बीसीसीआई, अब क्‍या कर रही है कार्रवाई?

  • ‌वि‌पिन कुमार ‌

hindi news siteमुंबई। भारत को आस्ट्रेलिया में लंबे समय बाद जो जीत जो मिली है, बीसीसीआई के अध्यक्ष शरद पवार उससे बहुत खुश हैं। इस खुशी के साथ उनके सामने कुछ चुनौतियां भी आ खड़ी हुई हैं। इनमें एक तो आस्ट्रेलिया में खेल के दौरान खिलाडि़यों में हुई तकरार और बयानबाजियों के कारण पैदा हुई है। दूसरी क्रिकेट खिलाडि़यों की नीलामी के रूप में है। आस्ट्रेलिया के एंड्रयू सायमंड्स और भारत के स्पिनर हरभजन सिंह के झगड़े ने यहां तक नौबत ला दी है कि आस्ट्रेलिया क्रिकेट, बीसीसीआई के सामने इस ज़िद पर अड़ गया है कि वह हरभजन सिंह के विरुद्ध कार्रवाई करे क्योंकि अगर एंड्रयू सायमंड्स दोषी है तो हरभजन सिंह भी अनाप-शनाप हरकतों के लिए जिम्मेदार है। बीसीसीआई के अधिकारी इस पर चुप हैं और अंदर ही अंदर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं।
इस तकरार ने क्रिकेट का खूब मजाक उड़वाया है। आस्ट्रेलिया क्रिकेट के अड़ जाने से यह तो तय है कि बीसीसीआई को भज्जी के खिलाफ कार्रवाई करनी ही होगी नहीं तो इस मामले में फिर और भी पेंच फंसेंगे और बीसीसीआई नहीं चाहेगी कि यह विवाद चलता रहे। आस्ट्रेलिया में क्रिकेट सीरीज के दौरान खिलाडि़यों के व्यवहार और अंपायरों की खुल्लम-खुल्ला बेईमानी से आस्ट्रेलिया की भारी छीछालेदर हुई है। हालॉकि उसके लिए भले ही सायमंड्स, रिकी पोंटिंग और एडम गिलक्रिस्ट जिम्मेदार हों, लेकिन भारत के कुछ खिलाड़ी भी कम नहीं हैं जिनमें कुछ उत्साह में आकर क्रिकेट मैदान पर न केवल बंदरों की तरह से उछलकर क्रिकेट की शालीनता को भूल जाते हैं अपितु उनके बल्ले और गेंद के साथ-साथ उनकी जुबान भी चलने लगती है। यही मुद्दा आस्ट्रेलिया ने पकड़ लिया है, जिस पर बीसीसीआई और उसके क्रिकेटरों को वह घेर रहा है।
आस्ट्रेलिया भारत की नई समस्या है। अभी तक तो भारत और पाकिस्तान के बीच में ही क्रिकेट मैच युद्ध की तरह होते आये हैं। भारत के सामने अब तीसरा देश आस्ट्रेलिया और खड़ा हो गया है। भारत-पाक की टीमों के खिलाड़ी न केवल गाली गलौज का इस्तेमाल करते रहे हैं, अपितु उनका वश चले तो मैदान में ही खेल के साथ-साथ मारपीट में भी हाथ दिखाएं। भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट अधिकारी दोनों टीमों के बीच झगड़े की आशंका से सहमे-सहमे से रहते आए हैं। इन वर्षों को छोड़कर भारत-पाक के बीच क्रिकेट की कोई ऐसी श्रृंखला नहीं है, जिसमें इन खिलाडि़यों के बीच गाली और घूंसे न तने हों, लेकिन अब दूसरे देशों की टीमों में भी शुरू हो गया है। आस्ट्रेलिया की घटनाएं इसका प्रमाण हैं। भज्जी को आस्ट्रेलिया के जज ने आरोपों से बरी कर दिया है, और उन्होंने सायमंड्स को ज्यादा दोषी ठहरा दिया है। यहीं से नए विवाद की शुरूआत होती है और क्रिकेटरों के बीच मूंछों की लड़ाई शुरू हो जाती है।
तेईस साल बाद मौका मिला है, जब भारत फाइनल पर पहुंचकर आस्ट्रेलिया से जीता। इस जीत का एक अलग आनंद होता यदि इस श्रृंखला में कोई विवाद नहीं खड़ा होता। यह श्रृंखला अंपायर की बेईमानी से लेकर खिलाडि़यों में तू-तू मैं-मैं के लिए हमेशा जानी जाएगी। इस श्रृंखला में एक दौर तो ऐसा भी आया कि जब खिलाड़ी तो आपस में भिड़े ही दोनों देशों के अधिकारी भी विवाद और खेमों में बंटते नजर आए। इसका सबसे निराशाजनक पहलू यही है कि दोनों देशों के क्रिकेट अधिकारी श्रृंखला के बाकी विवादों को श्रृंखला समाप्त होते ही खत्म नहीं करा पाए और विवाद के अगले रास्ते खुले छोड़ गए। इससे क्रिकेट का जो नुकसान होगा सो होगा लेकिन तनाव के बीज हमेशा के लिए पड़ गए हैं। जब भी आस्ट्रेलिया और भारत के बीच में कोई मैच होगा तो यह बीज अंकुरित हुए बगैर नहीं रहेंगे। भारत में इस घटनाक्रम की मिलीजुली प्रतिक्रिया सामने आई है। यदि कुछ दर्शक आस्ट्रेलिया खिलाडि़यों को रंगभेदी खरीखोटी सुना रहे हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो भारतीय खिलाडि़यों को इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं।
