मुलायम आज भी मुसलमानों की पहली पसंद

  • राहुल गौड़

hindi news portalलखनऊ। उत्तर प्रदेश और देश में राजनीति में जबरदस्त उलटफेर के बावजूद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव आज भी मुसलमानों की पहली पसंद बने हुए हैं। न राजनीतिक विश्लेषकों को भी यह विश्वास है कि उत्तर प्रदेश में बसपा को पूर्ण बहुमत मिलने और सरकार बनाने के बावजूद मायावती मुलायम सिंह यादव के इस वोट बैंक में कोई भी सेंधमारी नहीं कर सकी हैं। उन्होने इसके लिए मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार के खिलाफ जो भी कदम उठायें हैं उनसे समाजवादी पार्टी को लाभ ही हुआ है। मुलायम सिंह यादव विधानसभा में जबरदस्त तरीके से बसपा सरकार का मुकाबला कर रहे हैं। वे अपनी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटें हैं और अपने कार्यकर्ताओं को यह विश्वास दिलाने में सफल दिखायी देते हैं कि मायावती के सर्वजन कार्ड के बावजूद उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी का होगा और इस बार केन्द्र में नयी सरकार के गठन में समाजवादी पार्टी की मुख्य भूमिका होगी।

समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश सहित देश की उसके और उसके मित्रों के प्रभाव वाली लोकसभा सीटों के लिए जोरदार चुनावी जनजागरण और तैयारियों में लगी है। प्रथम चरण में जनता से सीधे संवाद स्थापित करने की रणनीति बनाकर सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव आगे की तैयारियां करते हुए निकल पड़े हैं। उनकी दिनचर्या पहले से ज्यादा व्यस्त हो गई है। विधानसभा चुनाव में गलतियों से सबक लेते हुए उनकी योजनाओं से लग रहा है कि वास्तव में अब वे अपने बड़े राजनीतिक लक्ष्य का पीछा कर रहे हैं। पिछले दिनों खास कार्यकर्ताओं और पार्टी पदाधिकारियों के साथ एक बैठक में उन्होंने मायावती सरकार की कार्यप्रणाली से लोगों में अभी से नाराजगी और बसपा नेताओं में शुरू हो गये अंर्तद्वंद का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाने का संदेश दिया मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश एवं देश के राजनीतिक हालात पर विस्तार से चर्चा की और समझाया कि आने वाले समय में राज्य और केंद्र में किस तरह की स्थिति बनने जा रही है।
केंद्र सरकार के वामदलों से रिश्तों में कड़वाहट के बाद मुलायम का एकाएक
केंद्रीय राजनीति में महत्व बढ़ा है। उधर मायावती और केंद्र सरकार के बीच महज अस्सी हजार करोड़ रुपए के पैकेज से तनातनी शुरू हो चुकी है। मायावती ने केंद्र सरकार को सीधे चुनौती दे डाली है। आजकल वे अपनी सभाओं में मुलायम सिंह यादव कांग्रेस और भाजपा को सीधे निशाना बना रही हैं। मायावती को मुलायम सिंह यादव से राजनीतिक रूप से निपटने के लिए इस समय केंद्र के भारी सहयोग की जरूरत थी जिसमें भारी गतिरोध आ चुका है इसी अवसर की मुलायम सिंह यादव को बेसब्री से प्रतीक्षा थी। समाजवादी पार्टी मानती है कि मायावती सरकार के आठ महीने केवल राजनीतिक तोड़फोड़, केन्द्र सरकार से टकराने और अपने विरोधियों से बदला लो अभियान में ही निकले गए हैं मुलायम सरकार में पुलिस और पीएसी में भर्ती हुए सिपाहियों की बर्खास्तगी भी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने जा रही है जिसका मुलायम सिंह यादव को ही राजनीति लाभ मिलेगा भले ही इस भर्ती में भारी घपलेबाजी सामने आई है और सरकार ने दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्घ निलंबन एवं मुकद्ममों की कार्रवाई कर दी हो। मुलायम के चेहरे पर राज्य में प्रमुख प्रतिद्वंदी बसपा के स्पष्ट बहुमत की कोई चिंता नजर नहीं आती इसलिए वे कार्यकर्ताओं से कह रहे हैं कि ‘वे आम जनता के बीच में रहें और जनता को बसपा सरकार का सच बताते रहें वह जनता को बतायें कि जब भी लोकसभा चुनाव होंगे तो उस दिन वह अपना काम छोड़कर मतदान करने के जरूर निकले।
हाल के दिनो में
मायावती के आरक्षण अभियान और सर्वसमाज के बीच में खड़े होने की सपा को कोई चिंता नहीं दिख रही है। सपा मान रही है कि विधानसभा चुनाव मं जो सर्वसमाज बसपा के साथ दिखाई दे रहा था उसका बसपा से मोह भंग हो रहा है भले ही कुछ नेता बसपा तरफ देख रहे हों। मुलायम सिंह यादव अपने साथ आज भी मुसलमानों को उसी तरह से खड़ा देखकर उत्साह से लबरेज हैं। सपा मुख्यालय पर पहले की ही तरह कार्यकर्ताओं की भीड़ और सपा के कार्यक्रमों में मुस्लिम एवं दूसरे समुदाय की भी बढ़ चढ़कर भागीदारी को देखकर राजनैतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि उत्तरप्रदेश में मुसलमानों की पहली पसंद अभी भी मुलायम सिंह यादव बने हुए हैं। 
मुलायम नियमित रूप से पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठकें कर के उनसे मायावती सरकार के कामकाज पर प्रतिक्रिया ले रहे हैं। वे सपा के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और नेताओं को अपने क्षेत्र की जनता के बीच में ज्यादा से ज्यादा रहने की हिदायत दे रहे हैं सपा अध्यक्ष ने पार्टी को काफी समय देना शुरू कर दिया है और काफी समय से खाली चल रहे सपा और उसके सहयोगी संगठनों के प्रमुख पदों पर नियुक्तियां की जा रही हैं। कहने वाले कह रहे हैं कि लोकसभा चुनाव सपा और बसपा की राजनीतिक दिशा और ताकत का पैमाना होगा क्योंकि ये चुनाव जब तक होंगे तब तक मायावती सरकार के कामकाज का भी पूरी तरह आकलन हो जाएगा।  

