कौन हैं राष्ट्रवादी और कौन गद्दार?
 

  • दिनेश शर्मा

 

यूपीए सरकार ने एटमी करार के बारे में अगर पहले ही देश को जागरूक किया होता तो इसके खिलाफ जो लोकापवाद और संदेह के स्वर उठ रहे हैं, उनका कोई महत्व नहीं होता और इसके विरोध के नाम पर राजनीतिक दल सौदेबाज़ी पर नहीं उतर पाते। तब फिर देश की जनता इनसे चुनाव में निपटती। यक्ष प्रश्न है कि देश को इस करार के फायदे बताने में सरकार को क्या दिक्कत थी? भारत में ऊर्जा संकट समाप्त हो जाएगा, देश की प्रतिभाओं को और ज्यादा रोज़गार के अवसर मिलेंगे, रंगभेद से बचकर भारत उन देशों में खड़ा होगा जो विकसित हैं और बगैर कोई सौदेबाजी़ के एक दूसरे की मदद को आते हैं, इसके लाभ देश की सुरक्षा और विश्व समुदाय में भारत की छवि से भी जुड़े हैं, यह करार विदेश नीति को और अधिक विश्वसनीय बनाता है। इसकी ऐसी तमाम विशेषताएं प्रचार माध्यमों के जरिए देश को बताई जा सकती थीं। यह यूपीए सरकार के जन संपर्क नेटवर्क की भारी विफलता है जोकि एटमी करार के बारे में जन सामान्य में विश्वास और जागरुकता पैदा नहीं कर सका। राजनीतिक दलों में एटमी करार के विरोध के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने और बदला चुकाने का जो गंदा खेल चला है उसमें ‘राष्ट्रभक्त’ भाजपा और शिवसेना भी शामिल हो गई। पूरे देश को इस पर हैरानी है इसीलिए फिर कहा जा रहा है कि भाजपा और शिवसेना देश के भीतर भी आग लगा रही हैं और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी भारत को नीचा दिखाने वालों के साथ खड़ी हैं। इससे दुनिया में भारत की स्थिति बहुत खराब हुई है। इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं कि राष्ट्रहित के मामलों में भी भारत के राजनीतिक दलों में एकता नहीं रहती है।
भारतीय जनता पार्टी के भीष्म पितामह अटल बिहारी वाजपेयी का एटमी करार के विरुद्घ यूपीए सरकार के खिलाफ विश्वासमत में भाग लेना सर्वाधिक बहस और गंभीर चिंतन का विषय बन गया है। अटल बिहारी वाजपेयी भारत के विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री रह चुके हैं। इन दोनों पदों पर रहते हुए उन्हें भारत की आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत की क्या हैसियत है की सारी सच्चाई मालूम है। एटमी मामले पर अटल बिहारी वाजपेयी विरोध में खड़े हुए हैं? इन्हीं की सरकार के समय में एटमी करार की नींव पड़ी। मजे की बात है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और उनके प्रधान सचिव रहे ब्रजेश मिश्र एटमी करार को बहुत जरूरी और भारत के लिए बहुत फायदेमंद बता रहे हैं। भारत में परमाणु सुरक्षा क्रांति के जनक, सुरक्षा सलाहकार और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा एपीजे कलाम भी एटमी करार का पूरा समर्थन कर रहे हैं, इनके अलावा देश की और भी ऐसी ही अनेक हस्तियां हैं जो इनकी तरह करार के साथ हैं तो क्या ये सब नासमझ या भारत के गद्दार हैं और भारत के वामपंथी, भाजपाई और शिवसेना जैसे कुछ अन्य राजनीतिक दल राष्ट्रभक्त हैं? मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने एटमी करार का समर्थन करते हुए यूपीए सरकार के विश्‍वास मत के पक्ष में मतदान करने का जो ऐ‌तिहा‌सिक फैसला लिया उससे देश के आडवाणी और बाल ठाकरे जैसे ढोंगी राष्‍ट्रभक्‍तों के मुंह पर करारा तमाचा पड़ा है। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी फर्जी राष्‍ट्रवा‌दियों को करारा जवाब दिया है और अपने वामदलों के नेताओं को साफ-साफ जवाब दे दिया है कि वे सरकार के विश्वासमत प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान में भाजपा के साथ नहीं खड़े हो सकते हैं।

