनाओं को ध्वस्त कर दिया।

इस संदर्भ में हम पूर्व कोच जॉन राइट के कथन को संज्ञान में ले सकते हैं कि हार के कारण नहीं बल्कि परिस्थितियों में यह परिणाम आया, जिससे भारतीय परेशान थे। भारतीय टीम की हार स्वीकारने में कुछ गलतियों एवं नस्लभेदी विवाद ने टीम इंडिया को अन्याय का अहसास दिलाया। अंपायर स्टीव बकनर का पहले से ही टीम इंडिया के साथ अच्छा रिश्ता नहीं रहा है। अगर यहां कहा जाए कि सिडनी में होने वाले मैच की ये विस्फोटक घटना है या आंखें खोलने वाली घटना है, तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस विषय में सकारात्मक सोच के कारण मैं यही कहूंगा कि यह घटना शायद पूरे क्रिकेट जगत में अंपायरिंग जगत में सुधार पर दृष्टि डालेगी। इससे भारत ही नहीं, पूरा विश्व ही सजग होगा, लाभांवित होगा। चाहे पूर्व क्रिकेटर ज्याफ लासन हो या आस्ट्रेलियन टीम स्पोर्टस हाल ऑफ फ्रेम के सदस्य हों, सभी यह मानते हैं कि पोंटिंग एंड कंपनी का रवैया गलत है और इससे खेल भावना की अंतर्राष्ट्रीय छवि को धक्का लगा है। अंपायर स्टीव बकनर को हटाना शायद इस दिशा में एक सही कदम कहा जाएगा। भारत ने पर्थ में जीत हासिल कर यह भी जता दिया है कि वह तनाव में रहकर भी अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटता, हां अगर कोई बेईमानी ही कर ले तो कोई क्या कर लेगा?

 

फेडरर के सर्वश्रेष्ठ होने पर अभी भी सवाल!
 

news in hindiटेनिस का महान खिलाड़ी रोजर फेडरर तीसरे आस्ट्रेलियन ओपन में भी पराजित हो चुका है। प्रश्न यह उठाया जा रहा है कि क्या यह उसके खेल के अंत की शुरूआत है। जहां तक टेनिस के इस खिलाड़ी की चुनौतियों का सवाल है तो यह विश्व का एक ऐसा खिलाड़ी है जिसने सर्वाधिक लोकप्रियता हासिल की है। जहां तक गणनाओं का प्रश्न है, तो इस स्टार को अब तक के एक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के रूप में आंका गया था। फेडरर को पीटसेंप्रेस ग्रैंडस्लैम मैच में आगे निकलने के लिए दो और ग्रैंडस्लैम जीतने पड़ेंगे।

श्रेष्ठता यानि खेल के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के संबंध में कौन अति उत्तम श्रेणी में है, इस पर कई बार वाद-विवाद गहरा चुका है, अभी भी यह एक विवादस्पद विषय है। इस संदर्भ में यदि टेनिस ‘पंडितों’ की मानें तो उनके अनुसार पीटसेंप्रेस की तुलना में फेडरर ही श्रेष्ठ हैं। इस पर भी एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा है। अनुमान लगाया जाता है, श्रेष्ठता में फेडरर का ही वर्चस्व है। अगर खेल प्रदर्शन के आंकड़ों की भी मानी जाए, तो फेडरर ही इस पंक्ति में सबसे आगे दिखाई देते हैं। क्या फेडरर के खेल की गुणवत्ता को परखते समय टेनिस जगत के दिग्गजों को भी शामिल किया है? टेनिस के धुरंधर खिलाड़ी बोरिस बेकर, पेट रफ्टर, जिम कोरियर तथा अन्य की टेनिस मेधा की चर्चा किये बिना फेडरर के खेल की श्रेष्ठता अधूरी ही मानी जायेगी। अपने समकालीन खिलाड़ियों के अतिरिक्त फेडरर ने इन धुरंधर खिलाड़ियों के खेल के समक्ष अपनी टेनिस प्रतिभा को सिद्घ किया है।