अगर मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल का आंकलन किया जाए तो प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार के नेताओं और कार्यकर्ताओं को लेकर आज भी नाराजगी कायम है। मायावती को प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार की बदनामियों का भारी लाभ मिला है। जो स्वर्ण समाज बसपा के साथ चला गया है वह मायावती के साथ भी खुश नहीं है। यदि मुलायम सिंह यादव अपने इस वोट बैंक की अपने मुख्यमंत्री के कार्यकाल में भी देखभाल करते तो वह शायद ही मायावती के साथ जाता। मुलायम सिंह यादव के सिपाहसलारों को लेकर प्रदेश भर में भारी नाराज़गी थी जिसकी मुलायम सिंह यादव उपेक्षा करते चले गए। सपा सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के कुछ खास नेताओं के कारण कार्यकर्ताओं को उपेक्षा और अपमान का सामना करना पडा। समाजवादी पार्टी से अलग हुए बेनी प्रसाद वर्मा, राजबब्बर जैसे अन्य नेताओं का अलग होना इसी का हिस्सा है। यह बात भी मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक रणनीतियों की विफलता का एक बड़ा कारण है कि ऐसे समय में पश्चिम उत्तर प्रदेश के ताकतवर नेता चौधरी अजीत सिंह उनसे अलग हो गये जब मुलायम सिंह यादव को मिलकर चुनाव लड़ने की बहुत जरूरत थी। मुलायम सिंह यादव को अपनी राजनीतिक भूलों का एहसास है कि नहीं यह तो वह खुद ही जान सकते हैं लेकिन यह सत्य है कि मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक ताकत बढ़ाने में मायावती सरकार की कारगुजारियाँ मददगार साबित हो रहीं हैं।

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