इनमें किनको राष्ट्रवादी माना जाए और किनको गद्दार? सरकार का विश्वासमत इसलिए नहीं है कि कांग्रेस को शासन करना है अपितु यह विश्वासमत इसलिए लाना पड़ा कि देश की सुरक्षा और समृद्धि से जुड़े एटमी करार के विरोध में वामदलों ने यूपीए का साथ छोड़ा इसलिए यह विश्वासमत यूपीए की सरकार बचाने के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के हित के लिए है। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी का राष्ट्रधर्म क्या रहा? उन्होंने परमाणु विस्फोट क्यों किया था? उसका भारत की आर्थिक प्रगति में क्या लाभ मिला? यही कि भारत लंबे समय तक विश्व समुदाय के आर्थिक प्रतिबंध झेलता रहा? इसीलिए उनको भारत रत्न सम्मान मिलना चाहिए? वाजपेयी का एटमी करार के विरोध में विश्वास प्रस्ताव के खिलाफ मतदान में भाग लेनेऔर भाजपा की कीमत पर बहुजन समाज पार्टी की भ्रष्ट नेता मायावती को तीन बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवाने में कोई फर्क नहीं है। उनके इस एक फैसले से देश में विघटनकारी शक्तियों को बढ़ावा मिल रहा है और मायावती को समर्थन देने के दूसरे फैसले से भाजपा को भारी नुकसान हुआ है। सब जानते हैं कि मायावती अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर मुकदमें खत्म कराने के लिए हर प्रकार की जोड़-तोड़ पर उतारू हैं। मायावती के लिए देश समाज और देश की राजनीति का कोई भी मतलब नहीं है। यह बात कई अवसरों पर सिद्ध हो चुकी है।
एटमी डील ने देश के लगभग सभी राजनैतिक दलों की पोल पट्टी खोलकर रख दी है। यूपीए सरकार को लोकसभा में परास्त करने के लिए और सरकार के विश्वासमत को समर्थन देने के लिए राजनीतिक दल और उसके सांसद यूपीए को किस प्रकार ब्लैकमेल कर रहे हैं और किस तरह से देश के खिलाफ मतदान कर रहे हैं यह मंजर पूरा देश देख रहा है। सरकार के खिलाफ मतदान करने वालों का यह तर्क अब नहीं चल सकता कि वह सरकार के खिलाफ हैं न कि देश के खिलाफ। सच्चाई यह है कि विश्वासमत के खिलाफ मतदान करने वाले सीधे-सीधे देश के खिलाफ मतदान में शामिल हुए हैं। मुजफ्फरनगर से समाजवादी पार्टी के सांसद मनुव्वर हसन अपने लालच में दल बदल के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। मनुव्वर हसन भी एक राजनीतिक ब्लैकमेलर कहे जाते हैं और जब मायावती ने उनके आर्थिक कारोबार पर हाथ डाला तो मनुव्वर हसन एक झटके में समाजवादी पार्टी छोड़कर बसपा से जुड़ लिए। वह कह रहे हैं कि उन्हें विश्वासमत के समर्थन में वोट करने के लिए 25 करोड़ रुपये का लालच दिया गया है। देश का एक सांसद और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते उन्हें देश के सामने यह सिद्ध करना चाहिए कि उन्हें 25 करोड़ रुपये घूस देने का आफर कहां से आया? और ऐसा आफर देने वाले को उन्होंने कानून के हवाले क्यों नहीं किया? मुजफ्फरनगर का यह छद्म धर्मनिरपेक्षी कहलाने वाला सांप्रदायिक नेता और भी कई अवसरों पर बेनकाब हुआ है।