फेडरर के खेल की गुणवत्ता की जांच करते समय इस बात से अनभिज्ञ नहीं रहा जा सकता कि इसी सेम्प्रस ने टेनिस जगत में अपनी धनी प्रतिभा का लोहा मनवा कर ही छोड़ा था, और वाहवाही लूटी थी, जिसे लॉन टेनिस के दिग्गजों को मानने पर बाध्य होना पड़ा था। दूसरी ओर एंडी रोर्डिक तथा लेटिन ह्वविट, इस खेल की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाये थे। वर्तमान में ही एक खिलाड़ी रफायल नेडल ऐसा है, जो फेडरर के लिए एक कड़ी चुनौती दे सकता है, किंतु वहीं धरातल पर एक सच ये भी है कि नेडल ने फ्रेंच ओपन के अलावा कोई भी और ग्रेंडस्लेम नहीं जीता है। तभी से नेडल ने इस मुकाबले में अपनी प्रतिभागिता की चुनौती दी है। हाल ही में फेडरर एवं सेंप्रेस ने श्रृंखला मैचों में एक दूसरे को कड़ी चुनौती दी और संभावित खेलों में फेडरर पर जीत हासिल की है, जो यह विचार करने पर पुनः विवश करती है कि दोनों में कौन श्रेष्ठ है।

सेंप्रेस और फेडरर दोनों ही फ्रेंच ओपन जीतने में असमर्थ रहे हैं किन्तु फ्रेंच ओपन ने इन दोनों खिलाड़ियों की प्रतिभाओं को उजागर किया है मगर इसमें फेडरर के पास ही आगे बढ़ने का अवसर है। फेडरर के पास अभी कुछ वर्षों का खेल शेष है। क्या वो इन मैचों में अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़ सकेंगे? अपनी प्रतिभा को सिद्घ कर श्रेष्ठता प्राप्त कर सकेंगे? इस प्रश्न का उत्तर केवल और केवल समय ही दे सकने में समर्थ होगा। अगर फेडरर अपनी प्रतिभा को साबित करने में सफल हुए तो निश्चय ही वो लॉन टेनिस में अपनी प्रतिभा को साबित करते हुए श्रेष्ठता की सूची में सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं। लेकिन वे संपूर्ण टेनिस खेल पर अपना अधिपत्य जमा पाएंगे, इसमें अभी भी कुछ संशय है। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि टेनिस के लॉन पर जिन खिलाड़ियों की चुनौतियों का सेंप्रेस ने सामना किया था उस श्रेणी के खिलाड़ी फेडरर के युग में नहीं है।

 