क्रिकेट के स्वतंत्र विश्लेषकों का क्रिकेटरों और श्रंखला के बारे में इस तरह से कहना है कि जिस प्रकार विश्व सुंदरी के चयन के लिए केवल चेहरे की सुंदरता ही मापदंड नहीं होती है, उसी प्रकार क्रिकेट का सिरमौर बनने के लिए केवल एक अच्छा बल्लेबाज या अच्छा गेंदबाज होना ही जरूरी नहीं है, इसके लिए खिलाड़ी के अंदर व्यक्तित्व के वह गुण भी बहुत जरूरी हैं, जिनका कि भारतीय खिलाडि़यों के अंदर अभाव नजर आता है। कई भारतीय खिलाड़ी ऐसे हैं कि जब वह बॉल फेंकने में नाकाम हो जाते हैं तो उनके बल्ले से रन नहीं निकलते हैं वह अपनी विफलता की ठींकरा दूसरों के सिर पर फोड़ने से बिल्कुल भी नहीं हिचकते। यदि श्रृंखला के सभी पक्षों पर गौर किया जाए तो भारतीय खिलाड़ी इस कमजोरी में बहुत आगे हैं। उनका यह ‘पिछड़ापन’ दूसरे देशों के लिए एक बड़ा मुद्दा है। क्रिकेट की दुनिया में बादशाहत कायम करने के लिए आस्ट्रेलिया ने जिस शानदार खेल का प्रदर्शन किया है उसकी सभी प्रशंसा करेंगे लेकिन खिलाडि़यों ने जो उद्दंडता दिखाई है उसके पक्ष में शायद ही कोई होगा, यहां तक कि आस्ट्रेलिया में भी कोई इस इस श्रृंखला में एक दौर तो ऐसा भी आया कि जब खिलाड़ी तो आपस में भिड़े ही दोनों देशों के अधिकारी भी विवाद और खेमों में बंटते नजर आए।
क्रिकेट केवल खेल ही नहीं माना जाता है, बल्कि यह एक ऐसा सेतु भी है जो पूरी दुनिया को एक दूसरे से जोड़ता है। इसमें एक आकर्षण हैं, जिससे बहुत लोग प्रभावित रहते हैं। कई प्रमुख देशों में क्रिकेट को लेकर राजनीतिक कूटनीतिक भी होती है। एक बार कोलकाता में ईडन गार्डन पर पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक मैच देखने पहुंच गए थे और उन्होंने सीधे सुनील गावस्कर के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखकर पूछा था कि आप कैसे हैं। उन दिनों भी भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में तनाव कायम था। लेकिन क्रिकेट ने जियाउल हक के इस तनाव को काफी कम किया था। पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ भी क्रिकेट की राजनीति करते आए हैं। शरद पंवार ने भी क्रिकेट पकड़ लिया है और देश के अन्य नेता भी इसमें घुसने को उतावले हैं। क्रिकेट जहां इतना बड़ा काम करने की क्षमता रखता हो तो उसे खेलने वालों की जिम्मेदारी भी बहुत बढ़ जाती है। आस्ट्रेलिया जैसी घटनाओं से कोई लाभ नहीं मिलेगा।
हाल ही में क्रिकेट में नए-नए प्रयोग शुरू हुए हैं। अब क्रिकेटरों की बोलियां लग रही हैं। क्रिकेट खेला जाएगा हमारे मैदानों पर और मुनाफा मिलेगा बोली लगाने वालों को। वाह! क्रिकेट के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का लोग कितना अच्छा सपना देख रहे हैं। यह एक ऐसा व्यवसायिक दृष्टिकोण विकसित हुआ है जिसमें क्रिकेट के पीछे छूटने और व्यवसायिक प्रतिद्वंद्विता के आगे बढ़ने के खतरे ज्यादा हैं। किसी खेल को केवल धन कमाने की मशीन बना देना, उतनी अच्छी बात नहीं कही जा सकती है। व्यवसायिक हित यदि क्रिकेट से ऊपर उठ गए तो फिर इस क्रिकेट को कौन देखेगा? इस प्रश्न का उत्तर उनसे चाहिए जो क्रिकेटरों के कंधों पर बैठकर इस ‘मनी गेम’ में शामिल हो रहे हैं। जब से क्रिकेटरों पर सट्टेबाजी का आरोप लगा है और वह क्रिकेट से ज्यादा मॉडलों और विज्ञापनों के पीछे भागने लगे हैं तब से क्रिकेट देखने वालों का उत्साह फीका पड़ा है। इस नए प्रयोग पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और सट्टे की ही तरह क्रिकेटरों की बोली लगती रही तो इस खेल का भगवान ही मालिक है।