अतीक अहमद जो इलाहाबाद में आतंक का पर्याय है सपा से सांसद हैं और आजकल विभिन्न आपराधिक मामलों में जेल में बंद हैं। मायावती सरकार के कोप से बचने के लिए वह कभी कांग्रेस से जुड़ने की कोशिश करते हैं तो कभी बसपा के साथ खड़े होने की बात करते हैं। मुलायम सिंह यादव से उनका मोहभंग हो गया है जबकि मुलायम ने उन्हें बहुत संरक्षण दिया है जिसके कारण अतीक अहमद राजनीति में बेलगाम हुए और इलाहाबाद में सांसद होकर भी आतंक मचाने से बाज नहीं आए। आज अतीक अहमद अपनी जान बचाने के लिए मायावती के आगे पीछे लगे हैं और यूपीए सरकार को वोट देने के लिए उससे अपने लिए सौदेबाजी भी कर रहे हैं। बहाना है कि वह एटमी डील का समर्थन नहीं कर सकते। यह अलग बात है कि अतीक अहमद एटमी डील के बारे में अभी कुछ भी नहीं जानते हैं और बात कर रहे हैं अमरीका विरोध की। कल तक मायावती के खिलाफ बोलते रहे सपा के शा‌हिद सिद्दीकी को मायावती में अब कस्‍तूरी नज़र आने लगी है? उमाकांत यादव जिनको मायावती ने आपराधिक गतिविधियों में आरोपित होने के कारण लखनऊ में अपने घर बुलाकर गिरफ्तार कराया था आज मायावती सरकार उन पर इसलिए मेहरबान होकर जेल से अस्पताल ले गई है ताकि वह बसपा के साथ यूपीए सरकार के खिलाफ मतदान करे। उमाकांत यादव मायावती से माफी मांगकर बसपा के साथ खड़े हो गए हैं।
मायावती ने केवल इसलिए यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया था क्योंकि यूपीए सरकार ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को खत्म करने से इनकार कर दिया था। मायावती इस समय जांचों का सामना कर रही हैं जिससे बचने के लिए उन्होंने वामदलों के साथ इसलिए गठजोड़ किया है ताकि यूपीए सरकार गिर जाए और उन्हें भ्रष्टाचार के मामलों से राहत मिल जाए। मगर अब यह संभव नहीं लगता है। यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी चाह लें तो मायावती के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप समाप्त नहीं हो सकते। यह अब एक कानूनी मामला बन चुका है जिसमें मायावती पर इसका शिकंजा कस गया है। मायावती को यह सिद्ध करना ही होगा कि वह निर्दोष हैं, जिसका फैसला अब केवल देश की अदालत को करना है। मायावती ने यूपीए सरकार को समर्थन देने के दौरान सीबीआई के दस्तावेजों में काफी हेराफेरी कराई जिसके बारे में हाल ही में सीबीआई का भी बयान आया था। यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी और यूपीए सरकार के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने सीबीआई को मायावती के खिलाफ जांच में अपना काम ठीक से नहीं करने दिया और मुलायम सिंह यादव से बदला चुकाने के चक्कर में उन्होंने मायावती को इतनी शह दी कि ताज कॉरीडोर मामले में राज्यपाल की अनुमति के बिना मुकदमा चलाने की अनुमति देने वाली फाइल वापस लौटवा दी। पूरे देश ने माया और सोनिया की इस डील को जाना है। मायावती प्रधानमंत्री बनने के चक्कर में यूपीए से ऐसा पंगा ले बैठी हैं कि अब उनके लिए भविष्य में राजनीति करना आसान नहीं होगा। उनके प्रधानमंत्री बनने के बात तो बहुत दूर की कौड़ी है भले ही चीन के दलाल कहे जाने वाले एबी वर्धन, सीताराम येचूरी, प्रकाश करात जैसे वामनेता कभी मायावती को और कभी मुलायम सिंह यादव को और कभी किसी अन्य को प्रधानमंत्री बनवाने का बयाना लिए घूमते रहते हैं।