टेनिस सुंदरी को झंडा विवाद ने किया निराश


hindi news websiteटेनिस जगत की सुंदरी सानिया मिर्जा एशिया में टेनिस की नंबर वन की खिलाड़ी बन गयी हैं। अपने को एशिया में स्थापित करने तक सानिया मिर्जा का संघर्ष काफी उतार-चढ़ाव और छोटे-मोटे विवादों से भी भरा है। एक मामूली विवाद के कारण वह इस समय काफी दुखी हैं। उनके ताजा दुख का कारण उनका टेनिस में खराब प्रदर्शन नहीं बल्कि उन पर एक आरोप है कि उन्होंने भारतीय ध्वज का अपमान किया है। एक फोटो में सानिया मिर्जा अपने पैर ऊपर उठाए बैठी हैं और उनके पंजो के सामने तिरंगा है। सानिया अपना ध्यान कहीं और गड़ाए हुए हैं लेकिन इस फोटो को अगर ध्यान से देखा जाए तो कहीं से भी नहीं लगता कि सानिया को यह एहसास है कि उसके पैरों के सा
ने तिरंगा है जिसे वह जानबूझकर नजरंदाज कर रही हैं। मगर एक फोटोग्राफर की नजर में यह सनसनीखेज खबर बन गई। इसी फोटो ने टेनिस सुंदरी सानिया मिर्जा की नींद हराम की हुई है।
ग्लैमर की जिंदगी जीने वालों के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह होता है कि उनके बैठने, खाने, पीने, रहने, सोने, बोलने-चालने, घूमने फिरने पर भी सबका पहरा रहता है। उनकी किसी भी बात और एक्शन को खबर के रूप में परोसा जाता है और एक घटना या आदर्श के रूप में देश दुनिया के सामने पेश किया जाता है। उनपर चौबीस घंटे उंगलियां खड़ी रहती हैं। अगर वह स्टार अच्छा परफार्म कर रहा है तो सब कुछ ठीक है और यदि जरा भी चूक हुई तो उसके कपड़े उतार लिए जाते हैं। यानि सब कुछ स्वाह है। सानिया मिर्जा से एक चूक ही हुई है कि वह जहां बैठी हुई थी, वहां पर यह नहीं देख पायी कि उनके पैरों और भारतीय ध्वज का एक हिस्सा एक फोटोग्राफर की नजर में चढ़ा है। जिसे देखकर लगता भी है कि सानिया मिर्जा बेखबर हैं, वे झंडे की तरफ पैर किये हुई बैठी हैं और दूसरों की नजर में यह भारतीय ध्वज का अपमान हो रहा है।
यह सानिया मिर्जा से अनजाने में हुई एक चूक है, जिसको कि भारतीय ध्वज के अपमान का इरादा नहीं कहा जा सकता। सानिया मिर्जा भारत की उन नव वीरांगानाओं में एक हैं, जो भारत की आन-बान और शान के लिए खेल रही हैं और उसने भारत का नाम टेनिस की दुनिया में रोशन किया है। भारतीय झंडे का अपमान एक बेहूदा आरोप ही कहा जाएगा जो आज उस पर चस्पा किया जा रहा है, और इसमें उन कुछ प्रचार माध्यमों की भूमिका बहुत ही गैरजिम्मेदार और आपत्तिजनक है जिन्होंने इस घटना को तिरंगे के अपमान के रूप में प्रचारित किया।
सानिया मिर्जा के पैर की तरफ जो झंडा दिखाई पड़ रहा है उसे देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि सानिया का ध्यान झंडे की तरफ है और वह उसकी उपेक्षा कर रही हैं। सच तो यह है कि उसका ध्यान कहीं ओर है और फोटोग्राफर उसके ध्यान और उसके पैर को झंडे से जोड़कर फोटो खींचने में कामयाब हो गया। कोई भी व्यक्ति यह मानने को तैयार नहीं हो सकता कि सानिया मिर्जा, भारतीय ध्वज का अपमान कर सकती है। वह एक भारतीय खिलाड़ी है और उसकी भावनाओं पर शक करना या उसकी इसे तूल देना केवल एक सनसनी फैलाना है और जब ऐसे सेलिब्रेटी की इन बातों को भी उछालना शुरू किया जाएगा तो उसका उसके खेल पर बुरा असर पड़ना स्वाभाविक है।
ऐसी प्रतिभाओं के साथ ऐसा अक्सर होता रहा है। खासतौर से तब जब वे अपने करियर की उंचाईयों पर होती हैं। यह एक उदाहरण है-भाजपा नेता उमा भारती जब मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री हुईं तो उनके खिलाफ करीब दस साल पुराने मामूली से मामले में कोर्ट के सम्मन को ऐसा मुद्दा बनाया गया कि उमा भारती को कोर्ट में हाजिर होने के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। उनके मुख्यमंत्री बनते ही फाइलों में दबा पड़ा वह सम्मन वारंट के रूप में बाहर आ गया जो कभी दस साल पहले जारी हुआ था। उन दस वर्षों में कभी किसी को उस वारंट की याद नहीं आयी। लेकिन उमा भारती के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचते ही वह सम्मन वारंट बन गया। भारतीय जनता पार्टी के ही नेता लालकृष्ण आडवाणी जब पाकिस्तान गए तो एक फाइल जोरशोर से खुली कि वे वहां किसी मामले में आरोपी बनाये गये थे। जब तक लालकृष्ण आडवाणी राजनीति की मुख्य धारा में नहीं थे तब तक यह आरोप किसी को याद नहीं आया और जैसे ही वह देश के गृहमंत्री हुए और बाद में नेता विरोधी दल हुए तो राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को याद आया कि वह पाकिस्तान के अभियुक्त हैं और उनके शैक्षणिक प्रमाण पत्र भी फर्जी हैं।