ये देश के ऐसे चेहरे हैं जिनकी निष्ठा भारत के अलावा कहीं और भी रहती है। आजकल ये नेपाल के माओवादी नेता कमल दहल प्रचंड की चाट पकौड़ी उड़ा रहे हैं और भारत के विभिन्न हिस्सों में हिंसा फैला रहे माओवादियों की गतिविधियों पर चुप्पी मारे हुए हैं। ये नेता कमल दहल प्रचंड की शह पर पश्चिम बंगाल के हिस्से दार्जिलिंग को ग्रेटर नेपाल में शामिल करने की मुहिम पर भी चुप हैं। प्रकाश करात या सीताराम येचूरी किन कारणों से यूपीए सरकार के खिलाफ हाथ धोकर खड़े हुए हैं इसकी सच्चाई लालू प्रसाद यादव और अच्छी तरह से बयान किया करते हैं। ये वामपंथी समझ बैठे हैं कि देश वो ही चला रहे हैं। जबकि वामपंथी देश कम चला रहे हैं राजनीतिक ब्लैकमेलिंग ज्यादा कर रहे हैं। कांग्रेस के नेता और उत्तर प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह ने सांसदों से विश्वासमत पर अंतर्रात्मा की आवाज पर वोट डालने को कहा है। यह एक ऐसी अपील है जो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर की गई है और जिसमें यह तथ्य सामने आ गया है कि जो लोग एटमी करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार के खिलाफ लोकसभा में मतदान करने जा रहे हैं वह वास्तव में एक बड़ा राष्ट्रद्रोह कर रहे हैं। राष्ट्रीय लोकदल का बसपा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है लेकिन वह भी मायावती के साथ खड़ा हो गया। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने विश्वासमत का समर्थन किया। जाहिर है इन नेताओं की भी अपनी जरूरतें और रणनीतियां हैं।

आंध्र प्रदेश में टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव अलग तेलंगाना राज्य पर ब्लैकमेलिंग कर रहे हैं। यह अलग बात है कि उन्होंने तैश में आकर विधानसभा और लोकसभा से जो इस्तीफे दिए थे उपचुनाव में उनके बड़े-बड़े नेताओं का सफाया हो गया। कांग्रेस के एक सांसद अरविंद शर्मा इसलिए अपने दल से बगावत करके यूपीए सरकार के खिलाफ मतदान कर रहे हैं क्योंकि उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। अमरोहा के सांसद हरीश नागपाल का बयान आया था कि वह यूपीए के खिलाफ मतदान करेंगे। जानते हैं? यह महाशय पहले लाटरी चलाया करते थे फिर बिजनौर जनपद की सीमा से लगी नदियों में खनन के ठेकेदार हुए और अब शराब के ठेकेदार हैं। मायावती के चेलों की उनका कारोबार ठप करने की एक ही धमकी ने उन्हें रास्ते पर ला दिया। हरीश नागपाल ने बोल दिया कि वह यूपीए के खिलाफ वोट करेंगे। इसके बाद उनके खनन के ठेकों को हरी झंडी दे दी गई है। जेल में बंद सपा सांसद अफजल अंसारी को बसपा के सांसद अकबर अहमद डम्पी जेल में मिलने पहुंचे। किसलिए? उनका वोट चाहिए। इस समय जितने भी सांसद जेलों में बंद हैं उनके प्रति उनके दलों और विरोधियों का अनुराग देखते ही बनता है वाह! क्या राजनीति है और क्या चरित्र है?
भारत में अब इसी प्रकार के नेताओं का बोलबाला है जिनको कि यही नहीं पता है कि मुद्रास्फीति क्या होती है और एटमी डील आखिर है क्या? उन्हें जाति और धर्म, मजहब और अपने स्वार्थ के ऊपर जाने की कोई जागरूकता नहीं है और न ही वे ऐसे विषयों पर कभी सोचते हैं। उन्हें धनसंपदा और अपनी रणनीतियों से मतलब है। राजनीतिक दलों और देश के प्रति पराई भावनाओं से इस देश की राजनीतिक शक्ति निष्फल हो जाएगी तब क्या होगा यह किसी को नहीं पता। यहां पर यूपीए सरकार को भी कम जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यूपीए सरकार शुरू में ही देश की जनता को एटमी डील के प्रति जागरूक नहीं कर सकी। यदि एटमी करार का समय रहते पूरा प्रचार-प्रसार होता तो देश की यह जनता उन लोगों को चुनाव में मुंहतोड़ जवाब देती लेकिन देश की ज्या दातर जनता एटमी करार को नहीं जानती कि आखिर वह क्या है? मोटे तौर पर ही उसको पता चल रहा है कि इससे देश में ऊर्जा का उत्पादन बढ़ेगा, रोजगार के साधन बढ़ेंगे और भारत उन शक्तिशाली देशों में सीना तानकर खड़ा होगा जो विकसित है और जिनके पास यूरेनियम जैसे वो भंडार हैं जिनके उपयोग करने से उन देशों में विकास के बड़े-बड़े उद्यम चल रहे हैं। इस सत्य को मानना होगा कि चीन भारत को विकसित देशों से हमेशा अलग-थलग करना चाहता है जिसमें कि भारत के वामपंथी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में लगे हुए हैं। वामपंथी केवल वही भाषा बोलते हैं जो उनके मतलब की है और विघटन पैदा करती है। ये समाज को तोड़ने और हिंसा फैलाने की प्रेरणा देने के अलावा और कोई दूसरा काम नहीं करते। ये वो कामचोर हैं जिनसे कारखानों में मेहनत से काम करने को कहकर कारखाने के बाहर लाल झंडा टांग देते हैं। देश के कई बड़े उद्योग कारखानों में इन्हीं वामपंथियों के कारण ताले लटके हुए हैं और लाखों लोग बेरोजगार हैं।
यदि परमाणु करार नहीं हो पाया तो भारत को कुछ ऐसी अदृश्य और भयानक कठिनाईयों से जूझना होगा जिनके कारण भारत को बाह्य और आंतरिक चुनौतियां मिल रही हैं। उदाहरण के लिए-भारत जबरदस्त ऊर्जा संकट से जूझ रहा है और उससे निपटने क लिए उसे यूरेनियम की बहुत आवश्यकता है। यह यूरेनियम फ्रांस के पास है जो भारत को तभी यूरेनियम दे सकता है जब भारत परमाणु समझौते का हिस्सा बने। भारत पाकिस्तान और ईरान की तरह से चोरी-छिपे यूरेनियम हासिल नहीं कर सकता इससे उस पर फिर से प्रतिबंधों का खतरा मंडराएगा जो देश की आर्थिक प्रगति के लिए पहले ही महाकाल साबित हो चुका है। भारत के आर्थिक विकास की दर औद्योगिक विस्तार में सुस्ती के कारण धीमी है। भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीकी सुविधाओं को हासिल करने के लिए उन देशों की जरूरत है जिनके पास इसके संसाधन मौजूद हैं।

यह करार इस बात की गारंटी देता है कि इसके बाद भारत को वो तमाम सुविधाएं हासिल होंगी जो एक विकसित देश को मिलती हैं। इनमें आसान आवागमन रोजगार के अवसर और सुरक्षा जैसे मामलों में सहयोग शामिल है। भारत के एटमी मामले पर और उससे जुड़े आंतरिक राजनीतिक घटनाक्रम की पाकिस्तान को पल-पल की खबर है। उसकी दिलचस्पी इसमें है कि यूपीए सरकार एटमी करार करने में विफल हो जाए। इसके बाद अमरीका और भारत के रिश्तों में जो दरार आएगी उससे भारत बहुत पीछे चला जाएगा फिर पाकिस्तान भी भारत से अपने तरीके से निपटेगा जिसमें देश में विघटन की आवाजें उठेंगी और इसमें कश्मीर जैसे देश के मुद्दे यूएनओ गूंजते नज़र आयेंगे।